Uttarakhand Tunnel Rescue: गरीबी ने किया मजबूर, 18 हजार रुपए के लिए जान हथेली पर लेकर टनल में करने पहुंचे काम
Uttrakhand Uttarkashi Tunnel Rescue: उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित सिल्क्यारा टनल में फंसे सभी 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। 12 नवंबर की सुबह हुए हादसे में अलग-अलग जगह के 41 मजदूर टनल के अंदर फंस गए थे। 17 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद सभी को सकुशल बाहर निकाला गया। लेकिन ये 17 दिन उन मजदूरों के लिए जितने मुश्किलों भरे थे। उतनी ही मुश्कीलें उनके परिवार वालों पर भी आ पड़ी थी। क्योंकि ये मजदूर ही अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए एक मात्र सहारा थे। गरीबी की वजह से ये सभी मजदूर अपना घर परिवार छोड़ कर टनल में काम करने पहुंचे थे।

उत्तराखंड में चार धाम राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट का काम चल रहा है। सिल्क्यारा टनल भी इस 1.5 बिलियन डॉलर प्रोजेक्ट का हिस्सा है। 12 नवंबर की सुबह हुए हादसे में टनल के अंदर करीब 200 मीटर तक मलबा भर गया। इसके अंदर काम कर रहे 41 मजदूरों के पास निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। हादसे की सुचना मिलते ही अंदर फंसे सभी मजदूरों के परिजन परेशान हो गए। 17 दिनों तक ये मजदूर जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे। साथ ही हलक में अटकी रही उनके परिवार की जान।
किसी का बेटा इस टनल में फंसा था तो किसी का पति, किसी का पिता। हादसे के बारे में पता चलते ही सभी अपने परिजनों के पास पहुंचने के लिए बेचैन हो उठे। लेकिन यहां भी गरीबी आड़े आ गई। मजदूरों के परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वो उत्तरकाशी तक की टिकट खरीद सकें। किसी के परिवार को ये भी नहीं पता था कि उत्तरकाशी तक जाया कैसे जाता है। एबीपी न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक अपनों तक पहुंचने के लिए किसी ने जेवर बेचे तो किसी ने कुछ और सामान। उन्हें ये भी चिंता थी कि टनल में फंसे उनके परिजनों को पैसों की जरुरत होगी। साथ ही ये भी पता नहीं था कि उन्हें टनल से बाहर निकालने में कितना समय लगने वाला है। जैसे-तैसे पैसों का इंतजाम कर के मजदूरों के परिजन उत्तरकाशी पहुंचे।
टनल में फंसे मजदूरों में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर का मंजीत भी था। बेटे की सुरंग में फंसे होने की बात जैसे ही पिता (अखिलेश) तक पहुंची उन्होंने पत्नी की नथ, पायल और कुछ और गहने गिरवी रख कर 9 हजार रुपए का इंतजाम किया। अखिलेश बताते हैं कि रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने तक उनके पास केवल 250 रुपए ही बचे हैं। मंजीत उनका दूसरे नंबर का बेटा है। बड़े बेटे दीपू की जान मुंबई के एक सड़क हादसे में चली गई थी। बेटे के सकुशल सुरंग से बाहर निकलने के बाद अखिलेश ने राहत की सांस ली। उनका कहना है कि अब वो कभी अपने बेटे को सुरंग में काम करने नहीं भेजेंगे।
झारखंड के रांची के पास रहने वाले अनिल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। अनिल की मां बताती हैं कि उनका परिवार बेहद गरीब है। गांव में मिट्टी का एक घर है। जैसे-तैसे परिवार का गुजारा चल रहा था। गरीबी से परेशान बेटे ने मात्र 18 हजार रुपए के लिए इतना जोखिम वाला काम चुन लिया।
ये तो केवल 2 लोगों की बात हुई। टनल में फंसे अन्य 39 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सभी गरीबी के मारे, अपना जीवन दांव पर लगा कर सुरंग में काम करने चले आए। ये सभी 41 मजदूर ये जानते हुए भी कि सुरंग में जान जाने का खतरा है यहां काम करने आए। क्योंकि, गरीबी की आग में 18 हजार रुपए उनके लिए वो सहारा था जो उनको और उनके परिवार को जिंदा रख सकता था।
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