शनि देव के सबसे प्राचीन मंदिर के खुले कपाट, चारधाम यात्रा पर जाएं तो यहां करें शनि देव के दर्शन
उत्तरकाशी के खरसाली गांव में शनिदेव का सबसे प्राचीन मंदिर है। शनिदेव मां यमुना के भाई है। यमुनोत्री धाम खरसाली गांव से करीब 5 किमी दूर है। खरसाली गांव ही यमुना जी का शीतकालीन प्रवास है।

उत्तरकाशी के खरसाली गांव में शनिदेव का सबसे प्राचीन मंदिर है। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार शनिदेव मां यमुना के भाई है। यमुनोत्री धाम खरसाली गांव से करीब 5 किमी दूर है। खरसाली गांव ही यमुना जी का शीतकालीन प्रवास है। यहां पर शनिदेव के साथ ही बहन यमुना का मंदिर है।
मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया
मान्यता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। शनिदेव का यह मंदिर वैसे तो पांच मंजिला है। इस मंदिर का निर्माण पत्थर और लकड़ी से किया गया है। जो यात्री यमुनोत्री धाम आते हैं, वे खरसाली गांव में आकर शनिदेव के दर्शन करना नहीं भूलते हैं।
वैशाखी पर खुलते हैं कपाट
जो कि शीतकाल में यहीं रहती हैं। इस मंदिर के कपाट ग्रीष्म काल में भक्तों के लिए वैशाखी पर खुलते हैं। भगवान शनि देव की कांस्य मूर्ति को चाया, सांग्या और नाग देवता के साथ यहां रखा गया है। मान्यता है, कि मंदिर में शनि देव पूरे 12 महीने विराजमान रहते हैं। हर साल भाई दूज या यम द्वितीया के अवसर पर यमुनोत्री धाम के कपाट बंद हो जाते हैं और देवी यमुना की मूर्ति इस मंदिर में लाई जाती है।
मंदिर में एक अखंड ज्योति जलती रहती
मंदिर में एक अखंड ज्योति जलती रहती है। ऐसा माना जाता है, कि मंदिर की अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से ही सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाती है और मंदिर में शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा करने से व्यक्ति को कुंडली के शनि दोष से भी छुटकारा मिल जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन होता है चमत्कार
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक चमत्कार होता है और मंदिर के ऊपर रखे घड़े खुद ही बदल जाते हैं। इस दिन जो कोई भी शनि मंदिर में दर्शन के लिए आता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
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