Article 370 Film: पीएम मोदी ने क्यों कहा, ‘यह मूवी देखो, सही सूचना मिलेगी’

Article 370 Film: हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक मूवी को देखने की लोगों को सलाह दी, जो आज ही रिलीज हुई है। ये सलाह देने के लिए उन्होंने जगह भी सही चुनी थी। जम्मू कश्मीर में सभा थी और मूवी का नाम है 'आर्टिकल 370'।

मोदी ने कहा, "मैंने सुना टीवी पर कि एक फिल्म आर्टिकल 370 पर आ रही है, अच्छा है, अब लोगों को सही सूचना मिलेगी"। ऐसे में ये लगने लगा कि पूरी मीडिया, संसद की बहसें, सुप्रीम कोर्ट में इस केस की कार्यवाही और बीजेपी नेताओं के बयान आदि अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर पब्लिक को ऐसा क्या नहीं बता पाए जो ये मूवी बताएगी? लोगों में दिलचस्पी जागना स्वभाविक है।

Article 370 Film

इस मूवी के निर्माता आदित्य धर पर वाकई में बड़ी जिम्मेदारी थी। पत्नी यामी गौतम को 'उरी' के बाद लगातार दूसरी बड़ी फिल्म में कामयाबी दिलानी थी और चूंकि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पीएम मोदी के दूसरी बड़े फैसले पर ये मूवी बनी थी, तो उनकी प्रतिक्रिया की भी चिंता थी। ये चिंता तब और बढ़ गई थी जब मोदी ने रिलीज से पहले ही ये बयान भी दे दिया। हालांकि इससे उनका फायदा ही होगा, क्योंकि पीएम किसी मूवी को देखने की सलाह अगर दे रहे हैं, तो समझिए कि हजारों टिकट तो ऐसे ही बिक जाएंगे।

फिल्म के प्रिव्यू के बाद पीएम मोदी के इस बयान का मतलब भी समझ आया। वाकई में इस मूवी की खूबसूरती थी कि जो बात संसद में, टीवी डिबेट्स में और सुप्रीम कोर्ट में चर्चा के बावजूद आम आदमी को उतना समझ नहीं आई, उसको आसानी से इस मूवी में समझा दिया गया है। कम समय में बड़े परदे पर टू द प्वॉइंट तरीके से बात समझ भी जल्दी आती है।

ये मूवी ना केवल आर्टिकल 370 लगाने की वजह को एक मिनट के अजय देवगन के सूत्रधार वाले वॉयस ओवर से समझा देती है, बल्कि आर्टिकल 370 ना हटने के पीछे क्या क्या वजहें रही हैं, उनको भी कई दृश्यों और डायलॉग्स के जरिए आम दर्शकों को स्पष्ट कर देती है। साथ ही ये मूवी यह भी बताती है कि धारा 370 हटाने जैसा नामुमकिन सा लगने वाला काम कैसे संविधान की ही एक दूसरी धारा 367 के जरिए हटाना मुमकिन हुआ।

फिल्म की कहानी है एक ऐसी लड़की जूनी हक्सर (यामी गौतम धर) की जो कश्मीर में आईडी (आईबी) ऑफिसर है और अपने सीनियर (राज अर्जुन) के रोकने पर भी आर्मी कैप्टन दोस्त की मदद से बुरहान वानी को मार गिराती है। दिल्ली ट्रांसफर होने के बाद उसे दूसरी महिला राजेश्वरी स्वामीनाथन (प्रियमणि) जो पीएमओ में संयुक्त सचिव है, फिर से कश्मीर भेजती है। इस बार एनआईए का कश्मीर का चीफ बनाकर।

मोदी और अमित शाह के बजाय आपको लगेगा कि धारा 370 हटाने और इस दौरान कश्मीर में भी नेताओं, अलगाववादियों और आतंकियों व पत्थरबाजों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी राजेश्वरी और जूनी के कंधों पर ही थी। अनुच्छेद 370 हटाने के लिए जो कश्मीर की संविधान सभा की ताकत थी, 1957 में उस सभा के खत्म हो जाने के बाद उसका तोड़ ढूंढने की जिम्मेदारी इसी महिला अधिकारी पर थी। जैसे ही सारी दिक्कतों से निकलकर राज्यसभा में आर्टिकल 370 पर प्रस्ताव पास होता है, मूवी की कहानी खत्म हो जाती है।

हालांकि मोदी की ये बात तो सही है कि मूवी से सही जानकारी मिलेगी। आर्टिकल 370 का तोड़ जिस तरह बिना 370 को छेड़े अनुच्छेद 367 में ढूंढा गया, आसान शब्दों में ये मूवी समझा देती है। कश्मीर की संविधान सभा के खत्म हो जाने के बाद उसकी ताकत विधानसभा को, और विधानसभा भंग रहने के दौरान गर्वनर को, फिर उसके जरिए राष्ट्रपति को मिल जाएगी। साथ ही 367 कैसे राष्ट्रपति को संविधान की व्याख्या की भी ताकत देती है। लेकिन मूवी के मुताबिक 95 फीसदी काम इन दोनों महिलाओं का था, इस फिल्म को देखने वाली ज्यादातर जनता ताउम्र ऐसा ही सोचेगी। ये इस मूवी का साइड इफैक्ट भी होगा।

हालांकि पीएम मोदी जो देश को बताना चाहते हैं वो भी इस मूवी के आसान सीन में बताया गया है कि कैसे हमारे अधिकारी बैक चैनल्स में फंसकर 'चलने दो' एटीट्यूड में ही कश्मीर को लेकर काम कर रहे थे। कैसे टैररिज्म वहां के सैकड़ों लोगों के लिए बिजनेस बन गया था। कैसे बेरोजगारी से पत्थरबाजी हो रही थी। कैसे नेता अलगाववादियों और पाकिस्तान की मदद से काम कर रहे थे। कैसे युवा आतंकियों का इस्तेमाल हो रहा था। कैसे भारत विरोध के नाम पर लोग रोटियां सेक रहे थे।

कहानी में इमोशन जोड़ने के लिए जूनी हक्सर के ह्विसिल ब्लोअर पापा की हत्या जो आत्महत्या दिखा दी गई, को भी कहानी से जोड़ा गया है। पुलवामा हमले में उनके एक साथी की मौत को भी दिखाया गया है। लेकिन दूसरी महिला नायिका यानी पीएमओ में ज्वॉइंट सेक्रटरी राजेश्वरी स्वामीनाथ को इतना शक्तिशाली दिखाया गया है, मानो आर्टिकल 370 उन्हीं की मेहनत से हटा है और वही एनआईए आदि एजेंसियों को हैंडल करती हैं। एक वक्त में तो उन्हीं के जरिए कश्मीर में आर्मी मूवमेंट भी होता है।

यह भी हो सकता है नारी शक्ति को उभारने के लिए जानबूझकर पीएमओ के अधिकारी या एनएसए अजीत डोवाल के रोल को महिला के रोल में बदल दिया गया हो। खैर मूवी में एक तीसरी महिला एक टीवी रिपोर्टर भी दिखाई है, जो पीएमओ में भी बेरोकटोक घुस जाती है। कभी भी राजेश्वरी पर ताने मार देती है। लगता ही नहीं निर्देशक को वर्तमान पीएमओ या चैनल्स की कार्यशैली का कोई आइडिया रहा होगा, वो बरखा दत्त से ज्यादा प्रभावित लगता है।

पूरी मूवी में प्रधानमंत्री बने अरुण गोविल या अमित शाह बने किरण कर्माकर इंटरवल के बाद ही दिखते हैं। चूंकि अमित शाह ने ही राज्यसभा में दमदारी से आर्टिकल 370 को हटाने की बहस की थी, सो किरण कर्माकर को आखिर में स्क्रीन स्पेस ज्यादा मिल गया है। बाकी सभी कलाकारों में फारुख अब्दुल्ला का रोल करने वाले राज जुत्सी या महबूबा मुफ्ती के किरदार को जरूर बीच बीच में स्क्रीन स्पेस मिला है, नहीं तो यामी के बॉस राज अर्जुन और उसके सहयोगियों यश चौहान और वसीम को ही समय मिला है, बाकी मूवी तो यामी और प्रियमणि के इर्द गिर्द ही घूमती रही है।

ये भी बड़ी बात है कि बिना वजह निर्देशक ने 'राष्ट्रवाद' का माहौल या पीएम का आभामंडल नहीं दिखाया है। शायद एक ही बार भारत माता की जय का सीन दिखाया गया है। अमित शाह का इमोशनल होकर ये कहना कि 'कश्मीर से हम इमोशनली जुड़े हैं और सारा का सारा कश्मीर हमारा है', जरुर असर करते हैं। पीएम मोदी का रुख भी एक डायलॉग 'संसद चले ना चले देश चल पड़ा है' से दमदार लगता है। लेकिन ऐसे कई बयान वास्तविक जीवन से ही लिए गए हैं।

हालांकि एक मामूली आईबी अधिकारी यामी गौतम को ऐसे दिखाया गया है जैसे वहां न आर्मी कमांडर्स हैं, और ना ही उप राज्यपाल। वही अकेले अलगाववादियों को गिरफ्तार कर उलटा लटकाकर राज जान रही है, वही लाइब्रेरी से 370 हटाने का फॉर्मूला चुरा रही है, वही बुरहान वानी और जाकिर नाइक का एनकाउंटर कर रही है और वही कश्मीर में सुरक्षा बलों की तैनाती कर रही है। यह सब करते हुए डायरेक्ट पीएमओ में रिपोर्ट भी कर रही है। इसलिए धारा 370 को लेकर बनी इस मूवी को देखते वक्त ज्यादा दिमाग लगाने से भी बचना चाहिए। हो सकता है मूवी देखने के बाद पीएम भी अपनी राय बदल दें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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