Budget 2023-24: बजट के 'सात' के साथ विकास का क्या रिश्ता है?
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में उम्मीद जताया है कि भारत की विकास दर 7 प्रतिशत रहेगी। भाषण के अंत में उन्होंने 7 लाख रूपये तक की आय को करमुक्त भी घोषित कर दिया गया है। आखिर इस सात प्रतिशत के साथ विकास का क्या रिश्ता है?

Budget 2023-24: सबसे अधिक महत्व की बात सबसे आखिर में कही जाती है। इसलिए लगभग डेढ घण्टे के अपने बजट भाषण के आखिरी तीन चार मिनट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारामन ने महत्व की बात कही। महत्व की यह बात थी आयकर की दरों में बदलाव।
उन्होंने जैसे ही यह कहा कि अब सात लाख रूपये तक की आय टैक्स से मुक्त होगी, काफी देर तक सदस्यों ने मेजें थपथापकर उनकी इस घोषणा का स्वागत किया। अपनी सैलेरी के लिए कभी टैक्स न चुकाने वाले सांसदों को भला इससे क्या फर्क पड़ता है कि नौकरीपेशा लोगों की सैलरी से कितना कर लिया जा रहा है? फिर भी सांसदों में खुशी की लहर संभवत: इसलिए दौड़ी क्योंकि इससे देश के एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण वर्ग को मामूली ही सही, कुछ राहत मिलने जा रही है।
अपने बजट भाषण के शुरु में वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने जो तथ्य रखे, उनके मुताबिक 2014 के बाद देश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गयी है। यह दोगुनी आय अब लगभग दो लाख (1.97 लाख) रूपये है। यानी देश का हर व्यक्ति साल का दो लाख रूपया कमा रहा है। निश्चित रूप से ये सरकारी आंकड़ा है और सरकारी आंकड़े जिस तरह से तैयार किये जाते हैं उसमें अलग अलग लोगों की असमान आय को जोड़कर समान आय निकाली जाती है। जैसे अगर कोई 50 लाख रूपये साल का कमाता है और कोई पचास हजार साल का कमाता है तो सरकार इन दोनों की आय को जोड़कर प्रति व्यक्ति 25 लाख 25 हजार आय का आंकड़ा निकाल लेती है।
स्वाभाविक है ये आंकड़े सिर्फ आंकड़ों के लिए ही होते हैं इनका वास्तविकता से कुछ ज्यादा लेना देना नहीं होता। अगर होता तो अपने इसी बजट भाषण में निर्मला सीतारामन को यह न कहना पड़ता कि देश में 80 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त राशन योजना जारी रहेगी और इसके लिए जो दो लाख करोड़ का खर्च आयेगा उसे केन्द्र सरकार स्वयं वहन करेगी। अगर 80 करोड़ लोगों को किसी सरकार को मुफ्त अनाज देना पड़ रहा है ताकि उनकी न्यूनतम भोजन की जरूरत को पूरा किया जा सके तो 2 लाख रूपये हर भारतीय की औसत आय बताने का क्या औचित्य रह जाता है?
फिर, इस बढ़ी हुई आय का एक सत्य यह भी है कि मंहगाई बढ़ी है। एक ओर मंहगाई बढ़ती है तो दूसरी ओर लोगों की आय भी बढ़ती है। सामान मंहगा होगा तो पूंजी का लेन देन अधिक होगा और लेन देन अधिक होगा तो आय का आंकड़ा भी अधिक बढ़ जाता है। इसलिए महत्वपूर्ण यह नहीं है कि प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा सरकार ने 2 लाख रूपये निकाल लिया है। महत्वपूर्ण यह है कि क्या 2 लाख रूपये सालाना आय से एक परिवार सम्मान का जीवन जी सकता है?
मंहगाई दर 5.66 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। यह लगभग उतनी ही है जितनी अर्थव्यवस्था की विकास दर। अर्थात सामान्य व्यक्ति के लिए इस दौर में बचत करना मुश्किल है। उसकी आय के अनुपात में उसके खर्चों की लिस्ट लंबी है। यह किसी भी बाजार व्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है कि लोग अधिक कमाकर अधिक खर्च करना चाहते हैं। बाजार में खरीदारी होती रहे तो बाजारवादी अर्थव्यवस्था को इससे अधिक भला और क्या चाहिए?
अब अगर इसी तथ्य को वित्त मंत्री की उस घोषणा से जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर और साफ हो जाएगी जिसमें 7 लाख रूपये तक की आय को करमुक्त कर दिया गया है। कोरोना काल के बाद वैश्विक स्तर पर आसन्न मंहगाई के संकट को देखते हुए बाजार को चलाये रखने के लिए जरूरी है कि बाजार में कन्ज्यूमर आइटम की डिमांड बढ़ती रहे। अभी तक नई टैक्स व्यवस्था के तहत पांच लाख रूपये तक कर मुक्त आय सुनिश्चित थी, जिसे अब सात लाख कर दिया गया है।
इससे बचत योजनाओं में निवेश करके टैक्स बचाने की बजाय 7 लाख रूपया साल में कमाने वाला सामान्य जनमानस टैक्स बचाने की जद्दोजहद में पड़ने की बजाय बाजार में खर्च करेगा। इससे भारतीय बाजार के वैश्विक संकट में फंसने की आशंका कम हो जाएगी। फिलहाल यही केन्द्र सरकार के सामने सबसे बड़ी आसन्न चुनौती है जिससे निपटने के लिए टैक्स दरों में थोड़ी बहुत फेरबदल की गयी है।
भारत में लगभग 10 प्रतिशत लोग हैं जो आयकर देते हैं। सवा सौ करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश में यह आयकरदाताओं की ठीक ठाक संख्या कही जाएगी। आयकर का सीधा संबंध नौकरी और सेवा व्यापार से होता है। जीएसटी के युग में अब जबकि खर्च पर कर वसूल रही है तब सीमित आय वालों से अतिरिक्त आयकर लेना वैसे ही व्यावहारिक रास्ता नहीं है। इस बात को समझते हुए ही संभवत: सरकार ने आयकर की नयी दरें जारी की हैं।
पुराने टैक्स स्लैब में जहां 5 से 7.5 लाख पर 10 प्रतिशत कर वसूलने का प्रावधान था वहीं अब 7 लाख रूपये तक करों में छूट मिल सकती है। पुराने स्लैब में जहां 7.50 से 10 लाख रूपये की आय पर 15 प्रतिशत कर वसूलने का प्रावधान था वहीं अब 9 लाख रूपये तक टैक्स 10 प्रतिशत कर दिया गया है। 10 से 12.5 लाख पर पहले 20 प्रतिशत टैक्स था तो अब 9 से 12 लाख पर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। पहले 12.5 से 15 लाख की सालाना आय पर जो 25 प्रतिशत टैक्स था उसे अब 12 से 15 लाख की आय पर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके बाद 15 लाख से ऊपर सैलेरी वालों पर पहले भी 30 प्रतिशत टैक्स लगता था, अब भी लगेगा।
आयकर में इस कमी से निम्न मध्य वर्ग और मध्यवर्ग दोनों ही लाभान्वित होंगे। उनका टैक्स भी बचेगा और अब वो ज्यादा निश्चिंत होकर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए खर्च कर सकते हैं। यही इस बार बजट का मुख्य उद्देश्य था, जिसे निर्मला सीतारामन ने बजट के आखिर में पढ़कर मध्य वर्ग को "खुश" कर दिया। जिस तरह से मंहगाई बढ़ रही है और डॉलर के मुकाबले रूपये की कीमत गिर रही है, उसे देखते हुए ऐसा करना जरूरी भी था।
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वैसे भी बढ़ती मंहगाई और खर्चों को देखते हुए साल का सात लाख कमाने वाला क्या ऐसा वर्ग कहा जाएगा कि उससे अतिरिक्त आयकर वसूल लिया जाए? सात लाख की आय को आयकर से मुक्त घोषित करके अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत की विकास दर को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। उम्मीद करनी चाहिए कि उन्हें निराशा न हासिल हो और देश को भी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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