अरविंद केजरीवाल की छापामार राजनीति और बढ़ती अराजकता
अरविन्द केजरीवाल की राजनीति छापामार अराजकतावादी की है। वो एक मुद्दा उठाते हैं, उस पर माहौल बनाते हैं और उसे छोड़कर आगे बढ जाते हैं। फिर न उस मुद्दे से उन्हें कोई मतलब रह जाता है और न अपने ही किये वादों से। अपने आसपास के लोगों को वो सीढी की तरह इस्तेमाल करते हैं और आगे बढने पर उस सीढी को धक्का मारकर अपने से दूर भी कर देते हैं।

बात जनवरी 2014 की है। अरविन्द केजरीवाल दूसरी बार पूर्ण बहुमत से दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये थे। दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने सीधे दिल्ली पुलिस पर धावा बोला। उन्होंने केन्द्र सरकार से मांग की कि दिल्ली पुलिस को उनके हवाले किया जाए। यह मांग उन्होंने केन्द्र सरकार को कोई चिट्ठी लिखकर नहीं बल्कि संसद भवन और रेल भवन के बीच वाली सड़क पर रात भर धरना देकर की।
यह इतना अप्रत्याशित तरीका था कि पुलिस प्रशासन सबके हाथ पैर फूल गये। एक तो गणतंत्र दिवस सिर पर था और वह इलाका हाई सिक्योरिटी जोन घोषित हो चुका था, ऊपर से एक राज्य का मुख्यमंत्री ऐसी हरकत कर रहा था। कोई प्रदर्शनकारी होता तो पुलिस अपने तरीकों से उसे वहां से हटा भी देती लेकिन यहां तो एक राज्य का मुख्यमंत्री ही अराजकता पर उतर आया था। इस घटना पर उस समय के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी टिप्पणी करने से स्वयं को नहीं रोक पाये और कहा था कि "अरविन्द केजरीवाल को समझना चाहिए कि वो एक जिम्मेदार पद पर हैं। प्रशासनिक पद पर रहते हुए उन्हें ऐसे अराजक तरीकों से बचना चाहिए।"
हालांकि इसके बाद भी अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक अराजकतावाद में कोई कमी आयी नहीं। वो अपने आप को आंदोलनकारी, समाजसेवी संगठन, सरकार, जांच एजंसी और सुप्रीम कोर्ट सब कुछ समझते हैं। इसलिए अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों की जांच भी खुद करते हैं और क्लीन चिट भी खुद ही दे लेते हैं। ऐसा वो किसी मूर्खता के कारण नहीं करते। ये राजनीति का उनका अपना स्टाइल है।
अगर वर्तमान हालात को देखें तो शराब नीति घोाटले में बुरी तरह फंसे मनीष सिसौदिया ने भी सीबीआई जांच में अपने आपको क्लीन चिट दे दी है। सीबीआई को कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है। करीब सात साल से सत्ता में बैठे केजरीवाल और उमके साथी इतना तो समझते ही होंगे कि संवैधानिक संस्थाएं किसके प्रति जवाबदेह होती हैं। लेकिन उन लोगों को ऐसी बातों से कोई मतलब नहीं होता। राजनीति की जिस छापामार शैली से उनका जन्म हुआ है, वो लोग उसी को अंतिम सत्य मानते हैं।
बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वो उनके विधायक खरीद रहे हैं। मनीष सिसोदिया ने कहा कि उनके पास भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री बनाने का ऑफर आया था। इसके बाद 1 सितंबर को अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में अपना बहुमत भी सिद्ध कर दिया। जबकि सब जानते हैं विधानसभा में केजरीवाल के पास भारी बहुमत है। बहुमत साबित करने के बाद बयान भी दे दिया कि भाजपा ने उनके विधायकों को खरीदने की कोशिश की लेकिन खरीद नहीं पाये। उन्होंने आगे कहा कि मनीष सिसोदिया पर छापेमारी के बाद गुजरात में उनका दो प्रतिशत मत बढ गया है। अगर वो गिरफ्तार हो जाते हैं तो हमारा चार प्रतिशत मत बढ जाएगा। अगर वो दूसरी बार भी गिरफ्तार किये जाते हैं को गुजरात में हमारी सरकार ही बन जाएगी।
अरविन्द केजरीवाल की ये अराजक उछलकूद अनायास नहीं होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी के मंत्रियों और विधायकों पर भांति भांति के भ्रष्टाचार के आरोप हैं। शिक्षा घोटाला, शराब घोटाला तो चर्चा में हैं। न जाने और कितने घोटाले होंगे जो केजरीवाल की कुर्सी के नीचे दबे होंगे। ऐसे में अपने ऊपर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच से जनता का ध्यान भटकाने के लिए वो जानबूझकर ऐसा स्वांग रचते हैं ताकि जनता को ये लगे कि उन्हें मोदी सरकार द्वारा उन्हें पीड़ित किया जा रहा है।
केजरीवाल की अराजक राजनीति को आप इस एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि वो उपराज्यपाल के पास भी बिना मुख्यमंत्री के साइन वाली फाइल भेज देते हैं। जब उपराज्यपाल उस फाइल को वापस करते हैं तो केजरीवाल छापामार शैली में बयान देना शुरु कर देते हैं कि उन्हें दिल्ली में काम नहीं करने दिया जा रहा है।
केजरीवाल की यही छापामार अराजक शैली रही है जिसकी वजह से वो आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं। उनकी कार्यशैली है ऊटपटांग वादे करो और उन वादों से जो लाभ मिलता है उसे लेकर आगे बढ जाओ। पलटकर उन वादों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जो अन्ना आंदोलन में लोकपाल के लिए जान देने पर उतर आये थे लेकिन सात साल की सरकार में कोई एक ऐसा मामला नहीं आया जिसमें लोकायुक्त ने दिल्ली में किसी प्रकार के प्रशासनिक भ्रष्टाचार की जांच किया हो। ऐसा इसलिए क्योंकि भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन के मंच से उन्होंने सशक्त लोकायुक्त कानून बनाने का जो वादा किया था वो दिल्ली में सरकार बनाते ही भूल गये। जब सशक्त कानून ही नहीं होगा तो लोकायुक्त जांच कैसे करेगा?
इसी तरह अन्ना आंदोलन के बाद गुड गवर्नेन्स के लिए उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार करवाया था। इसे "स्वराज" नाम दिया गया। इसमें बताया गया कि दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविन्द केजरीवाल की सरकार कैसे काम करेगी। इस "स्वराज" प्रस्ताव में कहा गया था कि गली गली शराब की दुकान खोलने से समाज में खराबी आती हैं। सरकारें अपनी तरफ से तय कर देती हैं कि शराब की दुकानें कहां कहां खोली जानी है। लेकिन जब उनकी सरकार आयेगी तो रेजिडेन्ट वेलफेयर एसोशिएशन या ग्राम सभाओं से इस बारे में पूछकर ही कोई निर्णय लेंगे। अगर महिलाएं कहीं पर विरोध करेंगी तो वहां शराब की दुकान नहीं खोली जाएगी। लेकिन जब इनकी दिल्ली में सरकार बन गयी तो ठीक इसके उलट काम करना शुरु कर दिया। पहले की सरकारें तो गली मोहल्लों से थोड़ा दूर मुख्य बाजार में शराब की दुकाने खोलतीं थी लेकिन केजरीवाल गली गली में शराब की दुकान खोलने के लिए प्रस्ताव लेकर आ गये।
उनकी शराब नीति में सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार ही नहीं हुआ बल्कि नैतिक रूप से उस अन्ना हजारे को भी शर्मिंदा किया गया जिसने रालेगढ सिद्धी में शराब बंदी से अपना काम शुरु किया था। अरविन्द केजरीवाल ने रालेगढ सिद्धी में ही वादा किया था कि वो देशभर में ऐसी ही शराब नीति लागू करवाने का काम करेंगे। लेकिन सरकार बनी तो स्वयं केजरीवाल ही इससे पलट गये। अब अन्ना हजारे अरविन्द केजरीवाल की शराब नीति से इतने दुखी हैं कि तीन दिन पहले एक चिट्ठी लिखकर केजरीवाल को याद दिलाया कि आपने जो वादे किये थे उसमें से किसी पर आप खरे नहीं उतरे। उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि "आप लोग भी बाकी पार्टियों की तरह पैसा से सत्ता और सत्ता से पैसा इस दुष्टचक्र में फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं। एक बड़े आंदोलन से पैदा हुई राजनीतिक पार्टी को यह बात शोभा नहीं देती।"
लेकिन अरविन्द केजरीवाल के लिए अब अन्ना हजारे या उनकी नसीहतें किसी काम की नहीं है। उनके जो वादे थे वो उस समय आंदोलन के लिए थे। उनके जो कर्म हैं वो उनकी राजनीति के लिए हैं। आज के वादे वो कल याद नहीं रखते। आगे बढ जाते हैं। फिर वो स्वच्छ राजनीति का वादा हो, भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा हो, शराब नीति का वादा हो या फिर रोजगार देने का वादा हो। ये वादे सिर्फ जनता का ध्यान भटकाने के लिए होते हैं। उनकी छापामार और अमर्यादित राजनीतिक कार्यशैली में वादों को पूरा करने के लिए कोई जगह कभी रही ही नहीं है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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