Ram Janmbhumi Dispute: रामजन्मभूमि मुद्दे को किसने बनाया था हिंदू बनाम मुस्लिम का मसला?
Ram Janmbhumi Dispute: बीते 75 साल में उठे राजनीतिक विवादों को देखें तो आपको एक खास विचारधारा के लोग ही उस विवाद को बढ़ाते हुए दिखाई देंगे। बहुत जरूरी होने पर ही वो सामने दिखते हैं, वरना कहीं बुद्धिजीवी के रूप में तो कहीं रंगकर्मी के रूप में, कहीं साहित्यकार के रूप में तो कहीं इतिहासकार के रूप में, कहीं एनजीओवादी होकर तो कहीं आंदोलनकारी बनकर राजनीतिक विवादों के जरिए समाज में दरार पैदा करना उनका बुनियादी काम है।
वही हैं जो बीते 75 सालों में हर प्रकार के राजनीतिक विवाद पैदा करते हैं, उसको पालते पोसते हैं और समाज में वर्ग संघर्ष को बढावा देते हैं। राममंदिर बाबरी मस्जिद विवाद भी हिन्दू मुस्लिम संघर्ष नहीं बल्कि उन्हीं का एक वर्गवादी प्रोजेक्ट था।

वो जानते थे कि यह एक ऐसा मुद्दा है जो भारत में वर्ग संघर्ष की जड़ों को इतना गहरा कर देगा जिसे पाट पाना भारत के लोगों के लिए असंभव हो जाएगा। इसलिए जैसे ही हिन्दू समूहों द्वारा अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया जाने लगा, देश का कम्युनिस्ट समूह इसके खिलाफ सक्रिय हो गया।
कम्युनिस्टों की राजनीतिक ताकत भारत में कभी इतनी नहीं रही है कि उसके बलबूते वो किसी राजनीतिक विवाद को विभाजक रेखा बना सकते। लेकिन उनकी बौद्धिक और साहित्यिक ताकत असीम थी। उनके वैचारिक स्कूलों से निकले कॉमरेड हर क्षेत्र में बिखरे पड़े थे। जंगल से लेकर पहाड़ तक, सड़क से लेकर शहर तक हर महत्वपूर्ण मोड़ पर वो बैठे मिल जाते थे। आज भी मिल जाते हैं लेकिन अब उनकी वो विश्वसनीयता और हनक नहीं बची कि दशकों तक दो वर्गों के बीच संघर्ष करवा सकें।
लेकिन नब्बे के दशक और उसके पहले उनकी आवाज प्रगतिशीलता और सेकुलरिज्म का पर्याय थी। सोवियत संघ के लेनिन और चीन के माओ से प्रेरित ये कॉमरेड जीवन के हर क्षेत्र में घुसकर क्रांति का बिगुल बजाना चाहते थे। इसलिए फिल्म से लेकर अदालत तक, पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक, कोचिंग सेन्टर से लेकर विश्वविद्यालयों तक उन्होंने अपने आप को फैला लिया था। मार्क्सवादी होना अपने आप में एक प्रमाणपत्र था। लेनिनवादी और माओवादी होना भी हिंसक होने का संदेह पैदा नहीं करता था बल्कि न्याय, समता और बराबरी के लिए संघर्ष का पर्यायवाची बना दिया गया था।
इन्हीं कम्युनिस्ट इकोसिस्टम ने 1989 में पहली बार उस मस्जिद का मामला अपने हाथ में लिया जो अयोध्या में थी। जिसे हिन्दू न केवल रामजन्मस्थान बता रहे थे बल्कि ताला खुलने से पहले एक चबूतरे पर रामलला की पूजा भी किया करते थे। 1989 में चार मार्क्सवादी इतिहासकारों ने एक 'रिसर्च पेपर' जारी किया जिसमें अपने 'गहरे अध्ययन और शोध' के आधार पर बताया कि अयोध्या में जिस स्थान को हिन्दू अपना बता रहे हैं वह कभी उनका था ही नहीं। वहां जो मस्जिद है, किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनायी गयी।
संभवत: पहली बार इन्हीं मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे 'बाबरी मस्जिद' का नाम भी दिया क्योंकि ब्रिटिश दस्तावेजों में तो इस नाम की मस्जिद वहां कभी बताई ही नहीं गयी। वहां जो मस्जिद थी उसका उल्लेख मस्जिद ए जन्मस्थान के रूप में ही किया गया है। इन चार इतिहासकारों के 'गहरे शोध और अनुसंधान' ने हिन्दू पक्ष के लिए आग में घी का काम किया क्योंकि अभी तक तो विवादित परिसर में मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात सर्वस्वीकार्य थी लेकिन यहां तो ऐतिहासिक रुप से मंदिर ही न होने की बात कह दी गयी थी।
आरएस शर्मा, डीएन झा, अतहर अली और सूरजभान जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों के इस शोधपत्र 'रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद ए हिस्टोरियन्स रिपोर्ट टू द नेशन" ने मुस्लिम पक्षकारों के मन में नया उत्साह पैदा कर दिया। पहली बार उन्हें लगा कि इस रिपोर्ट के जरिए वो "बाबरी मस्जिद" पर अपना दावा कर सकते हैं। इसलिए अदालतों में इसी रिपोर्ट का हवाला दिया जाने लगा क्योंकि मुस्लिम पक्ष के पास कोई ऐतिहासिक सबूत ही नहीं था जिससे वो यह बात साबित कर सकें कि तीन गोल गुंबद वाली मस्जिद उनकी है और वहां सदियों से नमाज पढ़ते आ रहे हैं।
दूसरी ओर रामचबूतरा तक सिमट चुका हिन्दू समुदाय उस जगह से अपना दावा छोड़ना नहीं चाहता था। उसके पास प्रमाण और दस्तावेज दोनों थे कि इस स्थान पर सोलहवी सदी में भी मंदिर टूट जाने के बाद राम चबूतरे पर ही पूजा पाठ होता था। जोसेफ टिफन्हर और विलियम फिन्च जैसे विदेशी यात्रियों के यात्रा वर्णन में सोलहवीं सदी से अठारवीं सदी तक इसका उल्लेख किया गया है। लेकिन कम्युनिस्ट इतिहासकारों के अपनी कपोल कल्पना को इतिहास बताकर पेश करते ही हिन्दू और मुस्लिम पक्ष दोनों उग्र हो गये।
जो केस अयोध्या के हाशिम अंसारी लड़ रहे थे अब उस केस की कमान आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हाथ में ले ली। अदालती लड़ाई से आगे राजनीतिक लड़ाई अधिक उग्र थी। विश्व हिन्दू परिषद लगाकार कारसेवा करने लगी और मुलायम सिंह तथा लालू यादव जैसे नेताओं को मुस्लिम वोटों की चिंता सताने लगी।
जो मुस्लिम पक्ष जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी की अगुवाई में बाबरी मस्जिद से अपना दावा छोड़ने के लिए तैयार हो गये थे उन्हें इरफान हबीब जैसे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने ऐसा करने से रोक दिया। आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया के प्रमुख बीबी लाल के साथ अयोध्या में विवादित परिसर की खुदाई में शामिल रहे केके मोहम्मद ने कई मौकों पर यह बात बताई कि कैसे अकेले इरफान हबीब और रोमिला थॉपर ने अब्दुल्ला बुखारी को "समझौता" न करने के लिए मना लिया था।
6 दिसंबर 1992 को तीन गुंबदों वाला ढांचा गिरने के बाद तो मानों देशभर में राजनीतिक तूफान आ गया। इस तूफान को राजनीतिक और वैचारिक जगत में कम्युनिस्ट ही बढ़ावा दे रहे थे। कांग्रेस, सोशलिस्ट दल, वीपी सिंह, चंद्रशेखर सब उन्हीं के बनाये नैरेटिव पर चल रहे थे। कांग्रेस की सरकार ने तो हलफनामा देकर सुप्रीम कोर्ट में यह तक कह दिया कि राम का कोई अस्तित्व ही नहीं है, ऐसा "इतिहासकार" बताते हैं। ये इतिहासकार वही थे जिन्होंने जेएनयू में बैठकर अयोध्या की खुदाई कर ली थी और प्रमाणसहित यह "साबित" कर दिया था कि अयोध्या में राम का कोई मंदिर कभी था ही नहीं।
लेकिन ढांचा गिरने के बाद दोबारा एएसआई का सर्वे हुआ तो एक ऐसा प्रस्तरलेख मिला जिसमें वहां उसका जन्मस्थान होने का प्रमाण मिला जिसने लंका के दस सिरों वाले रावण का वध किया था। पद्म और कमल के निशान मिले। ऐसे नक्काशीदार शिलाएं मिलीं जो वैष्णव मंदिरों में ही प्रयुक्त की जाती हैं। लेकिन जब सब प्रमाण मिल गये तो कॉमरेड बिरादरी को लगा कि हिन्दू मुस्लिम को नहीं लड़ा सकते तो हिन्दू बौद्ध को लड़ाओ। इसलिए आज भी वो अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। अब वो यह 'साबित' करने में लगे रहते हैं कि अयोध्या में बौद्ध मठ था जिसपर मस्जिद बनायी गयी थी।
इस संक्षिप्त पड़ताल का आशय सिर्फ इतना है कि अयोध्या का विवाद कभी हिन्दू मुस्लिम विवाद था ही नहीं। खासकर स्वतंत्र भारत में जब जब यह मौका आया कि दोनों पक्ष आपसी बातचीत और सुलह समझौते से इस मसले को हल कर लेंगे तब तब कम्युनिस्टों ने इसमें रोड़ा अटका दिया।
उन्होंने एक ऐसा नेशनल नैरेटिव पैदा कर दिया था कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का अर्थ मुसलमानों की हार होगी। जबकि अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण हर उस भारतवासी की जीत है जिसके पुरखे यहां की मिट्टी में मिले हुए हैं। अगर किसी की हार है तो सिर्फ उस कम्युनिस्ट इकोसिस्टम की जो इसके जरिए भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन को द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत तक ले जाना चाहता था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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