केन्द्र में यूपी का ब्राह्मण चेहरा हैं अजय मिश्र, इस्तीफा लेना आसान नहीं
लखनऊ, 11 अक्टूबर: लखीमपुर खीरी हिंसा के कारण केन्द्र सरकार गहरे दबाव में है। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के पुत्र आशीष मिश्र इस मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं। क्या केन्द्र सरकार केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी से इस्तीफा लेगी ? मामला तूल पकड़ने के बाद अजय मिश्र केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर चुके हैं। लेकिन भाजपा ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 5 अक्टूबर को लखनऊ आये लेकिन उन्होंने अजय मिश्र के बारे में कुछ नहीं कहा। अजय मिश्र से क्यों नहीं लिया जा रहा इस्तीफा ?

अजय मिश्र मोदी कैबिनेट में यूपी का ब्राह्मण चेहरा
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नरेन्द्र मोदी के लिए मिश्र का इस्तीफा लेना आसान नहीं है। वे मोदी कैबिनेट में उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण चेहरा हैं। वे यूपी से ब्राह्मण कोटा के तहत ही केन्द्रीय मंत्री बने हैं। पिछड़ावाद की राजनीति में ब्राह्मण अब वोट बैंक बन गये हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा और कांग्रेस पहले से ब्राह्मणों को लुभाने में लगी हैं। अब इस होड़ में सपा भी शामिल हो गयी है। अखिलेश यादव ब्राह्मण समुदाय को जोड़ने के लिए हर जिले में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं। ऐसे समय में अगर अजय मिश्र से इस्तीफा लिया गया तो भाजपा को ब्राह्मणों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य के 62 जिलों में ब्राह्मणों की आबादी करीब 8 फीसदी है। इनमें 31 जिलों में इनकी जनसंख्या 12 फीसदी तक है। ऐसे में भाजपा ब्राह्मणों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती।

अजय मिश्र का चार-पांच जिलों में प्रभाव
2019 में अजय मिश्र टेनी लखीमपुर खीरी से दोबारा सांसद बने थे। भाजपा की राजनीति में उनकी बहुत चर्चा नहीं थी। उनके केन्द्रीय मंत्री बनने के बारे में कोई सोचता भी नहीं था। उत्तर प्रदेश में जब ब्राह्मण वोटरों की गोलबंदी के लिए सरगर्मी तेज हो गयी तो भाजपा के सामने मुश्किल खड़ी हुई। ब्राह्मणों के साथ कड़ा रहना उसकी मजबूरी बन गयी। इस साल 8 जुलाई को जब मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार होने लगा तो यूपी से किसी ब्राह्मण चेहरे की तलाश होने लगी। अजय मिश्र अचानक इस समीकरण में फिट हो गये। उन्हें केन्द्रीय मंत्री (गृह राज्य मंत्री) बनाया गया तो बहुत लोगों को आश्चर्य हुआ था। लेकिन मंत्री बनने के बाद ब्राह्मण लॉबी में उनका कद बढ़ गया। माना जाता है कि अजय मिश्र लखीमपुर खीरी के अलावा में नजदीक के पीलीभीत, बहराइच, शाहजहांपुर, हरदोई और सीतापुर जिले में भी अच्छा प्रभाव रखते हैं। ऐसे में अगर उनसे इस्तीफा मांगा गया तो भाजपा का खेल बिगड़ सकता है। कानून सबूतों के आधार पर काम करता है। लेकिन राजनीति जनभावनाओं के आधार पर आगे बढ़ती है। कई बार कोई नेता कानून की नजर में संदिग्ध होता है लेकिन जनता में उसकी लोकप्रियता बरकरार रहती है। इसलिए भाजपा ने अभी अजय मिश्र के मामले में चुप्पी साध रखी है।

क्या है योगी सरकार की चिंता ?
लखीमपुर खीरी कांड से भाजपा की राजनीति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चुनाव के समय योगी सरकार मुश्किलों में घिर सकती है। लखीमपुर खीरी कांड में मारे गये किसान सिख समुदाय के हैं। भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आने वाले कई सिख शरणार्थी लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, हरदोई और उसके आसपास बस गये थे। खेती इनका मुख्य पेशा है। इस क्षेत्र की 80 फीसदी आबादी गन्ने की खेती पर निर्भर है। इसमें सिख और गैरसिख दोनों शामिल हैं। किसान का मुद्दा इस क्षेत्र के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है। अगर किसान के मुद्दे पर राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है तो भाजपा के लिए चिंताजनक बात हो जाएगी। 2017 के चुनाव में इस क्षेत्र के 6 जिलों की 42 विधानसभा सीटों में से 37 पर भाजपा को जीत मिली थी। सपा चार और बसपा सिर्फ एक सीट ही जीत पायी थी। भाजपा के लिए यह जबर्दस्त जीत थी। अगर लखीमपुर खीरी हिंसा का असर चुनावी राजनीति पर पड़ा तो भाजपा के लिए पिछली जीत (37) को दोहराना कठिन हो जाएगा। 2012 में सपा इन छह जिलों ( लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, बहराइच) में 25 सीट जीत चुकी है। अगर लोगों का मूड बदला तो कुछ भी हो सकता है।

कितने रंग दिखाएगी राजनीति ?
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, लखीमपुर खीरी हिंसा को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए आंदोलन पर उतर आयी हैं। उन्होंने एलान किया है कि जब तक अजय मिश्र टेनी इस्तीफा नहीं देते, लड़ाई जारी रहेगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी दखल दे चुका है। अगर अदालत की सुनवाई में केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्र के पुत्र के विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण मिलता है तो मोदी और योगी सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। फिलहाल भाजपा को यह नहीं सूझ रहा कि वह कैसे इस विवाद से बाहर निकले। भाजपा सांसद वरुण गांधी के बयान के बाद यह मामला और उलझता दिख रहा है। उन्होंने कहा है कि लखीमपुर खीरी हिंसा को सिख बनाम हिंदू के रूप में दिखाने की कोशिश हो रही है। अगर ऐसा है तो यह एक गंभीर मसला है।












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