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Uttarakhand Land Law: नया भू कानून लागू होने से पहले ही क्यों शुरू हुआ विरोध,जानिए किसने और क्यों बताया धोखा

Uttarakhand Land Law: उत्तराखंड की विधानसभा में भू कानून का संसोधन विधेयक पास हो गया है। जिसके बाद अब नया भू कानून लागू हो जाएगा। जिसमें हरिद्वार व उधमसिंह नगर दो जिलों को छोड़कर बाकि 11 जिलों में बाहरी लोगों के जमीन खरीदने पर रोक लग गई है।

लेकिन नए भू कानून के विधानसभा से पास होते ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। मूल निवास, भू-क़ानून संघर्ष समिति ने भू-क़ानून में किए गए संशोधनों को उत्तराखंड की जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा बताया और इसे जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला क़ानून बताया।

Why did protest start even before new land law implemented Uttarakhand know who called it fraud why

संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने भू-क़ानून के संशोधन विधेयक की प्रति फाड़ते हुए इसे माफ़िया के पक्ष में बताया। मूल निवास, भू-क़ानून संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने कहा कि भू-क़ानून के संशोधित विधेयक में नगरीय क्षेत्रों को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया है। सबसे ज्यादा बेशकीमती ज़मीनें शहरों में ही हैं और यहां जमीन खरीदने की कोई पाबंदी नहीं है।

निकायों के विस्तार के चलते लगातार ग्रामीण क्षेत्रों की ज़मीन शहरों में शामिल हो रही है। उन्होंने कहा कि देहरादून, ऋषिकेश, कोटद्वार, पौड़ी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर, जोशीमठ, गैरसैंण, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रामनगर, नैनीताल, भवाली, टिहरी, नरेंनगर, देवप्रयाग, चंबा, रानीखेत, धारचूला सहित अन्य निकायों में कोई भी बाहरी व्यक्ति बेतहाशा जमीन खरीद सकता है।

यहां तक कि केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री नगर पंचायत क्षेत्र में भी जमीन खरीदने की छूट है। यह क़ानून सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र के लिए है। यहां 250 वर्ग मीटर ही कोई बाहरी व्यक्ति जमीन खरीद सकता है। शहरों में जमीन खरीदने की कोई लिमिट नहीं है। राज्य निर्माण के बाद शहरों की प्राइम लैड को माफ़िया और बाहरी लोगों ने खुर्द-बुर्द किया है। संघर्ष समिति की मुख्य मांग यही थी कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि खरीदने का एक ही क़ानून बने। लेकिन सरकार ने पुराने क़ानून में ही लीपापोती की है।

उन्होंने कहा कि हरिद्वार और उधमसिंहनगर जिले को भूमि क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा भू माफिया इन्ही दो जनपदों में हैं और यहाँ किसानों की ज़मीन खत्म हो रही है। मैदानी मूल के व्यक्ति भी इस बात की चिंता कर रहे हैं। सरकार की मंशा उत्तराखंड की डेमोग्राफी बदलना है, ताकि पर्वतीय राज्य की अस्मिता को खत्म किया जा सके।

लगातार जनसंख्या बढ़ने से भविष्य में होने जा रहे परिसीमन से हरिद्वार और उधमसिंहनगर की विधानसभा सीटें बढ़ने जा रही है। यह चिंता सिर्फ पर्वतीय मूल के लोगों की नहीं है, बल्कि मैदानी लोग भी इसको लेकर चिंतित हैं। समान नागरिक संहिता की बात करने वाली सरकार एक राज्य में दो-दो भू-क़ानून थोप रही है।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र की कृषि भूमि को 30 साल तक पूंजीपतियों को पट्टे पर देने का भी प्रावधान किया गया है। इससे हमारे काश्तकार अपने ही खेतों में नौकर या चौकीदार बन जायेंगे।उन्होंने कहा कि संघर्ष समिति इस काले क़ानून को जनता के बीच ले जाएगी और सरकार द्वारा किये गए छलावे को बताएगी। एक बार फिर जनता को लामबंद किया जाएगा।

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