Varanasi news: छितौना में जमीन विवाद पर ठाकुर बनाम राजभर में बंटी सियासत, पूर्वांचल की राजनीति में पड़ेगा असर

Varanasi news: वाराणसी के छितौना गांव में दो परिवारों के बीच हुआ एक मामूली विवाद अब पूर्वांचल की राजनीति में जातीय ध्रुवीकरण का कारण बनता जा रहा है। बांस की कोठी और छूट्टा पशु को लेकर शुरू हुई तकरार अब सियासी बयानबाजी और रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।

स्थानीय झगड़े में पहले लाठी-डंडे चले, फिर पुलिस आई, और अब राजनीतिक नेता और जातीय संगठन अपने-अपने समाज के हितों की दुहाई देने में लग गए हैं। जहां एक ओर राजभर समाज लामबंद हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ठाकुर समाज भी पीछे नहीं।

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आईए समझते हैं क्‍या है पूरा मामला?

दरअसल, झगड़ा 5 जुलाई को शुरू हुआ। जब जमीन के आधे बिस्वा टुकड़े पर दो पक्ष भिड़ गए। कुछ लोगों का कहना है कि छूट्टा पशु को एक-दूसर पक्ष ने खेतों में भगा दिया था। इसी को लेकर मारपीट हुई।

मारपीट के बाद इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। लोगों का कहना है कि यह मामला सामान्य थाने स्तर का था और सुलझ सकता था, लेकिन इसी बीच इस मामले में मंत्री अनिल राजभर की एंट्री हो गई।

राजभर ने घायलों में से सिर्फ अपने समाज के लोगों से अस्पताल में मुलाकात की। इस एकतरफा हस्तक्षेप को लेकर संजय सिंह के परिवार और उनके समर्थकों में नाराजगी दिखी। वहीं दूसरे पक्ष के ऊपर मुकदमा भी दर्ज हो गया। यहीं से सियासी पारा चढ़ने लगा।

घेराव करने के बाद लिखा गया मुकदमा

इस मामले में ठाकुर पक्ष के संजय सिंह भाजपा के बूथ अध्यक्ष हैं, उनके पक्ष की एफआईआर शुरू में नहीं लिखी गई। यही कारण था कि करणी सेना इस विवाद में कूद पड़ी और पुलिस थाने का घेराव किया। दबाव में आकर 24 घंटे बाद दूसरा पक्ष भी सुना गया।

इस घटनाक्रम से भाजपा की आंतरिक खींचतान भी सतह पर आ गई है। एक ओर मंत्री अपने समाज का पक्ष लेते दिखे, दूसरी ओर पार्टी कार्यकर्ता न्याय के लिए संघर्ष करता दिखा। पार्टी के भीतर यह संदेश ठीक नहीं गया।

सपा और सुभासपा ने भी की मुलाकात

समाजवादी पार्टी ने इस पूरे प्रकरण को सरकार की नाकामी बताया। पार्टी का प्रतिनिधिमंडल छितौना गांव पहुंचा और राजभर समुदाय से संवाद किया। सपा ने दावा किया कि उनका रिश्ता राजभर समाज से मजबूत और ऐतिहासिक रहा है।

राम अचल राजभर की अगुआई में गए प्रतिनिधिमंडल ने अनिल राजभर को राजभर समाज का हितैषी मानने से इनकार किया। वहीं सुभासपा के अरविंद राजभर ने डीजीपी से मुलाकात कर इस विवाद में निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।

जांच के लिए एसआईटी गठित

विवाद बढ़ने पर पुलिस कमिश्नर ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी है। केस संख्या 440/2025 और 445/2025 की जिम्मेदारी अब विशेष जांच दल के पास है, जिसकी निगरानी उच्च पुलिस अधिकारी कर रहे हैं।

साथ ही चौबेपुर थानाध्यक्ष को लापरवाही के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया है। पूर्वांचल की करीब 36 विधानसभा सीटों पर राजभर समाज की अहम भूमिका है। माना जा रहा है कि अनिल राजभर इस मुद्दे को भुना कर अपने समाज को दोबारा भाजपा से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

इस विवाद ने गांव की सीमा लांघकर लखनऊ के राजनीतिक गलियारों तक दस्तक दे दी है। हर दल इसे अपने हिसाब से भुनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इसका सीधा असर स्थानीय सामाजिक तानेबाने पर पड़ रहा है।

राजनीति से थक चुके ग्रामीण, लगाए बैनर

गांव की जनता अब कह रही है कि यह सिर्फ उनका आपसी मामला था, जिसे मिल-बैठकर सुलझाया जा सकता था। लगातार बढ़ते राजनीतिक दखल से परेशान होकर ग्रामीणों ने गांव के बाहर बकायदे एक बैनर टांग दिया है - "बाहरी लोगों का गांव में प्रवेश और राजनीतिक हस्तक्षेप वर्जित है।"

बैनर में अपील की गई है कि बाहरी लोग गांव की एकता को न तोड़ें और माहौल न बिगाड़ें। ग्रामीणों का कहना है कि वे खुद इस विवाद को सुलझा सकते हैं, इसलिए नेताओं और संगठनों से अनुरोध है कि वे गांव को जातीय राजनीति का मैदान न बनाएं।

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