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Bihar Politics: बिहार की राजनीति में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है

Bihar Politics: 129 विधायकों के समर्थन से नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार विधानसभा में अपना बहुमत तो सिद्ध कर दिया, लेकिन खेला करने के दावों और प्रतिदावों के बीच खेल का रोमांच अंत-अंत तक बिल्कुल वैसे ही बना रहा, जैसे लास्ट बॉल तक चले क्रिकेट मैच में देखने को मिलता है।

आखिरकार जब विधानसभा के अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव 112 के मुकाबले 125 सदस्यों के बहुमत से पास हो गया, तभी स्थिति स्पष्ट हो पायी कि नीतीश सरकार के पास न केवल पर्याप्त बहुमत मौजूद है, बल्कि असली खेला राष्ट्रीय जनता दल के साथ हो गया है, क्योंकि उसके तीन विधायक नीलम देवी, चेतन आनंद और प्रह्लाद यादव सदन के अंदर एनडीए पक्ष के साथ खड़े नज़र आए।

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एनडीए ने राजद के तीन विधायक कैसे तोड़े?

एनडीए का समर्थन करने वाले तीन राजद विधायकों में से एक चेतन आनंद डीएम जी कृष्णैया हत्याकांड में उम्रकैद की सज़ा पाए बाहुबली आनंद मोहन के पुत्र हैं। आनंद मोहन को नीतीश सरकार ने पिछले ही साल बिहार जेल नियमावली 2012 में संशोधन करके रिहा कर दिया था।

चेतन आनंद रविवार देर रात तक अन्य राजद विधायकों के साथ तेजस्वी यादव के आवास पर ही थे, लेकिन उन्हें वहां से निकालने के लिए पुलिस के इस्तेमाल से एक बड़ा राजनीतिक खेल हुआ। चेतन आनंद के परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें तेजस्वी यादव के आवास पर जबरन रोका गया है, जिसके बाद पुलिस तेजस्वी यादव के आवास पर पहुंच गई। इसके बाद चेतन आनंद वहां से जो निकले, तो विधानसभा में एनडीए कैम्प के साथ खड़े नज़र आए।

वे ठाकुर यानी राजपूत समुदाय से आते हैं और उन्होंने राजद से अपने निकलने का आधार ठाकुर स्वाभिमान को बनाया। गौरतलब है कि राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कुछ महीने पहले संसद में "ठाकुर का कुआं" नाम की एक कविता पढ़ी थी, जिससे राजपूत समुदाय के अनेक लोग काफी आहत महसूस कर रहे थे।

एनडीए का समर्थन करने वाली दूसरी राजद विधायक नीलम देवी उस बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी हैं, जो फिलहाल जेल में बंद हैं और जिनके खिलाफ अनेकों संगीन मुकदमे दर्ज हैं। लिहाजा अपने बचाव की खातिर सत्ता का संरक्षण प्राप्त करना उनके लिए बेहद ज़रूरी है। पहले भी अनंत सिंह को नीतीश कुमार का बेहद करीबी समझा जाता था। यहां तक कि एनडीए-1 की सरकार के दौरान कई लोग उन्हें "छोटे सरकार" तक कहा करते थे।

राजद को छोड़कर एनडीए का समर्थन करने वाले तीसरे विधायक प्रह्लाद यादव रहे, जो राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक सदस्यों में माने जाते हैं। हालांकि उनकी छवि भी एक दबंग विधायक की ही है और वे वर्तमान उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के इलाके से आते हैं। क्या उन्होंने विजय सिन्हा के प्रभाव के कारण एनडीए सरकार का समर्थन किया या फिर कोई अन्य डील हुई, यह अभी रहस्य के परदे में है।

राजद ने भी खेला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी

केवल एनडीए ने ही राजद के तीन विधायक नहीं तोड़े, बल्कि ऐसा लगता है कि राजद ने भी एनडीए के कई विधायकों को तोड़ने की भरपूर कोशिशें कीं। जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के कम से कम पांच विधायकों को लेकर अंत तक सस्पेंस बना रहा, और वे काफी देर से सदन में हाजिर हुए।

इनमें से एक जदयू विधायक संजीव का पता लगाने के लिए तो नीतीश सरकार को पुलिस का सहारा लेना पड़ा। आखिरकार पुलिस की निगरानी में ही उन्हें पटना लाया गया। चर्चा गरम है कि राजद के साथ मिलकर वे जदयू के कई विधायकों को तोड़ने की फिराक में थे। उनके खिलाफ पटना के कोतवाली थाने में जदयू विधायक बीमा भारती और दिलीप राय के अपहरण का केस भी दर्ज कराया गया है।

विश्वास मत के परीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने चेतावनी भी दी है कि जिन लोगों ने भी उनके विधायकों की खरीद-फरोख्त करने की कोशिशें की हैं, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। नीतीश कुमार ने खुला आरोप लगाया कि एनडीए के कई विधायकों को विरोधी खेमे ने अपने पाले में करने के लिए लाखों रुपये का ऑफर दिया था।

जीतनराम मांझी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं

बिहार में खेला होने के दावों और कयासों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी और उनके चार विधायकों को लेकर भी अफवाहों का बाज़ार गर्म रहा। जीतनराम मांझी ने नीतीश मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी से केवल एक मंत्री बनाये जाने के प्रति खुलकर नाराज़गी जताई थी और यह भी कहा था कि विपक्षी खेमे से उन्हें मुख्यमंत्री तक बनाये जाने के ऑफर मिल रहे हैं।

ऐसे बयानों के कारण जीतनराम मांझी भी एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरकर सामने आए। हालात की गंभीरता को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें संभालकर रखने के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय को मोर्चे पर लगाया। अगर जीतनराम मांझी को भाजपा ने न संभाला होता, तो नीतीश कुमार के संभालने से वे संभलने वाले नहीं थे, क्योंकि उन्हें देने के लिए आज नीतीश कुमार के हाथ में कुछ भी नहीं है।

विश्वासमत हासिल करने के बावजूद निस्तेज दिखे नीतीश

सारी उठा-पटक के बीच नीतीश कुमार ने विश्वास मत तो हासिल कर लिया, लेकिन वे पूरी तरह निस्तेज दिखाई दिये। कारण यह कि संख्या बल होने के बावजूद उनमें अब नैतिक बल नहीं बचा है। मौजूदा विधानसभा का चुनाव 2020 में हुआ था और तब वे भाजपा के ही साथ थे। उनकी पार्टी की तुलना में लगभग दोगुनी सीटें जीतने के बावजूद भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़कर विपक्षी गठबंधन में चले गए।

जब विपक्षी गठबंधन में उनकी मुरादें पूरी नहीं हुईं, तो एक बार फिर से वे भाजपा के साथ आ गए हैं। इस प्रकार अपनी विभिन्न सरकारों पर कोई खतरा नहीं होते हुए भी केवल पाला बदल-बदल कर पिछले सवा तीन साल में उन्होंने तीसरी बार सरकार बनाई है। देखा जाए तो नीतीश कुमार स्वयं ही आज बिहार के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गये हैं, क्योंकि केवल और केवल अपने स्वार्थ के कारण उन्होंने बिहार में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता का वातावरण बनाकर रखा हुआ है।

क्या गारंटी है कि फिर पलटी नहीं मारेंगे नीतीश?

हालांकि नीतीश कुमार एक बार फिर से यह कह रहे हैं कि अब वे भाजपा का साथ नहीं छोड़ेंगे, लेकिन उनकी बातों पर किसी को भरोसा नहीं, क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड ही है कि वे जिस भी गठबंधन में रहते हैं, एक न एक दिन उसकी थाली में छेद अवश्य ही करते हैं। नीतीश कुमार के इसी रिकॉर्ड को देखते हुए तेजस्वी यादव ने विधानसभा में व्यंग्य भी किया कि क्या मोदी की गारंटी देने वाले यह गारंटी दे सकते हैं कि नीतीश कुमार फिर से पलटी नहीं मारेंगे?

सच भी है कि अपनी गारंटियों के लिए मशहूर स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी आज नीतीश कुमार के बारे में यह गारंटी देने की स्थिति में नहीं होंगे। संभव है कि लोकसभा चुनाव के बाद और विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर से वे पलटी मारकर महागठबंधन के साथ चले जाएं। नीतीश की आलोचना करते हुए एक तरफ जहां तेजस्वी यादव ने भाषा की पूरी सावधानी बरती, उन्हें आदरणीय बताया, पिता समान बताया और राजा दशरथ से उनकी तुलना की, वहीं नीतीश कुमार भी राजद के प्रति उस तरह से आक्रामक नहीं दिखे, जैसे कि भाजपा के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी दिखाई दिये। उन्होंने विपक्षी विधायकों की तरफ मुखातिब होकर कहा कि "हम किसी को नुकसान नहीं करेंगे। हम आपके सबके हित में काम करेंगे। आप जिस समुदाय के लिए बोल रहे हैं, उसके लिए भी हम काम करेंगे।"

संकेत साफ हैं कि बिहार की राजनीतिक घोड़ा-मंडी में खेला अभी खत्म नहीं हुआ है। बिहार के दुर्भाग्य से बिहार में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता का वातावरण अभी अगले कुछ और सालों तक बना ही रहेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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