उत्तराखंड के इस गांव में होती है नशामुक्त होली, शराब पीकर होली मनाई तो मिलेगी ये सजा, जानिए अनोखी परंपरा
UTTARAKHAND HOLI होली का पर्व आते ही रंग, होल्यार, उमंग और मस्ती का माहौल हर तरफ नजर आता है। खासकर पहाड़ों में होली एक महिनें तक मनाई जाती है। साल भर लोग होली का ब्रेसब्री से इंतजार करते हैं। गुजिया से लेकर कई तरह के पकवानों को भी लोग जमकर एंजॉय करते हैं।
पारंपरिक होली संगीत की धुनों पर थिरकते लोग और अपने पुराने गीतों को गुनगुनाने का भी खास अंदाज होता है। लेकिन धीरे धीरे होली का रंग फीका होता जा रहा है। नशे ने त्योहारों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। शराब से लेकर दूसरे तरह के नशे के सेवन से त्योहार का स्वरुप बदलने लगा है।

उत्तराखंड में एक ऐसा गांव है जहां पहले से ही नशामुक्त होली खेलने की परंपरा है। उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विकासखंड में एक गांव पूरे देश के लिए मिसाल बना हुआ है। द्वाराहाट का मल्याल गांव कई वर्षों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। होली पर यहां जमकर रंग, गुलाल उड़ता है। हर प्रकार की मस्ती होती है। लेकिन इस अवसर पर शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता है। यहां की होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि अनुशासन संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन चुकी है।
इस गांव में पिछले दो दशकों से अधिक समय से होली को लेकर एक अनोखा नियम बना हुआ है। गांव में एकादशी से होली के अंतिम दिन तक शराब, बीड़ी और किसी भी प्रकार के अन्य नशे पर पूरी तरह से प्रतिबंध होता है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब दो दशक पहले गांव में होली के अवसर पर नशे के चलते झगड़े, गाली-गलौज और हुड़दंग की घटनाएं आम थीं। नशे से गांव का माहौल बिगड़ रहा था।
ग्रामीणों ने एक आम सभा बुलाई। उस सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि होली के दौरान गांव में हर तरह के नशे पर पूरी तरह से प्रतिबंध होगा। इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि अगर कोई व्यक्ति नशे की स्थिति में पाया जाता है तो उसके परिजनों को बुलाकर उसे घर भेज दिया जाएगा।
इसके बावजूद अगर वह नहीं मानता है तो नशा उतरने तक गांव की गौशाला में बंद कर दिया जाएगा। इसका असर भी देखने को मिला। होली पर हुड़दंग करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होने लगा और आज द्वाराहाट का मल्याल गांव अपनी नशा मुक्त होली के कारण मिसाल बन चुका है।
यहां एकादशी से होली की शुरुआत होती है, जिस दिन पधान के घर चीर बंधन की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान हर घर से अबीर, गुलाल, रोली, अक्षत, फूल, बताशे और लाल-पीले वस्त्र लाए जाते हैं। गणेश पूजा के साथ होलिका को देवी का प्रतीक मानकर जागृत किया जाता है।
एकादशी की शाम को ही कालिका और भूमिया मंदिर में सभी इकट्ठा होते हैं। यहां महिलाएं और पुरुष पारंपरिक रागों में होगी के गीत गाते हैं। हर परिवार से गुड़ और दक्षिणा भी चढ़ाई जाती है, जिससे प्रसाद के रूप में हलवा तैयार होता है। पधान के घर पर चीर बंधन के बाद गांव के होल्यार गांव के हर घर तक जाते हैं। पारंपरिक होली गीतों और आशीर्वाद के साथ त्योहार मनाया जाता है।












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