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Amethi Crime: सन्यासी के रूप में ठगी का कारोबार

Amethi Crime:हफ्ते भर पहले अमेठी जिले के जायस थाना क्षेत्र के खरौली गाँव की जिस घटना ने सबका ध्यान और मन प्रभावित किया था, अब उसी घटना की असलियत सामने आने पर लोग क्षोभ और गुस्से से भरे दिख रहे हैं।

दरअसल इस गांव में जोगी साधुओं की एक मंडली पहुंची थी जिसमें से एक जोगी ने अपने आप को उसी गांव के व्यक्ति रतिपाल सिंह का 22 साल पुराना खोया बेटा पिंकू उर्फ़ अरुण बताते हुए अपना परिचय दिया था। सारंगी बजाता वह जोगी सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में भी खूब छाया था।

amethi story of lost son returned at home turned out to be a thug guise of jogi

कहानी कुछ यूँ सुनाई गई थी कि सुनने वाले के दिल को ठक से छुए और परिवार व बिछड़े बच्चे की भावुक कहानी आँखों में बरबस आँसू और मन की कोठरी को भावनाओं से भर दे। किसी घर का बिछड़ा बेटा दो दशक बाद घर आता है और बताता है कि वह अब गृहस्थ आश्रम छोड़ संन्यास आश्रम अपनाना चाहता है और इसके लिए उसे अपनी माता से आज्ञा और भिक्षा चाहिए तो परिवार के सदस्य भावनाओं के कितने ज्वार-भाटे में डूबे और उतराये होंगें। भिक्षुक जोगी ने भावनाओं के मैदान में नॉन स्टॉप छक्का जड़ते हुए यहाँ तक कह दिया था कि माता ने आज्ञा और भिक्षा नहीं दी तो वह द्वार की माटी लेकर चला जायेगा मगर अब संन्यास जीवन के अपने व्रत को अवश्य पूरा करेगा।

जब यह सब घटित हो रहा था तब रतिपाल सिंह का परिवार क्या पूरा का पूरा गांव ही ममत्व के सैलाब में गोते खा रहा था। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, बस कहानी में ट्विस्ट तब आया जब भावनाओं के सैलाब का उतार आया और हकीकत से सामना हुआ। पिंकू ने झारखण्ड के जिस मठ का पता परिवार वालों को दिया था पता करने पर वह मठ ही नदारद निकला। और मठ का पता भी मालूम करने की जरुरत तब समझ आई जब पैसा मांगने पर रतिपाल का माथा ठनका।

असल में जोगी बनकर उस नौजवान ने कहा कि अगर वो लोग चाहते हैं कि मैं घर लौट आऊं तो उन्हें उनके गुरु को 10 लाख रूपया देना होगा। पुत्र मोह में रतिपाल ने अपना खेत बेचकर और उसके गुरु से बात कर 3 लाख 60 हजार का इंतजाम भी कर लिया था। मगर मठ के बैंक का अकाउंट नंबर मांगने पर सामने से टाल-मटोल होने लगा। गांव से वापस जाते समय पिंकू को गांववालों ने 13 क्विंटल अनाज के साथ ट्रॉली पर विदा किया था। गांव वाले जब ट्रॉली वाले के बताये पते पर पहुंचे तो वहां सब नदारद थे। बस इसी के बाद रतिपाल को लगा कि उनके साथ ठगी हो रही है और उन्होंने पुलिस से मदद मांग ली।

पुलिस की जांच पड़ताल में चौंकाने वाले खुलासे हुए जो विश्वास और प्रेम के नाम पर मानवता को शर्मसार करते दिखे। पुलिस की जांच हुई तो पता चला कि वह रतीपाल का कोई खोया हुआ बेटा पिंटू नहीं बल्कि ठग नफीस है। वह जिस टिकरिया गांव का है वहां ठगी का ही कारोबार चलता है।

नफीस ने कुछ महीने पहले ही झारखंड में पलामू के एक परिवार से इसी तरह 2.5 लाख की ठगी की थी। नफीस के भाई राशिद ने भी 2021 में यूपी के मिर्जापुर के एक परिवार को इसी तरीके से ठग कर लूटा था। नफीस के परिवार के ही एक सदस्य ने 2021 में बनारस की चोलापुर क्षेत्र में ऐसी ही ठगी की एक वारदात की थी।

लेकिन जायस में घटित यह घटना कई मामलों में आंख खोलने वाली है। साइबर ठगी के लिए बदनाम जामताड़ा जैसे कई गांव और जिले हैं जो भावनात्मक ठगी कर लाखों का चूना लगा रहे हैं। लेकिन इस घटना में तरीके पर गौर करने वाली बात है कि इतर मज़हब के लोग हिन्दू धर्म की प्रगाढ़ आस्था गेरुआ वस्त्र और सन्यासी की वेशभूषा को अपना हथियार बना रहे हैं।

गेरुआ वस्त्र धारण कर सामने आने वाला अगर अपने संन्यास की बात कहे तो सनातनी परम्परा का निर्वहन करने वाले तो ऐसे ही श्रद्धा से झुक जाते हैं। फिर अगर वह व्यक्ति स्वयं को खोये बेटे के रूप में परिचय दे तो आशंका की रही-सही गुंजाइश भी ख़त्म हो जाती है। ऐसे गिरोह का सूचना तंत्र भी काफी तगड़ा जान पड़ता है जिसकी जानकारियां सही साबित होती हैं। ऐसे में पीड़ित परिवार का विश्वास पुख्ता होना स्वाभाविक ही है। पर रतिपाल जैसे लोगों की जागरूकता के कारण नफीस की ठगी पकड़ी जा सकी।

इस मामले में पुलिस की त्वरित कार्यवाही ने एक और परिवार को लुटने से बचा लिया और पूरे इलाके को भी ऐसे ठगों से सजग किया गया है। मानव हैं तो भाव और उनका प्रभाव कोई बड़ी बात नहीं। मगर ठगों की ऐसी दुनिया में श्रद्धा, विश्वास और प्रेम को कमजोरी नहीं बनने देना चाहिए। यहां एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि नफीस नाथयोगी बनकर रतीपाल सिंह के घर पहुंचा था। नाथयोगी वह परंपरा है जिसके सन्यासी सारंगी लेकर समाज में भजन गाते हैं और भिक्षा मांगते फिरते हैं। संयोग से इस समय उत्तर प्रदेश के जो मुख्यमंत्री हैं वो भी नाथयोगी ही हैं।

एक सवाल खोये हुए बच्चों को लेकर प्रशासन पर भी उठता है। NCRB की ताजा रिपोर्ट के हिसाब से पिछले साल 2023 में 83,350 बच्चों की मिसिंग कम्प्लेन दर्ज़ की गयी है और इसी रिपोर्ट के अनुसार हजारों बच्चों को परिवार से मिलाने के बावजूद अभी भी 47,000 बच्चे लापता हैं। परिवार से गायब होनेवाले बच्चे आज के इस तकनीकी युग में भी अगर अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं तो इसे प्रशासनिक कमजोरी ही कहा जाएगा। फिर इन बच्चों का कहां कैसे इस्तेमाल किया जाता है इसे लेकर भी सरकार के स्तर पर कोई सजगता नहीं दिखती है।

यहां तो नफीस की ठगी पकड़ में आ गयी और मामला दूसरी ओर मुड़ गया लेकिन घर से गायब होनेवाले बच्चों की समस्या की ओर भी इस घटना से ध्यान जाता है। नफीस को उसके वास्तविक घर तो प्रशासन पहुंचा देगा लेकिन जो बच्चे सचमुच खो गये हैं उन्हें अपने घर पहुंचाने कौन सा प्रशासन आगे आयेगा?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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