नैनीताल में 120 साल से मनाया जा रहा मां नंदा देवी महोत्सव , जानिए उत्तराखंड की कुल देवी नैना देवी का इतिहास

नैनीताल में मां नंदा देवी महोत्सव 1 से 7 सितंबर तक आयोजन

देहरादून, 6 सितंबर। नंदा देवी महोत्सव नैनीताल शहर में 120 वर्षों से मनाया जा रहा है। कोरोना की वजह से दो साल इस महोत्सव को भव्य रूप नहीं मिल पाया था। महोत्सव पर विभिन्न शहरों से पर्यटक नैनीताल आते हैं तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया जाता है। इस महोत्सव का सबसे खास आकर्षण इसके लिए तैयार होने वाली मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां हैं, जो केले के पेड़ से तैयार की जाती हैं। नंदा देवी उत्तराखंड की कुल देवी मानी जाती हैं। 1 से 7 सितंबर तक इस महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

नंदा देवी महोत्सव नैनीताल में 1902 में शुरू हुआ

नंदा देवी महोत्सव नैनीताल में 1902 में शुरू हुआ

नंदा देवी महोत्सव नैनीताल में 1902 में शुरू हुआ था। नैनीताल में 1902 में अल्मोड़ा से आए मोतीराम साह ने नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत की थी, तब नयना देवी मंदिर वर्तमान बोट हाउस क्लब के समीप था। 120 साल से मनाए जा रहे इस महोत्सव के लिए मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण सबसे खास पहलू होता है। इस बार दो साल के बाद भव्य तरीके से इसका आयोजन किया जा रहा है।

नंदा-सुनंदा की मूर्तियां ,कदली यानी केले के पेड़ से तैयार की जाती

नंदा-सुनंदा की मूर्तियां ,कदली यानी केले के पेड़ से तैयार की जाती

नंदा देवी महोत्सव का सबसे खास आकर्षण इसके लिए तैयार होने वाली मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां ,जो कदली यानी केले के पेड़ से तैयार की जाती हैं। इसमें भी कला व पर्यावरण पर खास ध्यान रखा जाता है। इसके लिए प्राकृतिक रंगों के साथ ईको फ्रेंडली वस्तुओं का ही चयन किया जाता है। उपासना के लिए केले के पेड़ से खास तरह की मूर्तियां बनाई जाती हैं।

समापन के साथ इन मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता

समापन के साथ इन मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता

इसके लिए पांच फीट का केले का तना काटकर उसमें खपच्चियों से चेहरे का आकार दिया जाता है। आंख, कान बनाने के साथ नाक बनाने के लिए बड़े बटन लगाए जाते हैं। सांचे को दबाने के लिए रूई भी उपयोग में लाई जाती है। साथ ही तीन मीटर का सूती का कपड़ा लेकर उसे पीले रंग से रंगा जाता है। आकार बनाने के बाद मूर्ति को जेवर पहनाए जाते हैं। महोत्सव के समापन के साथ इन मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता है। इस बार सात सितंबर को विसर्जन होगा।

कभी चांदी से भी इन मूर्तियों का निर्माण किए जाने का भी इतिहास

कभी चांदी से भी इन मूर्तियों का निर्माण किए जाने का भी इतिहास

महोत्सव में समय के साथ बदलाव भी आता गया। भले ही केले के पेड़ से मां नंदा.सुनंदा की मूर्तियां बनाई जाती हैं, मगर कभी चांदी से भी इन मूर्तियों का निर्माण किए जाने का भी इतिहास रहा है। 1955-56 तक चांदी की मूर्तियां बनती थीं। यही नहीं कुछ वर्षों पूर्व थर्माकोल का भी प्रयोग किया जाता था। अब केले के पेड़ से ही इसका निर्माण होता है।

नैनीताल में नैनी झील के उत्त्तरी किनारे पर नैना देवी मंदिर

नैनीताल में नैनी झील के उत्त्तरी किनारे पर नैना देवी मंदिर

नैनीताल में नैनी झील के उत्त्तरी किनारे पर नैना देवी मंदिर स्थित है। 1880 में भूस्‍खलन से यह मंदिर नष्‍ट हो गया था। बाद में इसे दुबारा बनाया गया। यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। नैनी झील के बारें में माना जाता है कि जब शिव सती की मृत देह को लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां.वहां शक्तिपीठों की स्‍थापना हुई। नैनी झील के स्‍थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर की स्‍थापना की गई है।

पौराणिक कथा, नैना देवी के रूप में उमा यानि नन्दा देवी

पौराणिक कथा, नैना देवी के रूप में उमा यानि नन्दा देवी

पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहां यज्ञ में बुलाया, लेकिन अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमन्त्रण तक नहीं दिया। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुंची। अपने पति और अपना निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दुखी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में कूद पड़ी जब शिव को पता चला कि कि उमा सती हो गयी, तो क्रोध में अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट- भ्रष्ट कर डाला। देवताओं ने किसी तरह शिव के क्रोध के शान्त किया। सती के जले हुए शरीर को कन्धे पर डालकर निकले, जहां जहां पर शरीर के अंग किरे, वहां . वहां पर शक्ति पीठ हो गए। जहां पर सती के नयन गिरे थे ,वहीं पर नैना देवी के रूप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। नैनीताल वही स्थान है, मान्यता है कि जहां पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अश्रुधार ने यहाँ पर ताल का रूप ले लिया।

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