Bihar: बिहार में बड़े भाई की भूमिका में आई भाजपा
Bihar: बिहार में भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ सोमवार को सीटों का बंटवारा कर लिया। सीटों के बंटवारे में नीतीश की पार्टी जदयू को एक सीट कम देकर भाजपा ने यह बता दिया कि बिहार में अब बड़े भाई की भूमिका भाजपा निभाएगी।
ठीक पांच वर्ष पूर्व 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश को बड़ा भाई मानकर भाजपा ने अपनी पांच सीटों वाल्मीकिनगर, झंझारपूर, सीवान, गोपालगंज और गया की कुर्बानी दी थी। लेकिन अब 2024 में जेडीयू से एक सीट ज्यादा लेकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि भले ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश हों लेकिन बिहार में सरकार और गठबंधन की कमान भाजपा के पास ही रहेगी।

इस बार जेडीयू को अपनी दो जीती हुई सीटें काराकाट और गया की कुर्बानी देनी पड़ी है। हालांकि बदले में एक शिवहर की सीट जरूर जदयू के खाते में चली गई है।
भाजपा ने बिहार के सीट बंटवारे में यह भी साफ कर दिया है कि भले ही रामविलास पासवान की पार्टी और सभी सांसद रामविलास के भाई पशुपतिनाथ पारस के साथ हों, जमीनी हकीकत चिराग के साथ है और एनडीए के लिए अखिल बिहार स्तर पर दलित चेहरा भी वही होंगे। इसी कारण पशुपतिनाथ पारस के मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री होने और चार सांसद होने के बाद भी पशुपतिनाथ पारस को बिना सीट दिये चिराग पासवान को पांच सीटे देकर असली उत्तराधिकारी मान लिया। हालांकि चिराग से भाजपा ने नवादा सीट जरूर हासिल कर ली है।
मोदी के चार सौ पार की राह में सबसे बड़ा अवरोध बिहार ही था। नीतीश को तेजस्वी से तोड़कर वापस एनडीए में लाना और सीटों के बंटवारे में छोटे दलों को एडजस्ट करने में सफल होकर भाजपा ने बिहार में अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है। पिछले तीन चुनाव से लगातार जीत के नए रिकॉर्ड बनाने वाली एनडीए को मजबूत करने के लिए भाजपा को 2024 में नीतीश कुमार और बिहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले छोटे दलों को साधना जरूरी था।
भाजपा ने मोदी और शाह की रणनीति में इसे बखूबी साधा है। भाजपा की कोशिश हर हाल में बिहार में 2019 के प्रदर्शन को दोहराना है जिसमें 40 में से 39 सीटें एनडीए ने जीती थी और सिर्फ एक किशनगंज की सीट कांग्रेस ने जीती थी। आरजेडी का खाता भी नहीं खुला था।
भाजपा जानती है कि बिहार में मोदी कितने भी लोकप्रिय हों और भाजपा का संगठन कितना भी मजबूत हो लेकिन नीतीश के सामाजिक समीकरण के आगे सब धराशायी हो जाता है। बिहार की राजनीति में बीजेपी के लिए नीतीश मजबूरी है। बिहार में नीतीश के साथ दो दशकों से ज्यादा जुड़ा हुआ ईबीसी का वोट बैक भाजपा को सभी सीटें जीतने के लिए जरूरी है।
नीतीश के लिए भी लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ जरूरी है। 2014 के चुनाव में मोदी के नाम पर नीतीश एनडीए का साथ छोड़ कर अकेले मैदान में उतरे थे और चारों खाने चित्त हो गए थे। 2914 में जदयू ने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन मात्र दो सीट मिली थी। लेकिन भाजपा को जमकर फायदा हुआ। बीजेपी को 22 और भाजपा की सहयोगी रही उपेन्द्र कुशवाह को 3, रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी को 6 सीटें मिली थी। जबकि 2014 में यूपीए के हिस्से में मात्र 7 सीटें आईं थी। इनमें राजद 4 सीट पर सिमट गई थी तो कांग्रेस दो और एक सीट पर एनसीपी विजयी हुई थी।
बिहार में सीटों के बंटवारे ने बताया कि मोदी की लोकप्रियता के बाद भी भाजपा सीटों के बंटवारे में सामाजिक ध्रुवीकरण की कसौटी पर नजर रखकर इसका गुणा भाग करके सियासी फायदा उठाने में नहीं चूकती है। नीतीश ने बीजेपी का दामन भले ही तीन बार छोड़ा लेकिन भाजपा ने नीतीश को फिर से साथ लेने में जरा भी देरी नहीं की।
इस बार मोदी के नेतृत्व में भाजपा का पूरा फोकस ओबीसी, दलित और अति पिछड़े वोट बैंक पर है। राहुल गांधी के लगातार ओबीसी की बात करने और सत्ता में आने पर जातिगत सर्वे करवाने का वादा करने के बाद मोदी इस वर्ग को भाजपा से छिटकने नहीं देना चाहते और इस कारण इस वर्ग को पूरा प्रतिनिधित्व दे रहे हैं। हरियाणा में ओबीसी नायब सेैनी को मुख्यमंत्री बनाना हो या इसके पहले मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर बिहार और उत्तर प्रदेश के यादव मतदाताओं को संदेश देना हो।
दरअसल भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद अगले साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की रणनीति को भी अभी से ध्यान में रख रही है और उसी हिसाब से बिहार को लेकर फैसले ले रही है। भाजपा की नजर 2025 में बिहार में भाजपा का पहला पूर्ण बहुमत का मुख्यमंत्री बनाने की है।
इस कारण भाजपा सभी जातियों और सभी दलों को साधने की रणनीति पर अभी से काम कर रही है। इसका एक नजारा बिहार में दो दिन पूर्व हुए एनडीए सरकार के कैबिनेट विस्तार में देखने को मिला। बिहार में भाजपा ने विभिन्न जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देकर पिछड़ा और दलित वर्गों को साधने की कोशिश की है। बिहार में 30 मंत्रियों में 20 मंत्री (लगभग 70 प्रतिशत) दलित, ईबीसी और ओबीसी वर्ग के हैं। यादव और मुस्लिम से मात्र एक-एक मंत्री बनाए गए हैं।
बिहार में एनडीए में सीट बंटवारे के बाद अब एक दो दिन में महागठबंधन में सीटों का बंटवारा होना तय है। तेजस्वी लगातार जनसंपर्क में जुटे हैं और अपनी जनविश्वास यात्रा के साथ जनता का विश्वास हासिल करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। राजनैतिक विरासत में भले ही तेजस्वी को अपने पिता का बनाया माय (मुस्लिम और यादव) समीकरण का गठजोड़ मिला है लेकिन तेजस्वी इसे अब सिर्फ माय की नहीं, बाप की भी पार्टी बनाने में जुटे है। बाप यानी बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पूअर यानी गरीब।
बहरहाल एनडीए के टिकट बंटवारे के बाद अब देखना होगा कि कांग्रेस और आरजेडी कैसे सीटों का बंटवारा करते हैं। एनडीए में सीट न मिलने पर पशुपतिनाथ पारस का महागठबंधन में जाना तय है। सन आफ मल्लाह मुकेश साहनी भी तेजस्वी के साथ हाथ मिला सकते हैं। इसलिए इस बार बिहार में नीतीश बनाम तेजस्वी नहीं, मोदी बनाम तेजस्वी की लड़ाई होना तय है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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