Bihar Land Disputes: जमीन पर अवैध कब्जा करना क्या बिहार के जंगलराज 2.0 में नया संगठित अपराध है?
जमीन माफियाओं के चक्रव्यूह में फंसे आम आदमी की स्थिति बिहार में दयनीय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2021 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में जमीन विवाद की वजह से सबसे अधिक हत्याएं हुई हैं।

गोपालगंज का भू माफिया गंग दयाल यादव खुद को बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का भाई बताता था। लालू प्रसाद इस रिश्ते से उनके बहनोई हुए और वह तेजस्वी यादव का मामा। इस बात को सही साबित करने के लिए वह यादव परिवार के साथ अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालता रहता था।
एसपी आवास के सामने मकान कब्जा
शासन और प्रशासन पर हनक ऐसी कि सर्वोच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद भी खुलेआम घूमकर दबंगई करता था। लोगों की जमीन पर उसने कब्जा किया। मनोबल बढ़ता गया तो पिछले महीने वह गोपालगंज के एसपी आवास के सामने मकान कब्जा करने पहुंच गया। बताया जा रहा है कि वह हथियार लहराते हुए घर खाली कराने के लिए गया था। वहां स्थानीय पुलिस ने उसे गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन तब जब वह एसपी के बंगले के सामने दबंगई करने लगा। उस पर एक दर्जन से अधिक फर्जीवाड़े के मामले पहले से दर्ज हैं।
प्रशासनिक मिली भगत की आशंका
परिवार में कोई मंत्री, विधायक, सांसद हो तो जमीन कब्जा करना बिहार के जंगलराज 2.0 में नया सांगठनिक अपराध है। जैसे पहले अपहरण बिहार में उद्योग बन गया था। वह भी पुलिस के सहयोग के बिना संभव नहीं था। लगता नहीं कि किसी दूसरे की जमीन पर कब्जा करना भी शासन और प्रशासन की मिली भगत के बिना संभव है।
भू माफियाओं और प्रशासन की सांठगांठ
भू माफिया बिहार में कब्जा करके पहले जमीन को विवादित बनाते हैं। फिर उसे औने पौने दाम पर खरीदने की कोशिश करते हैं। इसी 'मॉडस आपरेंडी' के साथ वे अपना काम कर रहे हैं। आम आदमी जमीन कब्जा होने के बाद अपनी शिकायत लेकर कहां जाएगा? थाना या फिर अंचलाधिकारी के पास। वहां भू माफियाओं की पहले से ही सांठगांठ है।
जनता दरबार की औपचारिकता क्यों ?
सीओ और थाने बिहार में जमीन संंबंधी आपराधिक मामलों को मानों निपटाने के लिए नहीं बल्कि असमर्थता जाहिर करने के लिए बने हैं। वे चाहते हैं कि पीड़ित कोर्ट चला जाए। जब निर्णय कोर्ट से ही होना है फिर थाना और अंचल की आवश्यकता क्यों है? जनता दरबार की औपचारिकता क्यों पूरी की जा रही है?
गुर्गों के कब्जे में जमीन, कोर्ट में 50 साल...
एक भू माफिया ने बताया कि उन्हें थाना और अंचलाधिकारी के स्तर पर ही मामले को निपटाना पड़ता है। मामला इससे ऊपर गया तो खर्चा बढ़ जाता है। कोर्ट में हम लोग पूरी तरह से तैयार हैं। जमीन पर हमारे लोगों (गुर्गो) का कब्जा है और कोर्ट में पचास साल से पहले फैसला आना नहीं है। हमारे अलावा विवादित जमीन कोई खरीदेगा नहीं। थक हार कर पीड़ित को हमारे पास जमीन बेचने आना ही पड़ता है।

जमीन विवाद में कितने मर्डर हुए
जमीन माफियाओं के चक्रव्यूह में फंसे आम आदमी की स्थिति बिहार में दयनीय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2021 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में जमीन विवाद की वजह से सबसे अधिक हत्याएं हुई हैं। यहां विभिन्न विवादों के कारण हुई 1,081 हत्याओं में से 635 हत्याएं संपत्ति या जमीन विवाद में हुईं हैं। मतलब 59 प्रतिशत हत्याएं संपत्ति या भूमि विवाद से संबंधित हैं। हत्याओं का सिलसिला बिहार में लगातार जारी है। पिछले सालों की बात करें तो संपत्ति या भूमि संबंधी विवादों के परिणामस्वरूप बिहार में 2020 में 815, 2019 में 782, 2018 में 1,016 और 2017 में 939 हत्याएं हुईं।
क्या NCRB के आंकड़ों में भी पूरा सच नहीं ?
बिहार से दोगुनी आबादी वाले उत्तर प्रदेश में हत्या के 227 मामले 2021 में सामने आए। महाराष्ट्र में आंकड़ा 172 का है। जमीन संबंधित विवाद में हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है। बिहार में छोटे मोटे अपराधी से लेकर सफेदपोश बाहुबली तक जमीन कब्जाने के धंधे में लगे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े में सिर्फ वे मामले हैं, जिनमें जमीन विवाद में हुई हत्या को पुलिस ने दर्ज किया। कई हत्याओं को तो दुर्घटना का नाम दे दिया जाता है। प्रदेश में जमीन विवाद में धमकी देने, मारपीट करने और गोली चल जाने की तो अनगिनत कहानियां हैं। जिनमें आधे से अधिक थाने में भी दर्ज नहीं होती।
लाठी-डंडे के दम पर झोपड़ी बनाई
बिहार में अपराधियों के अंदर से मानो प्रशासन का डर खत्म हो गया है। उन्हें लगता है कि उन्होंने पैसा खर्च किया है तो वे मनमानी कर सकते हैं। बगहा के एक व्यवसाई दिनेश गुप्ता की क़रीब 2 बीघा जमीन पर दबंगों ने अतिक्रमण कर अवैध कब्जा कर लिया। उस जमीन पर स्थानीय न्यायालय ने जांच करने और स्टेटस को मेंटेन रखने के आदेश दिए। बावजूद इसके दबंगों द्वारा लाठी डंडे के बल पर झोपड़ी बना ली गई।
72 साल की महिला की जमीन पर नजरें
पश्चिम चंपारण अंतर्गत श्रीनगर की रहने वाली आशा देवी की जमीन को उन्हीं के गांव के रहने वाले रामचंद्र प्रसाद और महेन्द्र प्रसाद महतो ने अपने नाम लिखा लिया। इस काम को अंजाम देने के लिए अपनी बेटी को उन्होंने रजिस्ट्री आफिस में आशा देवी बनाकर पेश किया। अब जमीन हड़पने की कोशिश में लगे रामचंद्र और महेन्द्र जमीन को खारिज-दाखिल कराके उस पर ऋण लेने की तैयारी में जुटे थे। हालांकि, जब 72 वर्षीय आशा देवी को इस बात की भनक लगी तो वे सक्रिय हुई और पूरा मामला सामने आ पाया।
जिम्मेवारी सरकार की होनी चाहिए
सवाल यह है कि कैसे संभव हुआ कि किसी एक की जमीन किसी दूसरे ने रजिस्ट्री कर दी? जब जमीन की रजिस्ट्री कराते हुए सरकार एक शुल्क लेती है फिर यह जिम्मेवारी सरकार की होनी चाहिए कि जमीन बेचने वाला सही व्यक्ति है, इस बात को वह सुनिश्चित करे।
बाहुबल की विजय से पीड़ितों को निराशा
भू माफियाओं का बिहार में मनोबल इसलिए भी बढ़ा हुआ है कि सरकार और प्रशासन को अपने हिसाब से चला ही रहे हैं। न्यायालय से भी पीड़ितों को सहारा नहीं मिलता। जंगलराज में शासन का नहीं बल्कि ताकत का राज चलता है। बिहार में भी सच्चाई पर बाहुबल की विजय को बार बार देखकर पीड़ित पक्ष निराश होता है। क्योंकि न्याय की लड़ाई बहुत लंबी है।
अदालती कार्रवाई से जुड़े कागज दीमक चाट गए
आरा का ही भू विवाद का एक मामला ले लीजिए। वहां की अदालत ने 108 साल बाद फैसला सुनाया है। कुल नौ एकड़ जमीन की कानूनी लड़ाई 108 साल पहले 1914 में शुरू हुई थी। इसी मामले में अब जाकर निर्णय आया है। यह जमीन मूलत: कोईलवर निवासी नथुनी खान की थी। 1947 में देश बंटवारे के वक्त इनके वंशज पाकिस्तान चले गए और आरा में जमीन के दो खरीदार 100 साल से मुकदमा लड़ते रहे। 100 बाद भी फैसला तब आया जब कोरोना में भी केस की लगातार सुनवाई चली। जमीन की अदालती कार्रवाई से जुड़े कई कागज दीमक चाट गए थे। न्यायाधीश ने किसी तरह जोड़ कर उनका अवलोकन किया।
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सीओ के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा
बिहार में ऐसे भी मामले सामने आए जहां अंचलाधिकारियों ने सरकारी जमीन निजी लोगों के नाम लिख दी। इस बात का खुलासा भूमि सर्वेक्षण से हो जाएगा। इसलिए अंचलाधिकारी भूमि सर्वेक्षण में अधिक रूचि नहीं दिखा रहे हैं। भू सर्वेक्षण एवं परिमाप निदेशक स्तर पर लिखे गए एक पत्र के अनुसार- ''सरकारी भूमि के स्वामित्व निर्धारण के लिए होने वाली सुनवाई के समय अंचलाधिकारी या उनकी ओर से अधिकृत प्रतिनिधि उपस्थित नहीं रहते हैं। अंचल अधिकारी स्वामित्व परिवर्तन के बारे में शिविरों को निर्देश भी नहीं देते हैं। अपर समाहर्ताओं को कहा गया है कि वे अपने स्तर से देखें। अगर कोई सरकारी जमीन रैयत के नाम की गई है तो संबंधित सीओ के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा करें।'' इस आशय का पत्र बिहार के कटिहार, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अरवल, जहानाबाद, सीतामढ़ी, शिवहर, पश्चिम चंपारण, मुंगेर, बांका, लखीसराय, जमुई, अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, नालंदा, बेगूसराय, खगडिय़ा एवं कटिहार जिलों में भेजा गया है।
सरकारी अधिकारी भू माफियाओं के मेहमान
एक अंचलाधिकारी ने बिहार में बताया था कि उनके क्षेत्र के भूमाफियाओं ने आधा दर्जन शूटर रखे हुए हैं। जो लोगों को धमकाते हैं और जमीन खाली कराते हैं। अंचलाधिकारी को यह बताते हुए गर्व हो रहा था कि वे भू माफिया के फार्म हाउस पार्टी में मेहमान होते हैं। अब ऐसे अधिकारियों से बिहार का आम आदमी न्याय की उम्मीद क्या ही रखे?
जमीन विवाद पर कठघरे में बिहार सरकार
अंचल और थाना मिलकर जो जनता दरबार लगाते हैं, उसकी सारी कार्रवाई कैमरे के सामने होनी चाहिए। जब तक थाना और अंचल के काम-काज में पारदर्शिता नहीं आएगी तब तक बिहार में जमीन माफियाओं का मनोबल इसी तरह बढ़ता रहेगा। यह बात तय है कि कोई भी अपराधी बिना प्रशासनिक सहयोग के माफिया नहीं बन सकता। मााफियाओं की बिहार के प्रशासनिक व राजनीतिक हलकों में मजबूत पकड़ की वजह से ही बिहार सरकार द्वारा जमीन विवाद को सुलझाने के लिए उठाए जा रहे कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं।












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