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Censor Board: अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार करे सेंसर बोर्ड

Censor Board: फिल्मी दुनिया के तमाम लोग मानते हैं कि सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में पहलाज निहलानी इतने बुरे नहीं थे, उनका वक्त बुरा था। लेकिन उनकी जगह लाये गये प्रसून जोशी भी विवादों में आ गये हैं। फिल्मी दुनिया के हर कैम्प में अपने रिश्ते रखने वाले प्रसून जोशी को सरकार ने भी तब पहलाज निहलानी की जगह एक ऐसा चेहरा माना था, जिसके साथ सरकार और फिल्मी दुनिया दोनों ही सहज होंगे। लेकिन तीन तीन फिल्मों पर विवाद होने और मामले के हाईकोर्ट तक पहुंच जाने के बाद उनका कार्यकाल भी अब सवालों के घेरे में है।

आदिपुरुष, 72 हूरें और सत्य प्रेम की कथा ये वो तीन फिल्में हैं जिन्हें लेकर सेन्सर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी विवादों में घिरे हैं। एक तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'आदिपुरुष' को लेकर कहा है कि "सेंसर बोर्ड आखिर करता क्या है? भविष्य की पीढ़ियों को क्या सिखाना चाहता है"? 'आदिपुरुष' के विवादित डॉयलॉग्स बदले जाने के बाद भी हाईकोर्ट सेन्सर बोर्ड से खुश नहीं है। जबकि संजय पूरन सिंह चौहान निर्देशित '72 हूरें 'जो 7 जुलाई को रिलीज होने वाली है, उसको लेकर मूवी के को-प्रोडयूसर अशोक पंडित ने दावा किया है कि सेंसर बोर्ड ने उनकी मूवी के ट्रेलर का सर्टिफिकेट रोक दिया है। ये अलग बात है कि सोशल मीडिया पर ये ट्रेलर काफी वायरल हो चुका है।

bollywood Censor Board should reconsider its working style

तीसरा मामला कार्तिक आर्यन और कियारा आडवानी स्टारर 'सत्य प्रेम की कथा' का है, जो इसी गुरुवार को रिलीज हुई है। खबर आई है कि उसमें 7 कट लगाने को सेंसर ने बोला, तब जाकर फिल्म रिलीज हुई है। फिल्म दुनिया के लोग ये मानते हैं कि कुछ कट तो जायज हैं, लेकिन कुछ ऐसे सीन काटने के लिए कहा गया है, जिनको सेंसर बोर्ड अपनी पुरानी फिल्मों में पहले मंजूरी दे चुका है।

एक शब्द हैं 'घपाघप'। संजय दत्त की जिंदगी पर बनी मूवी 'संजू' में विक्की कौशल के मुंह से सबने ये डायलॉग सुना था जो आम बोलचाल की भाषा में भी आ चुका है। मजे की बात है कि 'संजू' को इस शब्द के बावजूद यू/ए के साथ सेंसर सर्टिफिकेट मिला था। लेकिन जब 'सत्य प्रेम की कथा' में इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तो सेंसर बोर्ड ने उसे म्यूट करने को बोल दिया। इसी तरह एक जगह 'एक शॉट' शब्द है, इसे 'एक बार' करने को बोला गया है। मजे की बात है कि इसी मूवी के ट्रेलर में ये शब्द धड़ल्ले से चल रहा है।

सेंसर बोर्ड पर 'सत्य प्रेम की कथा' का इतना प्रभाव पड़ा हो या ना पड़ा हो, लेकिन '72 हूरें' को लेकर अशोक पंडित के नेशनल मीडिया पर तीखे विरोध और 'आदिपुरुष' को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियों का असर जरूर पड़ा। सूचना प्रसारण मंत्रालय की तरफ से डिप्टी सॉलीसीटर जनरल एसबी पांडे ने हाईकोर्ट को बताया कि फिल्म के साथ डिसक्लेमर दिया गया है कि ये फिल्म रामायण नहीं है। शायद इसी डर से फिल्म में भी पात्रों के नाम राघव, जानकी, शेष, बजरंग आदि रखे गए हैं।

लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने किसी की नहीं सुनी और सबको जमकर फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने कहा कि हिन्दू धर्म के लोग सहिष्णु हैं, तो उनका टेस्ट मत लो। हाईकोर्ट ने पीके का बिना नाम लिए भगवान शिव को भागते हुए दिखाने वाले सीन को लेकर भी सेंसर बोर्ड पर नाराजगी जताई। वो तो कोर्ट ने मनोज मुंतशिर की तरफ अपना गुस्सा मोड़ते हुए उन्हें नोटिस भेजने का आदेश दे दिया है, नहीं तो हाईकोर्ट का गुस्सा सेंसर बोर्ड पर ही उतरता।

इधर सेंसर बोर्ड अध्यक्ष प्रसून जोशी अब तक इन तीनों ही विवादों में मीडिया से बच रहे हैं। '72 हूरें' को लेकर जरूर गुरुवार की शाम को एक बयान सेंसर बोर्ड ने जारी किया है कि मीडिया में इस मूवी के ट्रेलर को रोके जाने जैसी जो खबरें चल रही हैं, गलत हैं। सेंसर बोर्ड के मुताबिक, 'इस फिल्म 72 हूरें को 2019 में सर्टिफिकेट दिया गया था। अब जब उसकी रिलीज की तारीख आई तो उसके ट्रेलर में निर्माता को कुछ बदलाव करने को बोले गए हैं, अभी तक उनका कोई जवाब नहीं मिला है"।

विवाद के बीच ही सेंसर बोर्ड के सदस्य और कश्मीर फाइल्स के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री का भी एक बयान सामने आया है। उन्होंने यह कहकर चौंका दिया है कि "हमारी केन्द्रीय कमेटी कोई फिल्म नहीं देखती है, बल्कि आम लोग फिल्म देखकर तय करते हैं।" इस बात को समझने के लिए आपको पूरे सेंसर बोर्ड और उसके सर्टिफिकेशन सिस्टम को समझना होगा।

सेंसर बोर्ड के चेयरमैन के तौर पर गीतकार प्रसून जोशी हैं और सीईओ हैं रवीन्द्र भाकर, जो नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएफडीसी) के भी सीईओ हैं। इनकी मदद के लिए एक केन्द्रीय कमेटी है, जिसमें विवेक अग्निहोत्री, विद्या बालान, वामन केन्द्रे, मिहिर भूटिया, रमेश पतंगे, गौतमी तोड़ीमल्ला, जीविता राजशेखर, टीएस नागभर्णा, नरेश चंद्र लाल कुल 10 सदस्य हैं। ये सभी देश के कोने कोने से हैं और अलग अलग भाषाओं के सिनेमा से जुड़े हुए हैं।

सेंसर बोर्ड के 9 क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं। साथ ही अलग अलग भाषाओं की सेंसर सदस्यों की कमेटियां भी हैं, जो अलग अलग शहरों में अलग अलग भाषाओं की फिल्मों को देखकर उन्हें सर्टिफिकेट देती हैं। इन कमेटियों में सैकड़ों लोग हैं, जिनमें से कई आम आदमी भी हैं, जिनके बारे में ही विवेक अग्निहोत्री ने कहा था। ऐसे में बड़ा नेटवर्क उन सिनेमाघरों या सरकारी ऑडीटोरियम्स का भी है, जहां सेंसर बोर्ड के सदस्यों द्वारा फिल्में देखी जाती हैं। दिल्ली में ज्यादातर महादेव रोड के फिल्म ऑडीटोरियम में ये फिल्में कमेटी के लोगों को दिखाई जाती हैं। पांच सदस्य एक मूवी को देखते हैं, जिनमें से एक सदस्य किसी ना किसी क्षेत्रीय कार्यालय का अधिकारी भी होता है।

सेंसर बोर्ड के लिए जिन फिल्मों की स्क्रीनिंग होती है वहां देख रहे लोगों की मदद के लिए एक अधिकारी होता है, जो उन्हें सेंसर बोर्ड की गाइडलाइंस के बारे में पूरी जानकारी देता है। शर्त होती है कि चाहे ए सर्टिफिकेट दो, या यू या फिर यू/ए, सभी सदस्यों की आम सहमति होनी चाहिए। अगर कोई मतभेद होता है, तो वह मुद्दा केन्द्रीय सेंसर बोर्ड के पास भेज दिया जाता है। ऐसे में केन्द्रीय सेंसर बोर्ड के पास गिनती की फिल्में ही देखने के लिए होती हैं। लेकिन जिस तरह से 'घपाघप' का मुद्दा हुआ है, वैसा अक्सर हो जाता है। किसी प्रोडयूसर को आपत्ति होती है तो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष से मिलकर मामला निपट जाता है।

लेकिन जिस तरह से 'आदिपुरुष' और '72 हूरें' जैसी संवदेनशील किस्म की फिल्मों के साथ हुआ है, वह बताता है कि सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर बोर्ड के चेयरमैन का ही कोई खास नियंत्रण नहीं होता है। सेंसर बोर्ड की जो सेन्ट्रल कमेटी है वह चंद फिल्में ही देखती है और सर्टिफिकेट देती है। 2022 का ही आंकड़ा देखें तो इस साल में जितनी फिल्में सेंसर बोर्ड ने पास की हैं, उनके नाम 181 पेजों में लिखे हुए हैं और एक पेज में 13 से 18 लाइनें हैं। अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि हर साल हजारों फिल्मों को सर्टिफिकेट देने वाला सेंसर बोर्ड कैसे काम करता होगा। पिछले साल उर्दू में ही 37 फिल्में सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेकर गई हैं। हद तो तब हो गई जब एक यूक्रेनी भाषा में बनी फिल्म ने भी पिछली साल सेंसर सर्टिफिकेट ले लिया। हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, मराठी, पंजाबी, बंगाली, कन्नड़, असमी आदि की गिनती तो भूल ही जाइए।

ऐसे में सेंसर बोर्ड की मजबूरी है कि उसको सैंकड़ों अन्य लोगों के जरिए फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की व्यवस्था हर बड़े शहर में करनी पड़ती है। लेकिन जिस तरह से विवाद बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए सेंसर बोर्ड को फिर से एक बार अपनी पूरी व्यवस्था का सिंहावलोकन करना होगा। वरना प्रसून जोशी लेफ्ट और राइट विंग के लोगों के निशाने पर वैसे ही आ जाएंगे जैसे पहलाज निहलानी आए थे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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