world environment day 2022:एक्सप्रेस वे के नाम पर पेड़ों की बलि और धधकते जंगल, कैसे सुरक्षित है पर्यावरण

विश्व पर्यावरण दिवस:उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण की समस्या

देहरादून, 5 जून। आज विश्व पर्यावरण​ दिवस है। पर्यावरण को बचाने और भविष्य को सुरक्षित रखने को हर कोई आज चिंतित नजर आ रहा है। लेकिन कई ऐसी समस्याएं इस वर्ष उत्तराखंड के सामने खड़ी हुई जिससे पर्यावरण संरक्षण को लेकर सवाल भी खड़े हुए हैं। विकास के नाम पर बिजली परियोजना के लिए एक गांव की जलसमाधि हो या फिर एक्सप्रेस वे के नाम पर हजारों पेड़ों की बलि। इतना ही नहीं हर बार की तरह इस बार भी उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाओं ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई प्रश्न खड़े कर दिए है। जो कि आज के दिन सवाल उठने लाजिमी है। ए​क नजर उत्तराखंड की इस वर्ष की 3 बड़ी समस्याओं पर जो कि पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

 world environment day 2022:sacrifice of trees and blazing forest in the name of expressway, how is the environment safe

तीन प्रोजेक्ट, हजारों पेड़ों की बलि
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों के चौड़ीकरण और हाईवे को तैयार करने के लिए हजारों पेड़ों की बलि दी जा रही है। जिसके लिए तीन प्रोजेक्ट एक साथ काम करने जा रहे हैं। ​एक प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, जबकि दो प्रोजेक्ट जल्द ही शुरू करने की तैयारी है। रिंग रोड के चौड़ीकरण के काम के लिए 2,200 पेड़ों को काटे जाने की तैयारी चल रही है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के निर्माण में भी 11 हजार पेड़ों की बलि चढ़ेगी। साथ ही हिमाचल प्रदेश को देहरादून से जोड़ने वाली हाईवे के​ लिए साढ़े 5 हजार पेड़ काटे जाने की तैयारी है। ऐसे में हरित दून के लिए आने वाले समय में पर्यावरण की दृष्टि से कई तरह की समस्याएं सामने आ सकती है। जिसको लेकर समाजसेवी अभी से चिंता जताने लगे हैं। देहरादून में रिंग रोड के चौड़ीकरण का काम जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है। इसके लिए 2,200 पेड़ों को काटे जाने की तैयारी चल रही है। साथ ही, 400 पेड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाना है। जोगीवाला से रिंग रोड-लाडपुर, सहस्रधारा क्रॉसिंग से कुल्हान तक 14 किमी लंबी सड़क के चौड़ीकरण की मंजूरी एक साल पहले मिल गई थी। इसके लिए सेंट्रल रोड फंड यानी सीआरएफ से 77 करोड़ रुपये दिए गए थे। इस पूरी सड़क को फोरलेन बनाया जाना है, लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया था। कुछ पेड़ इसकी जद में आ रहे हैं। इनको काटने की अनुमति लेने में कुछ समय लगा है। अब इसकी अनुमति भी मिल गई है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के निर्माण में भी 11 हजार पेड़ों की बलि चढ़ेगी। जिस पर काम तेजी से चल भी रहा है। जिसका लंबे समय से विरोध हो रहा है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश को देहरादून से जोड़ने वाली हाईवे की तैयारियां भी जोर-शोर से चल रही है। जिसका फेस-1 का काम लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन इस परियोजना में धर्मावाला क्षेत्र से साढ़े 5 हजार से अधिक पेड़ विकास की बलि चढ़ जाएंगे।
बिजली परियोजना के लिए गांव की जलसमाधि
उत्तराखंड में देहरादून के कालसी ब्लॉक का लोहारी गांव अब जलसमाधि ले चुका है। व्यासी जल विद्युत परियोजना के लिए गांव को जलसमा​धि दे दी गई है। अब गांव में रह रहे 70 से ज्यादा परिवार पास के ही एक स्कूल में रहकर ​सरकार से विस्थापन की मांग कर रहे हैं। गांव वालों का सिस्टम और सरकार से एक ही सवाल है कि उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया है, वह कहां तक सही है। कम से कम सरकार को उनके विस्थापन के बारे में सही तरह से सोचना चाहिए था, दूसरों को रोशन करने के लिए उन्हें अंधेरे में क्यों रखा गया। उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है। यहां के प्राकृतिक संसाधन देश ही नहीं विदेश को भी रोशन कर रहे हैं। जिसका लाभ सभी को मिल रहा है। अब देहरादून जिले के लोहारी गांव में यमुना नदी पर बनी जल विद्युत परियोजना से सालाना 330 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन होना है। 120 मेगावाट की लखवाड़-व्यासी जल विद्युत परियोजना के लिए आवश्यक सभी स्वीकृतियां प्राप्त करने के बाद वर्ष 2014 में परियोजना पर दोबारा कार्य शुरू हुआ। 1777.30 करोड़ की लागत वाली इस परियोजना के डूब क्षेत्र में सिर्फ लोहारी गांव ही आ रहा है। लेकिन देश को रोशन करने के लिए एक ओर गांव जलमग्न हो गया।
साढ़े तीन माह में हजारों हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में
उत्तराखंड हरित प्रदेश के नाम से जाना जाता है। यहां प्रकृति ने खुलकर वन संपदा दी है। लेकिन जिस तरह की लापरवाही इन जंगलों के साथ की जा रही है और हर बार जंगल आग की चपेट में आ रहे हैं। इससे आने वाले समय में वन संपदा को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। अब तक फायर सीजन को साढ़े तीन माह बीत चुके हैं। उत्तराखंड में अब तक 3176 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ चुका है। फायर सीजन 15 जून तक माना जाता है। 15 फरवरी से 15 जून का समय जंगलों के लिहाज से राज्य के लिए च‍िंताजनक रहता है। इस फायर सीजन में पहले डेढ़ माह यानी मार्च तक ज्यादा दिक्कत नहीं आई। लेकिन अप्रैल की शुरूआत से पारा बढ़ता चला गया। गर्मी के कारण जंगलों में नमी खत्म हो गई। इस दौरान जाने-अनजाने या शरारती तत्वों की वजह से आग का दायरा बढ़ता चला गया। जिस वजह से अप्रैल महीने में ज्यादा नुकसान हुआ। मई में बारिश होने के कारण थोड़ा राहत जरुर मिली। लेकिन एक बार फिर जून में पारा चढ़ता जा रहा है। जो कि ​चिंता का विषय है। जब तक मानसून नहीं आता तब तक जंगल ऐसे ही धधकते र​हेंगे। जंगल की आग ने प्लांटटेशन क्षेत्र के अलावा बड़े पेड़ों को भी नुकसान पहुंचाया। अब तक कुमाऊं में 1562.8 और गढ़वाल में 1262.25 हेक्टेयर जंगल जला है। इसके अलावा वन्यजीव आरक्षित क्षेत्र में 371.27 हेक्टेयर नुकसान हुआ। पर्यावरणीय क्षति का आकलन 82 लाख पार हो चुका है। जो कि गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।

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