Nitish Kumar: फिर से बेकरार हैं नीतीश कुमार
Nitish Kumar: 23 जून को जब 15 गैर बीजेपी विपक्षी दलों की हंगामेदार बैठक में शामिल होने राहुल गांधी भी पटना पहुंचे थे, उसी दिन की बात है। बैठक के बीच राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से राज्य मंत्रिमंडल में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात कही, तो मुख्यमंत्री ने साथ बैठे राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की ओर इशारा कर दिया। इससे सन्देश साफ गया कि प्रधानमंत्री बनने निकले नीतीश कुमार ठीक ठाक तरीके से खुद को मुख्यमंत्री तक महसूस नहीं कर पा रहे। बिहार में मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि सबसे ज्यादा विधायकों वाले राजद की चल रही है। लालू यादव की राय सर्वोपरि हो चली है।
सूत्र बताते हैं कि बिहार सरकार में कांग्रेस के कुछ और नेताओं को शामिल कराने की पार्टी की मांग से नीतीश कुमार को पहले भी कई स्तरों पर अवगत कराया जा चुका था। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में कार्यकताओं और नेताओं की बैठक के बाद राहुल गांधी ने खुद मुख्यमंत्री से यह मांग कर दी। सीनियर नेता के कहने के बाद मुख्यमंत्री का बगले झांकना कांग्रेस को नागवार गुजर रहा है।

कांग्रेस की नज़र में यह सच सामने है कि बिहार के गैर बीजेपी दल कांग्रेस के वोट बैंक को छीनकर ही बीते तीस साल से अपनी राजनीति की रोटियां सेक रहे हैं। खासकर यादव बाहुल्य मतों वाले राजद का वजूद ही कांग्रेस के मुस्लिम दलित वोट बैंक पर टिका है। नीतीश सरकार में भागीदारी बढ़ाने से राजद के मुकाबले कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाने से कसमसाहट बढ़ रही है।
गठबंधन का एक अन्य सहयोगी दल सीपीआई माले है। उसके महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने खुले तौर पर कहा है कि गठबंधन का मतलब सिर्फ लालू यादव की पार्टी को मजबूती देते रहना नहीं होना चाहिए। नीतीश कुमार की मौजूदा विवशता उनके कोर वोटर के लिए भी पचने वाली बात नहीं है। इसे लेकर जद यू के कोर कैडर उपेन्द्र कुशवाहा और आरसीपी सिंह के रास्ते भाजपा का रुख करने लगे हैं। यह स्थिति गठबंधन में शामिल अन्य गैर राजद नेताओं के लिए भी स्वीकार्य नहीं है।
नीतीश की पार्टी के नेताओं में कसमसाहट का एक और कारण गैर यादव पिछड़े वोटर हैं। यूपी हो या बिहार, संघ की सोशल इंजनीयरिंग में इन जातियों को राष्ट्रवाद के साथ जोड़ने का काम हुआ है। बिहार में संभवत: इसी रणनीति के तहत संघ नेतृत्व ने नीतीश को गठबंधन का नेता माना था। लेकिन पिछले साल अगस्त में दोनों के रास्ते अलग हो जाने के बाद अब परेशानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी है। इससे उबरने के लिए बीते शुक्रवार से मुख्यमंत्री पूरे मनोयोग से बस एक काम कर रहे हैं। वह जनता दल (यू) के सभी विधायक व सांसदों से बारी बारी से अकेले में मिल रहे हैं। पार्टी इतिहास में यह पहली बार हो रहा है।
बिहार विधानसभा में जेडीयू के 45 विधायक हैं। सदन में वह राजद और बीजेपी के बाद तीसरे नंबर की पार्टी है, फिर भी नीतीश कुमार की सियासी चतुराई से सरकार का नेतृत्व संभाल रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव जीतनेवाले जद यू के 16 सांसद और पांच राज्यसभा सदस्य भी हैं। जद यू के इन जनप्रतिनिधियों ने उन्हीं राजद उम्मीदवार को हराया है जिसके साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं।
ऐसे में नए दबाव की स्थिति को भांपकर ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी जनप्रतिनिधियों से क्षेत्र के विकास की जरूरत पूछने के नाम पर मिल रहे हैं। सोमवार को मुख्यमंत्री से मिलने वालों में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह भी शामिल रहे। उन पर पार्टी लाइन से इतर जाकर नए संसद भवन के उद्घाटन मौके पर प्रधानमंत्री के साथ होने का आरोप है। पार्टी अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था। राज्यसभा के उप सभापति होने के नाते बीजेपी शीर्ष नेतृत्व से उनके रिश्ते मधुर हैं।
ऐसे में लंबे समय बाद नीतीश कुमार से उनकी वन टू वन हुई मुलाकात में क्या बात हुई? या जद यू के अन्य जनप्रतिनिधि अपने नेता से क्या कह रहे हैं, उसे लेकर संशय बढ़ता जा रहा है। हालांकि मिलने वाले सांसद व विधायक गुडी गुडी अंदाज में सब ठीक ठाक का दिखावटी आभास देने में लगे हैं। लेकिन सच तो यह है कि पार्टी नेताओं को पूरी गोपनीयता बरतने को कहा जा रहा है। नीतीश की अपने विधायकों और सांसदों से गूफ्तगू की गोपनीयता का आलम यह है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह व अन्य किसी नेता को भी इस बातचीत में मुख्यमंत्री के साथ मौजूद रहने की इजाजत नहीं है।
विपक्षी एकता के नाम पर पटना में विरोधी दलों के नेताओं को बुलाकर बिल्ली की गले में घंटी बांधने का नीतीश कुमार ने साहसी उपक्रम जरूर किया था, पर उसके फलितार्थ उभारने लगे हैं। कांग्रेस पार्टी ने विपक्षी एकता के लिए राजनीतिक दलों की अगली बैठक बेंगलुरु में 17 व 18 जुलाई को बुलाई है। देखना होगा कि कितने दल और नेता बेंगलुरु पहुंचते हैं। बेंगलुरु बैठक में विपक्षी गठबन्धन का नाम व संयोजक के नाम पर फैसला होना है। मानसून सत्र से पहले हो रही इस बैठक में सरकार को घेरने की व्यूह रचना तय होनी है। समान आचार संहिता जैसे जटिल मुद्दे पर राय बननी है।
विपक्षी एकता का सिरमौर बनने की चाहत रखने वाले नीतीश कुमार ने अपनी सरकार में कांग्रेस के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की मांग को अब तक टाल रखा है। बैठक से पहले कांग्रेस को खुश करने के लिए उन्हें पहल करनी होगी। तब ही वह विपक्ष से यह उम्मीद पाल सकते हैं कि जल्दी से जल्दी भावी प्रधानमंत्री के तौर पर उनका नाम तय हो। इसमें कोई भी विलंब या किसी बदलाव को पचाना एकता की कोशिशों को नए पचड़े में फंसा सकता है।
नीतीश कुमार की राजनीति की समझ रखने वालों का मानना है कि भावी प्रधानमंत्री प्रत्याशी के लिए विपक्ष से अबतक उनकी कोई उम्मीद बनती नहीं दिख रही। ऐसे में आगे वह खुद को विपक्षी एकता के हवन में जलाये रखना कितने दिनों तक पसंद करेंगे, यह देखने वाली बात होगी। पार्टी जनप्रतिनिधियों से निजी मुलाकात की कवायद को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। बीजेपी के तमाम ना नुकुर के बाद भी उनके लिए पूर्व की तरह पलटने का रास्ता बचा हुआ है। क्योंकि बीजेपी को जब भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे अजीत पवार कबूल हो सकते हैं तो एक बार फिर पालाबदल नीतीश कुमार को लेकर क्या दिक्कत हो सकती है?
वैसे भी सीबीआई की कृपा से नीतीश कुमार के लिए बैठे बिठाए एक नया बहाना निकल आया है। सहयोगी लालू प्रसाद की पार्टी ने सोमवार को ही फिर नया घाव खाया है। जमीन के बदले नौकरी देने के घोटाले की जांच में उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को सीबीआई चार्जशीट में शामिल कर लिया है। ऐसे में सुशासन बाबू के नाम से छवि गढ़ने वाले नीतीश कुमार चार्जशीटेड व्यक्ति को अपनी सरकार में आगे रखेंगे? या फिर उनसे एक बार फिर पिंड छुड़ाने का नया बहाना बना लेंगे, यह राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए इंतजार भरा सवाल है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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