Caste Census: भाजपा के लिए गले की हड्डी बनी जातिगत जनगणना?
Caste Census: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अगस्त 2021 को अपने धुर विरोधी और बिहार विधानसभा में तब विपक्ष के नेता राजद के तेजस्वी यादव और 10 अन्य दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात कर जाति आधारित जनगणना की मांग की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुलाकात में जाति जनगणना के हिमायती नेताओं से सहमति तो दिखाई लेकिन कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया। हालांकि केंद्र सरकार ने जुलाई 2021 में ही संसद में कह दिया था कि "नीतिगत मामले के तहत" जाति जनगणना 2021 की जनगणना का हिस्सा नहीं होगी।
केन्द्र सरकार के असहयोग के बाद नीतीश कुमार ने बिहार में जातिगत सर्वेक्षण कराने का फ़ैसला जून 2022 में लिया था और इसके बाद इसी साल 7 जनवरी को बिहार सरकार ने राज्य में सर्वे की प्रक्रिया की शुरुआत कर दी। दो चरणों में की जा रही इस प्रक्रिया का पहला चरण 31 मई तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके दूसरे चरण में बिहार में रहने वाले लोगों की जाति, उप-जाति और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने का लक्ष्य था।

इस बीच बिहार में किए जा रहे जातिगत सर्वे को चुनौती देने के लिए एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी जिसमें बिहार में किए जा रहे जातिगत सर्वे को रद्द करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाई कोर्ट जाने के लिए कहा था। अब पटना हाईकोर्ट ने 1 अगस्त को बिहार में जातिगत जनगणना जारी रखने का आदेश दे दिया है।
जातिगत जनगणना का इतिहास
भारत में 1872 में अंग्रेजों के शासन के समय से ही जनगणना की शुरूआत हो गई थी और 1931 तक जारी रही। अंग्रेजों ने साल 1931 तक जितनी बार भी भारत की जनगणना कराई, उसमें जाति से जुड़ी जानकारी को भी दर्ज़ किया गया। लेकिन आज़ादी हासिल करने के बाद भारत में जब साल 1951 में पहली बार जनगणना की गयी तो केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े लोगों को जाति के नाम पर वर्गीकृत किया गया, अन्य जातियों को जनगणना में अलग से नहीं गिना गया।
देश की जनगणना में एससी/एसटी की गणना होती है जबकि दूसरी जातियों-'सामान्य' (मुख्यतः अगड़ी जातियां) और ओबीसी-की गणना नहीं की जाती। एससी/एसटी को कुल आबादी में उनकी संख्या क्रमशः - 15 और 7.5 फीसदी के अनुपात में सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण दिया गया है। हालांकि 1953 में ओबीसी के लिए बने पहले केलकर आयोग ने 1961 की जनगणना में आबादी की जातिवार गिनती कराने की वकालत की थी लेकिन जातिगत जनगणना पर यह कहकर कदम आगे नहीं बढ़ाये गये कि क़ानून के हिसाब से जातिगत जनगणना नहीं की जा सकती, क्योंकि संविधान जनसंख्या को मानता है, जाति या धर्म को नहीं।
70 के दशक के बाद जब पिछड़ी जातियों की राजनीति अपना प्रभाव बढ़ाने लगी और ऊंची जातियों के वर्चस्व को चुनौती देने के साथ-साथ तथाकथित निचली जातियों को सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण दिए जाने को लेकर अभियान शुरू हुआ, तब जाकर 1979 में भारत सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के मसले पर मंडल कमीशन का गठन किया।
इस मंडल कमीशन ने ओबीसी श्रेणी के लोगों को आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी लेकिन इस सिफ़ारिश को 1990 में वीपी सिंह सरकार ने लागू किया। आख़िरकार साल 2010 में जब 100 से ज्यादा सांसदों ने जातिगत जनगणना की मांग की, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार को इसके लिए राज़ी होना पड़ा था। 2011 में सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना करवाई तो गई, लेकिन इस प्रक्रिया में हासिल किए गए जाति से जुड़े आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए गए। इसी तरह साल 2015 में कर्नाटक में जातिगत जनगणना करवाई गई, लेकिन इसमें हासिल किए गए आंकड़े भी कभी सार्वजनिक नहीं किए गए।
भाजपा के गले की हड्डी
भाजपा पहले दो अगड़ी जाति समूहों - ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन इसके बाद भाजपा ने समझ लिया कि केवल अगड़ी जाति के वोटों के बूते राजनीति में कामयाबी की ऊंची सीढ़ियां नहीं चढ़ी जा सकती। खासकर तब, जब वी. पी. सिंह के मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के बाद ओबीसी जातियों ने महत्वपूर्ण राजनैतिक जमीन प्राप्त कर ली हो।
इसके बाद पार्टी ने 'मंडल की राजनीति के जवाब में 'हिंदुत्व' पर ध्यान केंद्रित कर राजनैतिक आधार को व्यापक बनाया। उसने एक ऐसा विस्तृत दायरा तैयार किया जिसमें सभी हिंदू शामिल थे भले ही वे किसी भी जाति से आते हों। यही वजह है कि भाजपा ने 1985 में अपनी भोपाल राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मंडल आयोग को लागू करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। लेकिन बाद में अपना रुख बदल लिया और मंडल मुद्दे पर वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
भाजपा को इस बात का डर भी है कि जाति जनगणना हिंदू वोटों को विभाजित कर देगी और राजनीतिक रूप से उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा अपने मूल मतदाता आधार, सवर्णों को ठेस पहुंचाने का जोखिम नहीं उठा सकती। भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता का कहना है कि 'भाजपा के पास अल्पसंख्यक वोटों का सहारा नहीं है। हो सकता है कि ओबीसी के बीच हमारा प्रभाव थोड़ा बढ़ जाए, लेकिन इसका असली फायदा तो क्षेत्रीय दलों को होगा। जाति जनगणना में जोखिम और फायदे का अनुपात हमारे पक्ष में नहीं दिखता है।"
दरअसल जातिगत जनगणना भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गई है। न भाजपा इसे निगल सकती है, न उगल सकती है क्योंकि भाजपा ने ओबीसी में अपनी पैठ बना ली है। सीएसडीएस ने अपने अध्ययन में पाया है कि भाजपा का ओबीसी वोट प्रतिशत 2009 में 22 फीसदी से बढ़कर 2019 में 44 फीसदी हो गया। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 312 सीटें जीतीं और उसका ओबीसी वोट प्रतिशत 47 प्रतिशत था। फिलहाल राज्य में उसके 32 फीसदी विधायक ओबीसी समुदाय के हैं जो 10 साल पहले के मुकाबले 20 फीसद ज्यादा हैं। ऐसे में भाजपा जातिगत आरक्षण पर फूंक फूंक कर कदम रख रही है। मुश्किल में फंसी भाजपा का कहना है कि पार्टी सिद्धांत रूप में जातिगत जनगणना के विरोध में नहीं है लेकिन इस मुद्दे पर व्यापक सहमति चाहती है।
इसके अलावा कुछ अन्य आशंकाएं भी हैं जिसके कारण भाजपा जाति जनगणना पर दुविधा की स्थिति में है। गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट जैसे कई प्रमुख जाति समूह ओबीसी दर्जे की मांग को लेकर अक्सर हिंसक आंदोलन करते रहे हैं। इन विवादास्पद मांगों को हल किए बिना जातियों की कोई भी गिनती केंद्र के लिए बहुत संकटपूर्ण स्थिति बना सकती है।
इसके अलावा कुछ जाति समूहों के आधिकारिक वर्गीकरण पर भी कोई स्पष्टता नहीं है। जैसे, जाटों को राजस्थान में ओबीसी का दर्जा प्राप्त है लेकिन हरियाणा या केंद्रीय सूची में नहीं। कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ब्राह्मणों को भी ओबीसी सूची में जगह मिली है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कई व्यावहारिक मुद्दे हैं, जिन्हें पहले हल करने की जरूरत है।
इसीलिए केंद्र सरकार ने 2017 में उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अध्यक्षता में चार सदस्यीय आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपजी मुर्मू को सौंप दी है। खबर है कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सिविल सेवाओं में भर्ती के लिए दिए गए आरक्षण लाभ का 50 प्रतिशत, ओबीसी में शामिल करीब 6,000 जातियों और समुदायों में से केवल 40 जातियों ने हथिया लिया था।
27 फीसद ओबीसी आरक्षण कोटे के एक-चौथाई हिस्से पर सिर्फ 10 जातियों का एकाधिकार है। आयोग की जांच में यह भी पाया गया कि ओबीसी समुदायों के करीब 20 प्रतिशत लोगों को 2014 से 2018 तक आरक्षण कोटे का कोई लाभ नहीं मिला। समिति आरक्षण लाभ के समान वितरण के लिए केंद्रीय ओबीसी सूची में 2,633 ओबीसी उप-जातियों को चार समूहों में विभाजित करने की सिफारिश कर सकती है।
हर चुनाव में अपने पिछड़ी जाति का होने की याद दिलाने वाले और अपने मंत्रिपरिषद में ओबीसी सदस्यों की हिस्सेदारी 27 तक रखने वाले प्रधानमंत्री मोदी जातिगत जनगणना पर क्या रूख अपनाते हैं, यह देखना बाकी है। भाजपा को ओबीसी समूहों को एक छत के नीचे मजबूती से खड़ा करने के लिए एक नया फॉर्मूला खोजना होगा। भाजपा के लिए जातिगत आरक्षण उस रस्सी पर चलकर संतुलन बनाने जैसा है जहां जरा सी असावधानी उसे औंधे मुंह गिरा सकती है। भाजपा संतुलन बना लेती है या लड़खड़ाती है, यह आने वाला समय ही बताएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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