Lok Sabha Election 2024: बंगाल में ममता के सामने कहां टिकेगी बीजेपी, 35 सीटों के लक्ष्य में कितना दम?
बंगाल में नए साल में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले सत्ताधारी टीएमसी और विपक्षी बीजेपी दोनों के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। दोनों ही दलों को अपने-अपने स्तर पर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और जिसने इन्हें संभाल लिया, बाजी उसी के हाथ लगेगी।
मुख्ममंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है, कई केंद्रीय एजेंसियों ने जांच का शिंकजा कस रखा है। ऊपर से कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट से तालमेल होने में दिक्कत से इंडिया ब्लॉक को लेकर भी सही संदेश नहीं जा पा रहा है।

इंडिया के फसाद से भाजपा को कितना फायदा?
बंगाल में विपक्षी दलों के इंडिया में सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद से जहां बीजेपी को फायदा मिलने की संभावना है। वहीं बीजेपी के सामने अपनी ही चुनौतियों का पहाड़ है। पार्टी राज्य में संगठनात्मक संकट झेल रही है। ऊपर से अंदरूनी लड़ाई ने परेशानी और बढ़ा रखी है।
पीएम मोदी के दम पर बीजेपी ने 35 सीटें जीतने का सेट किया टारगेट
बीजेपी ने हाल ही में बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 35 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। इस टारगेट के पीछे एक तथ्य ये लग रहा है कि पार्टी को इस बार भी लोकसभा चुनावों में राज्य में पीएम मोदी की लहर चलने पर पूरा यकीन है।
ममता ने खुद को किया पीएम उम्मीदवारी की रेस से बाहर
दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक को बता दिया है कि राज्य में बीजेपी को रोकने की ताकत अकेले टीएमसी में है। लेकिन, उन्होंने इंडिया ब्लॉक की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम उम्मीदवार बताकर खुद को इस रेस से बाहर भी कर लिया है।
ममता ने ऐसे समय में खुद के पीएम उम्मीदवार बनने की अटकलों पर ब्रेक लगाया है, जब प्रदेश में पार्टी का नेतृत्व वह धीरे-धीरे भतीजे अभिषेक बनर्जी को ट्रांसफर करती जा रही हैं और भाजपा को परिवारवाद के खिलाफ यहां भी अभियान चलाने का हथियार थमा चुकी हैं।
2023 में बंगाल के हर चुनाव में दिखा टीएमसी का दबदबा
टीएमसी की राज्य में फिलहाल सबसे बड़ी ताकत यही है कि घोटाले, भ्रष्टाचार और परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोपों के बावजूद 2023 में चाहे पंचायत चुनाव हुए हों या फिर कोई भी उपचुनाव पार्टी ने लगभग एकतरफा जीत दर्ज करके अपना दबदबा कायम रखके दिखाया है।
टीएमसी के सामने 'चेहरे' का संकट
लेकिन, लोकसभा चुनावों में उन्हें जहां प्रदेश में सुवेंदु अधिकारी जैसे दिग्गज के नेतृत्व का मुकाबला करना है, जो विधानसभा से लेकर सड़कों तक पर उनसे लोहा ले रहे हैं। तो साथ ही साथ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के सामने विपक्ष का विकल्प भी पेश करना है।
बंगाल में 10 साल में हुए हर चुनाव में बढ़ती जा रही है बीजेपी की ताकत
ममता के सामने तथ्य यह है कि अगला चुनाव देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए हो रहा है, जिसमें वह खुद ही दावेदार की रेस से बाहर हो चुकी हैं। 2014 में राज्य में टीएमसी अकेले 34 सीटें जीती थी और कांग्रेस को चार सीटें मिली थी और लेफ्ट फ्रंट और भाजपा दो-दो सीटें जीत पाई थी।
वही टीएमसी 2019 में 22 सीटों तक सिमट गई थी और भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से 18 सीटें जीत ली थी। कांग्रेस घटकर आधी (2) पर रह गई थी। 2021 के विधानसभा चुनाव को जरूर बीजेपी ने बहुत हाइप दिया, लेकिन वह ममता को सत्ता से बेदखल नहीं कर सकी।
लेकिन, अकेले 77 सीटें जीतकर उसने खुद को बंगाल में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में स्थापित कर लिया और लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस को गठबंधन कर लेने के बावजूद तीसरे नंबर पर भी बहुत दूर धकेलने में सफलता हासिल कर ली।
विधायकों-सांसदों के पाला बदलने के बावजूद जमीनी संघर्ष में जुटी है बीजेपी
भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि उसके कई विधायक सत्ता का स्वाद लेने के लिए टीएमसी में जा चुके हैं और उसके विधायकों की संख्या घटकर 69 रह चुकी है। लेकिन, यह भी तथ्य ही है कि विपक्ष के रूप में सड़क से लेकर सदन तक बीजेपी ही दिखती है और विधानसभा चुनावों में ममता को हराने वाले सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक प्रभाव ही नजर आता है।
बाबुल सुप्रियो जैसे कुछ नेता जिस तरह से केंद्र में सत्ता का आनंद भोगने के बाद भाजपा को लात मारकर निकल चुके हैं, उसने पार्टी को अंदर से हिलाया जरूर है, लेकिन कैडर पर आधारित पार्टी संघर्ष करने में पीछे नहीं हट रही है।
ममता के दिमाग में बजी है 'खतरे की घंटी'!
यही वजह है कि टीएमसी ने उत्तर बंगाल से लेकर आदिवासी बहुल जंगलमहल के इलाकों पर हाथ-पैर मारने की कोशिशें शुरू की हैं। इन सब जगहों पर या तो ममता को अपने इंडिया ब्लॉक की सहयोगियों से टक्टर रहा है या फिर बीजेपी ने चुनावों में उसे बेदम किया है।
बीजेपी और सगयोगियों के क्षेत्र में मेहनत कर रही हैं ममता
पिछले दिनों खुद ममता अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जैसी जगहों पर कैंप कर चुकी है और चाय बागान के मजदूरों के लिए तरह-तरह की घोषणाएं और वादे कर आई हैं। उन्होंने बंद पड़े चाय बागानों को खोलने की पहल की है, तो उन्हें विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाना भी शुरू किया है।
टीएमसी की रणनीति भांप कर बीजेपी ने भी यहां अपने कार्यक्रताओं को सक्रिय कर दिया है। इसी तरह से टीएमसी ने आदिवासी बहुल जंगलमहल क्षेत्र में भी मेहनत शुरू की है, जिसने 2019 में उत्तर बंगाल की तरह बीजेपी के लिए 'कमल' खिलाने का काम किया था।
भाजपा ने टक्कर देने की है पूरी तैयारी
ममता मतुआ समुदाय को भी लुभाने की कोशिशों में जुट चुकी हैं, जो सीएए कानून के दम पर भारतीय नागरिकता पाने की उम्मीद में लगे हैं। 2019 में यह समुदाय पूरी तरह से भाजपा के साथ नजर आया था और अबकी बार भी पार्टी उन्हें अपने साथ रखने की कोशिशों में जुटी हुई है।
इस तरह से देखें तो 2014 से लेकर अबतक के सारे चुनाव में टीएमसी बीजेपी पर भारी पड़ी है। लेकिन, तथ्य यह है कि भाजपा ने जिस रफ्तार से अपना ग्राफ बढ़ाना जारी रखा है और उसके कार्यकर्ता जमीनी स्तर बंगाल की मुश्किल राजनीति में भी सत्ताधारी दल के आक्रामक कैडर के साथ संघर्ष में टिकी हुई है तो लोकसभा चुनावों का परिणाम आखिर किस ओर झुकेगा, कहना आसान नहीं है।
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