Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Governors from UP: राज्यपालों की नियुक्ति के जरिए उत्तर प्रदेश की राजनीति साधने की कोशिश

देश में राज्यपालों की नियुक्ति करते समय भी भाजपा राज्यों की राजनीति को महत्व दे रही है। इसमें सबसे प्रमुख उत्तर प्रदेश है जहां से अब सात राज्यपाल नियुक्त किये जा चुके हैं।

bjp politics behind of Uttar Pradesh through the appointment of governors from up

Governors from UP: भाजपा नेतृत्व ने चुनावी गणित के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश के अखाड़े में एक और सियासी दांव चल दिया है। वर्तमान राजनीतिक माहौल में भाजपा का यह दांव अगड़ों को साधने के साथ दलितों को भी पार्टी के साथ जोड़ने का प्रयास है। राज्यपालों की नियुक्ति के जरिए भाजपा ने 2024 के मद्देनजर सोशल इंजीनियरिंग को फिर से दुरुस्त करने की कोशिश की है। यह भी बताने की कोशिश की है कि पार्टी के फैसले पर किसी खास व्यक्ति का प्रभाव नहीं चल रहा है।

रविवार को प्रदेश से दो और राज्यपाल बनाने के बाद अब उत्तर प्रदेश से सात राज्यपाल या एलजी हो गए हैं। रविवार को नियुक्त राज्यपालों में शिवप्रताप शुक्ल को हिमाचल प्रदेश और विधान परिषद सदस्य लक्ष्मण आचार्य को सिक्किम का राज्यपाल बनाया गया है। वहीं बिहार में राज्यपाल पूर्व मंत्री और कई बार विधायक रहे फागू चौहान को बिहार से मेघालय तथा अरुणाचल के राज्यपाल सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर डॉ. बी.डी. मिश्र को लद्दाख का एलजी नियुक्त किया गया है। इसके अलावा यूपी से ही आने वाले कलराज मिश्र राजस्थान, मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर तथा आरिफ मोहम्मद खान केरल के राज्यपाल हैं। इस तरह प्रदेश से बनाए गए राज्यपालों में चार अगड़े, एक अति पिछड़ा, एक दलित और एक मुस्लिम है। अगड़ों में तीन ब्राह्मण, एक भूमिहार है।

सिर्फ राज्यपालों के चेहरों पर नजर दौड़ाएंगे तो अति पिछड़ी जातियों व दलितों का प्रतिनिधित्व कम नजर आएगा, जिस पर सवाल उठ सकता है। पर, राजनीतिक फैसलों को टुकड़ों-टुकड़ों में देखने पर किसी भी दल की रणनीति को समझना हमेशा मुश्किल होता है। इसलिए संगठन का प्रदेश में नेतृत्व संभाल रहे जाट बिरादरी से आने वाले भूपेन्द्र चौधरी, सरकार का नेतृत्व संभाल रहे क्षत्रिय समाज के चेहरे योगी आदित्यनाथ, पिछले कुछ महीनों में राज्यसभा व विधान परिषद के लिए मनोनीत किए गए चेहरों में दी गई अति पिछड़ी जातियों व अति दलित जातियों को तवज्जो से जोड़कर यदि इस निर्णय का विश्लेषण करें तो भाजपा की रणनीति समझने में आसानी रहेगी। यह भी समझ में आ जाएगा कि भाजपा ने किस तरह पार्टी के अंदरूनी संतुलन को साधने के साथ वोट की सामाजिक गणित साधा है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि प्रदेश से दो ताजा नियुक्तियों में एक ब्राह्मण की नियुक्ति के पीछे निश्चित रूप से मंशा कहीं न कहीं संघ प्रमुख के पंडितों को लेकर दिए गए बयान की प्रतिक्रिया को रोकना है।

शिवप्रताप शुक्ल को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने एक तरह से गोरखपुर ही नहीं पूर्वांचल में अगड़ों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है। पूर्वांचल की राजनीति में खासतौर से गोरखपुर और आसपास शिवप्रताप शुक्ल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खेमे से बाहर के माने जाते हैं। गोरखपुर के ही डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को पहले राज्यसभा भेजना और अब प्रदेश व केंद्र में मंत्री रह चुके शुक्ल को राज्यपाल बनाकर भाजपा शायद यह बताना चाहती है कि पार्टी के फैसलों पर किसी एक खास चेहरे का प्रभाव नहीं है।

ध्यान रहे कि शुक्ल के अलावा डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल भी पिछले कुछ वर्षों से योगी खेमे से बाहर थे। इससे पार्टी हाईकमान ने वर्चस्व की सियासत को तवज्जो न देने का संदेश दिया है। यह भी बताने की कोशिश की है कि काम करने वाले तथा निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं होने दी जाएगी। वाराणसी के लक्ष्मण आचार्य की राज्यपाल पद पर नियुक्ति के पीछे भी कार्यकर्ताओं के ख्याल एवं समर्पण को सम्मान का संदेश देने का प्रयास नजर आता है। साथ ही उनके जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलित व जनजातीय समाज को एक साथ साधने की भी कोशिश दिखती है। लक्ष्मण आचार्य खरवार हैं जो दलित भी हैं और अनुसूचित जनजाति में भी आते हैं।

उत्तर प्रदेश से नियुक्त सात राज्यपालों में छह सिर्फ पूर्वाचंल के हो गए हैं। इनमें भी एक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र से आने वले शिवप्रताप शुक्ल को छोड़कर शेष पांच प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी या उसके आसपास के हैं। जैसे कलराज मिश्र और मनोज सिन्हा गाजीपुर के हैं तो बी.डी. मिश्र की पैतृक जडे़ं भदोही से जुड़ी हैं। फागू चौहान भी वाराणसी के पड़ोसी जिले आजमगढ़ के रहने वाले हैं और आजमगढ़ से अलग होकर बने मऊ से चुनावी राजनीति करते रहे हैं।

Recommended Video

    Abdul Nazeer, Supreme Court के पूर्व जज Andhra Pradesh Governor बने, कैसा रहा सफर ? | वनइंडिया हिंदी

    आरिफ मोहम्मद खान की कर्मभूमि बहराइच रही है जबकि जन्मभूमि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में है। यह तस्वीर पूर्वी उत्तर प्रदेश के सामने शेष राज्य की उपेक्षा या अनदेखी का संकेत देती है। पर, पूर्वाचंल के राजनीतिक व सामाजिक महत्व पर नजर डालें तो इन नियुक्तियों का अर्थ आसानी से समझा जा सकता है। पूर्वाचंल जहां भौगोलिक रूप से प्रदेश के बहुत बड़े हिस्से को अपने साथ समेटता है वहीं राजनीतिक माहौल बनाने में भी बड़ी भूमिका अदा करता आया है। इसका उदाहरण यहां से निकले बड़ी संख्या में राजनेता तथा अपनी-अपनी पार्टियां बनाकर प्रदेश की सियासत में हलचल मचाने वाले ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल, रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया जैसे अनेक चेहरे हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने राज्यपालों की नियुक्ति में पूर्वाचंल को तवज्जो देकर 2024 के मद्देनजर अपने संसदीय क्षेत्र के आसपास के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गणित साधने का प्रयास भी किया है।

    यह भी पढ़ें: Justice S Abdul Nazeer कौन हैं ? अयोध्या पर फैसला देने वाले जज, जो बने आंध्र प्रदेश के नए राज्यपाल

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+