क्या पश्चिम बंगाल आने में राहुल गांधी ने जानबूझकर देर की?

क्या पश्चिम बंगाल आने में राहुल गांधी ने जानबूझकर देर की?

कोलकाता। जब चार चरण के चुनाव खत्म हो गये तब जाकर राहुल गांधी को पश्चिम बंगाल की याद आयी। वे 14 अप्रैल को चुनाव प्रचार के लिए उत्तर दिनाजपुर और दार्जिलिंग पहुंच रहे हैं। 14 अप्रैल को खरमास खत्म हो रहा है। क्या वे शुभ मुहर्त की तलाश में थे ? चार चरणों में 135 सीटों पर चुनाव हो चुका है। बाकी चार चरणों में 159 सीटों पर वोटिंग बाकी है। 2016 के चुनाव में दूसरे नम्बर पर रहने वाली कांग्रेस इस बार सीपीएम के छोटे भाई के रूप में किस्मत आजमा रही है। सीपीएम 137 सीटों पर जब कि कांग्रेस 91 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस ने शुरू से पश्चिम बंगाल में वो जोश नहीं दिखाया जो किसी राजनीतिक दल को चुनाव जीतने के लिए जरूरी होता है। पहले चरण के चुनाव के ठीक पहले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी असम तो आये लेकिन उससे सटे पश्चिम बंगाल नहीं गये। क्या कांग्रेस ये मान कर चल रही है कि वह चाहे जितना भी जोर लगा ले, पश्चिम बंगाल में उसका कुछ भला नहीं होने वाला ? राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी अब तक चुनाव प्रचार के लिए क्यों नहीं आये पश्चिम बंगाल? 135 सीटों पर चुनाव हो जाने के बाद राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल आने का कोई मतलब है ?

क्यों नहीं आये राहुल-प्रियंका ?

क्यों नहीं आये राहुल-प्रियंका ?

दो नावों पर सवार कांग्रेस असमंजस के भंवर में फंसी रही। उसने फैसले भी अजब-गजब लिये। कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा से गठबंधन कर लिया जब कि केरल में वह इसके खिलाफ मैदान में थी। केरल में कांग्रेस को लगा कि वह सत्ता में लौट सकती है। इसलिए सारा ध्यान वहीं लगाया। राहुल गांधी ने सीपीएम के नेतृत्व वाली विजयन सरकार के खिलाफ जम कर हमला बोला। केरल में कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच आमने सामने की लड़ाई थी। राहुल गांधी संभावित जीत को देखते हुए कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। अगर केरल चुनाव (6 अप्रैल) के दरम्यान राहुल या प्रियंका गांधी पश्चिम बंगाल जाते तो उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान कम्यूनिस्ट नेताओं के साथ मंच साझा करना पड़ता। राहुल गांधी को किसी कम्यूनिस्ट उम्मीदवार के लिए वोट भी मांगना पड़ता। इससे कांग्रेस के लिए केरल में शर्मनाक स्थिति हो जाती। कांग्रेस समर्थकों में भ्रम पैदा हो जाता। केरल की कम्यूनिस्ट सरकार राहुल गांधी का मजाक उड़ा सकती थी। इस बात से बचने के लिए राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल नहीं जाना ही मुनासिब समझा। केरल के लिए पश्चिम बंगाल के हितों की कुर्बानी दे दी। प्रियंका और सोनिया गांधी के भी नहीं आने की यही वजह थी।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने क्यों डाल दिये हथियार

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने क्यों डाल दिये हथियार

2016 में 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने इस बार पश्चिम बंगाल में क्यों हथियार डाल दिये ? उसने 33 सीटों वाले वाम मोर्चा से पीछे रहना कैसे स्वीकार कर लिया ? पहली बार चुनावी मैदान में कूदे फुरफुराशरीफ के अब्बास सिद्दीकी को कैसे 28 सीटें देना मंजूर कर लिया ? दरअसल भाजपा को रोकने की कोशिश में कांग्रेस अपना कोई भी नुकसान सहने के लिए तैयार है। कांग्रेस के विक्षुब्ध गुट-जी 23 ने भी पश्चिम बंगाल में अब्बास सिद्दीकी के साथ कांग्रेस के गठबंधन पर सवाल उठाया था। अब्बास सिद्दी की पार्टी आइएसएफ पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगता रहा है। जी-23 के नेता आनंद शर्मा ने कहा था कि आइएसएफ के साथ गठबंधन कांग्रेस की मूल विचारधारा से बिल्कुल अलग है। कांग्रेस हर तरह की साम्प्रदायिकता के खिलाफ है। यानी पश्चिम बंगाल में चुनावी रणनीति को लेकर कांग्रेस शुरू से ढुललमुल रही।

कितना जोश फूंक पाएंगे राहुल गांधी ?

कितना जोश फूंक पाएंगे राहुल गांधी ?

राहुल गांधी 14 अप्रैल को उत्तर दिनाजपुर के गोआल पोखर में चुनावी सभा करेंगे। उत्तर दिनाजपुर की 9 सीटों पर छठे चरण के तहत 22 अप्रैल को चुनाव है। 2016 के चुनाव में इस जिले की 9 सीटों में से कांग्रेस को केवल एक सीट मिली थी। रायगंज से कांग्रेस के मोहित सेन गुप्ता जीते थे। गोआल पोखर तृणमूल कांग्रेस की सीट है। लेकिन राहुल गांधी की पहली चुनावी सभा रायगंज की बजाय गोआल पोखर में हो रही है। राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी की गैरमौजूदगी में कांग्रेस की पतवार अधीर रंजन चौधरी ने थाम रखी है। अधीर रंजन लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता हैं और पश्चिम बंगाल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। इस दो बड़े दायित्वों से कांग्रेस में उनकी अहमियत समझी जा सकती है। रविवार को अधीर रंजन चौधरी ने वाममोर्चा के अध्यक्ष विमान बसु के साथ चौरंगी (कोलकाता) के कांग्रेस उम्मीदवार संतोष पाठक का प्रचार किया। कोलकाता की 12 सीटों पर 26 अप्रैल और 29 अप्रैल को चुनाव है। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता कब से राहुल गांधी के आने का इंतजार कर रहे हैं। उनके आने की खबर से पार्टी में उत्साह भी है। लेकिन राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सब कुछ गंवा के होश में आये तो क्या हुआ ?

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