Bihar BJP: बिहार में विकल्पहीनता की शिकार क्यों है बीजेपी?
Bihar BJP: बिहार में नीतीश कुमार ने नौवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। साथ में भाजपा कोटे से दो नेता उप मुख्यमंत्री बने हैं। एक सिर पर मुरेठा बांध कर रखने वाले युवा सम्राट चौधरी हैं तो दूसरे विजय चौधरी।
भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग से निकले इन दो नामों को उपमुख्यमंत्री बनाना भावी नेतृत्व तैयार करने की उसकी छटपटाहट भी दिखाता है।

दो उप मुख्यमंत्रियों में बिहार भाजपा के अध्यक्ष रहे सम्राट चौधरी पिछड़ी कुशवाहा जाति से हैं तो पिछली बार नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने की वजह रहे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा भूमिहार यानी अगड़ी जाति से हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरकार का यह नौंवा कार्यकाल बता रहा है कि भाजपा के भीतर बिहार में नेतृत्व विकसित करने की चाहत को लेकर खास तड़प है। हालांकि बीते तीन दशक के निरंतर प्रयास के बावजूद वह इसमें सफल नहीं हो पा रही है।
बिहार में अपना नेतृत्व विकसित करने की प्रकट चाहत के बावजूद भाजपा के लिए नीतीश कुमार निर्विकल्प नेता बने हुए हैं। अब तक नीतीश कुमार ने छह बार भाजपा को साथ लेकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। पहली बार 3 मार्च 2000 को भाजपा ने नीतीश कुमार को एनडीए के नेता के तौर पर बिहार के मैदान में उतारा था। उस समय नीतीश ही थे जो लालू प्रसाद यादव का विकल्प बन सकते थे। मगर नीतीश कुमार सात दिन में ही विफल हो गये। उन्हे इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के हाथों मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी पड़ी। तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी।
हारकर दो महीने बाद पुराने रेल मंत्री नीतीश कुमार को केन्द्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री बनाकर दोबारा शामिल कर लिया गया। हालांकि इसका फायदा पांच सालों बाद अकेले भाजपा की बजाय एनडीए को मिला। नीतीश कुमार का चेहरा आगे करके एनडीए 2005 में बिहार से लालू प्रसाद के एकछत्र प्रभाव को खत्म करने में सफल रही। तब नीतीश कुमार के साथ सुशील कुमार मोदी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। कम जातीय असर वाले तबके से आने वाले सुशील मोदी ने अपना समय प्रदेश भाजपा के नेतृत्व को विकसित करने में लगाने की बजाय नीतीश कुमार की 'सुशासन बाबू' की छवि गढ़ने में लगाया।
सुशील मोदी तकरीबन पंद्रह साल तक नीतीश कुमार सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे। प्रदेश भाजपा की कमान नंदकिशोर यादव को दी गई। मगर पिछड़ों के नेता लालू प्रसाद ने इस कोशिश को पंक्चर कर दिया। इस दौरान 2013 में केंद्रीय भाजपा ने एनडीए से इतर स्वतंत्र नेतृत्त्व विकसित करने की चाह में नरेंद्र मोदी को आगे किया। इससे नीतीश कुमार ने नाउम्मीद होकर भाजपा को झटका दे दिया और धुर विरोधी लालू प्रसाद की पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना ली।
नीतीश से गंभीर चोट खाकर भाजपा तब से प्रदेश में अपना नेतृत्व विकसित करने के प्रयास में लगी है लेकिन रविवार को फिर से नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाने से यह साबित हो गया है कि भाजपा को इसमें अब तक सफलता नहीं मिली है। लाख जतन के बाद भी बिहार में भाजपा और लालू प्रसाद दोनों के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपरिहार्य बने हुए हैं।
भाजपा के इसी प्रयास के तहत नीतीश कुमार के खास रहे उपेंद्र कुशवाहा को प्रमोट कर कई बार देखा गया। केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को बिहार अध्यक्ष बनाकर देखा गया। 2020 के प्रदेश चुनाव में नेतृत्वकर्ता नीतीश कुमार को कमजोर पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसे कई कार्य किए गए। इसमें पूरे चुनाव के दौरान एनडीए से बाहर रहे चिराग पासवान को प्रमोट किया जाता रहा।
इसमें मिली आंशिक सफलता के बाद नीतीश के नेतृत्व में सरकार बनाते वक्त जिन दो भाजपा नेताओं तारकेश्वर प्रसाद और रेणु देवी को उप मुख्यमंत्री बनाया गया वे उपयोगी साबित नहीं हो पाए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकार की गिरती छवि को बचाने के बजाय अगस्त 2022 में पलटने की आजमाई राजनीति का प्रयोग किया।
विपक्ष में रहने के सत्रह महीनों के दरम्यान भाजपा ने खुद के नेतृत्व को तैयार करने की अथक कोशिश की है। इसमें प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के जरिए नीतीश कुमार पर कई निजी आरोप मुखरता से लगाए जाते रहे। सुशील मोदी ने भी पिछली गलती से उबरने की कोशिश में नीतीश कुमार के कुशासन को उजागर करने का भरपूर प्रयास किया। बार-बार दावा किया जाता रहा कि इस बार प्रदेश भाजपा अपने पैरों पर खड़ी होकर रहेगी।
इस बात को तब और बल मिला जब नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इंडिया गठबंधन बनाने में जुट गये और एक फार्मूला दे दिया कि राज्यों में जो पार्टी जहां अधिक ताकतवर है, बाकी दल उसके सहयोगी बनकर लड़ें। ऊपर ऊपर तो भाजपा नेतृत्व ने इंडिया गठबंधन का मजाक ही उड़ाया लेकिन वो इस फार्मूले का महत्व समझते थे। इसलिए भले ही अमित शाह बिहार में बोल आये हों कि अब नीतीश के साथ दोबारा नहीं जाएंगे लेकिन उन्हें एक बार फिर नीतीश का साथ ही देना पड़ा।
ऐन लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए का नेता मान लिया गया है। नीतीश कुमार से अधिक विधानसभा सीटें होने के बावजूद भाजपा विधायकों को उसी हैसियत में नीतीश सरकार में शामिल होने के लिए विवश होना पड़ा है, जिसमें वो पहले रहे हैं। इसके पीछे आसानी से तर्क गढ़ा जा रहा है कि प्रेम और राजनीति में सब चलता है। लेकिन सवाल तो आज भी कायम है कि बिहार में भाजपा अपना नेतृत्व क्यों नहीं विकसित कर पा रही है? बड़ा दल होकर भी वह छोटा भाई बनकर ही क्यों संतुष्ट है?
लोकसभा चुनाव में इसका फायदा एनडीए को मिलेगा यह तो तय है लेकिन नीतीश और लालू के त्रिकोण पर खड़ी भाजपा अपने दम पर बिहार में कब बहुमत लायेगी? आखिर प्रदेश में निज नेतृत्व खड़ा करने की भाजपा की कोशिश सफल क्यों नहीं हो पा रही? क्या नीतीश ही उसकी सबसे बड़ी बाधा हैं या भाजपा में ही नेताओं का अकाल है? फिलहाल तो बिहार में भाजपा की इस विकल्पहीनता के जवाब में यही कुछ सवाल हैं जिसके जवाब मोदी और शाह को ही तलाशने होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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