Assembly Elections: पांच राज्यों के चुनाव में कौन कहां भारी, किसकी क्या है तैयारी?

चुनाव आयोग द्वारा जिन पांच राज्यों में आज चुनाव का ऐलान हुआ उनमें से तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की चुनावी जंग में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखा जा रहा है, जबकि तेलंगाना में त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं। इस बार तेलंगाना में बीआरएस, कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनावी संघर्ष होगा।

बात छत्तीसगढ की करें तो वर्ष 2018 के पूर्व छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार तीन बार सत्ता में रही थी। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने रमन सिंह से राज्य की गद्दी छीन ली थी। इसलिए भाजपा इस बार चुनावी जनादेश अपने पक्ष में करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है।

Assembly Elections

छत्तीसगढ में भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तथा केंद्र सरकार द्वारा जन कल्याण के लिए किए गए प्रयासों का हवाला देकर राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए परिवर्तन चाहती है, जबकि कांग्रेस पार्टी राज्य की कुर्सी बचाए रखने के लिए भूपेश बघेल के काम काज और लोकप्रियता के साथ जाति जनगणना सहित इंडिया गठबंधन को लगातार साध रही है। हालांकि आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी व अन्य क्षेत्रीय दल भी राज्य में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं।

मालूम हो कि पिछले चुनाव में अजीत जोगी के नेतृत्व में भाजपा विरोधी ताकतों ने मिलकर एक गठबंधन बनाया था। उम्मीद की गई थी कि वह गठबंधन सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को लाभ पहुंचाएगा लेकिन परिणाम उम्मीद के विपरीत निकला। अबकी बार भी मोटे तौर पर राज्य में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है लेकिन छोटे और स्थानीय दल राष्ट्रीय पार्टियों का खेल किस स्तर तक प्रभावित करते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा।

मध्य प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा और प्रमुख रूप से चुनौती देती कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई की संभावना है। डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक लगातार सत्ता पर काबिज रहने के बाद पिछले चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली थी, लेकिन जोड़ तोड़ के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस की सरकार गिराकर खुद सत्ता हथिया ली। कमलनाथ की अगुवाई वाली सरकार अपने विधायकों की खरीद फरोख्त पर काबू नहीं रख सकी। लिहाजा राज्य में फिर शिवराज सिंह चौहान की सरकार कुर्सी पर काबिज हो गई। भाजपा जहां अपने केंद्रीय नेताओं तथा संगठन में ऊंचे पदों पर बैठे कार्यकर्ताओं को भी चुनाव मैदान में उतार कर हर हाल में जीत सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं मुकाबले को तैयार कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व के मंत्र का जाप कर रही है।

ऊपरी स्तर पर कांग्रेस के नेताओं के बीच तालमेल दिखाने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि वास्तव में जमीनी स्तर पर भी यह है या नहीं। आपसी सिर फुटौव्वल कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी मुसीबत रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस की उठा पटक थोड़ी कम हुई है लेकिन दिग्विजय सिंह बनाम कमलनाथ का खेमा अभी भी सक्रिय है।

इस क्रम में राजस्थान सबसे ज्यादा दिलचस्प चुनावी लड़ाई का गवाही बन सकता है। राज्य के मतदाताओं के बीच बारी-बारी से पार्टियों के लिए सत्ता का दरवाजा खोले जाने वाली नीति से तो यही लगता है कि इस बार सत्ता पर काबिज होने का मौका भाजपा का है। ऐसा लगता है कि कई कारक इसके पक्ष में काम कर रहे हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सचिन पायलट की ओर से कुर्सी संभालने के बाद से ही लगातार चुनौती मिलती रही है। कांग्रेस नेतृत्व समय-समय पर दोनों नेताओं में सुलह समझौता करता रहा है पर दोनों नेताओं के बीच विभाजन इतना गहरा है कि इसकी कीमत चुनाव में कांग्रेस पार्टी को चुकानी पड़ सकती है।

दूसरी तरफ भाजपा सत्ता विरोधी भावनाओं का लाभ उठाने का हर संभव प्रयास कर रही है। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व और वसुंधरा राजे सिंधिया के बीच सुर ताल नहीं मिलने की चर्चा हमेशा सुर्खियों में रही है। इसका प्रभाव समय-समय पर जमीनी स्तर पर भी प्रकट होता रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राजस्थान के चुनावी अभियान में बहुत अधिक समय और ऊर्जा झोंके जाने की संभावना है।

2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजस्थान का जीतना बीजेपी की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी ने पिछली बार राज्य की 25 में से 24 लोकसभा सीटें जीत ली थी। ऐसे में यह देखना रोमांचक होगा कि कांग्रेस अपनी कुर्सी बचा पाएगी, या भाजपा अपनी विजय पताका फहराएगी।

119 विधानसभा सीटों वाले तेलंगाना प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 60 विधायकों का होता है। नए राज्य के रूप में गठन के बाद से ही दोनों राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। पिछले महीनों में भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना के 119 विधानसभा क्षेत्र में अपने 119 बड़े नेताओं को उतारा तथा इन नेताओं ने 48 घंटे तक क्षेत्र की जनता के बीच पहुंचकर सीधा संवाद किया। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक विशाल रैली भी हैदराबाद में आयोजित की गई।

बीआरएस के नेता तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव पर वंशवादी राजनीति का आरोप लगाते हुए भाजपा लगातार हुंकार भर रही है। बीजेपी तेलंगाना चुनाव में दक्षिण में अपने राजनीतिक पांव पसारने के साथ ही पश्चिमी और उत्तरी भारत में अपनी संख्या में संभावित गिरावट की भरपाई करने वाली रणनीति के हिसाब से भी देख रही है। चुनाव बाद जरूरत पड़ने पर गठबंधन के लिए भी स्पेस की संभावना है। दूसरी तरफ इस क्षेत्र में कांग्रेस अपनी उपस्थिति को फिर से जोरदार बनाना चाहती है ताकि लोकसभा चुनाव में अपनी संभावनाओं को मजबूती देने के लिए इस चुनाव को अपनी राजनीतिक वापसी के मंचन के रूप में प्रस्तुत कर सके।

देश के उत्तर पूर्व में मिजोरम कांग्रेस और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच एक दिलचस्प चुनावी जंग का गवाह बनता हुआ दिख रहा है। मणिपुर में पिछले कई महीनो से जारी हिंसा का असर भी मिजोरम के चुनाव में स्पष्ट है। वर्ष 1986 में जब से एमएनएफ ने लालदेंगा के नेतृत्व में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए तब से कांग्रेस और एमएनएफ बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं।

अगर मणिपुर में चल रहे संकट के आलोक में देखा जाए तो समझौता और एकीकरण का मुद्दा विशेष महत्व रखता है। मिजोरम में विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ सत्तारुढ़ एमएनएफ को अपने घोषणा पत्र में लोगों से किए गए वादों को पूरा करने में असफलता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कुकी समुदाय को आश्रय और समर्थन प्रदान करने में भी उनकी आलोचना हो रही है।

मुख्यमंत्री जोरामथंगा की तुलना मणिपुर के समकक्ष वीरेंद्र सिंह से होने लगी है। मणिपुर संकट को लेकर कांग्रेस इस बार उम्मीद में है। वहीं भाजपा क्षेत्रीय दल के साथ मिलकर कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की रणनीति पर भी काम कर रही है। भाजपा की रणनीति है कि किसी भी तरह मिजोरम में कांग्रेस सत्ता की लड़ाई ना जीत सके।

कुल मिलाकर जिस तरह भारत में मकर संक्रांति के पर्व को सूर्य के उत्तरायण होने से गर्म मौसम की शुरुआत माना गया है इसी तरह लोकतंत्र में चुनाव प्रतीक होते हैं सियासी पारा में उछाल के। देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के साथ ही अब पूरा देश इस सियासी गर्मी में हाथ तापता हुआ दिखाई देगा। इन चुनावों को साल 2024 में होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसलिए यह चुनाव देश के आम आदमी के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए भी अग्नि परीक्षा की तरह देखे जा रहे हैं, खासकर बीजेपी और कांग्रेस के लिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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