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देव डोलियों का संगम,अद्भुत सेल्कू मेले में नजर आई संस्कृति और पौराणिक विरासत, खास है मनाने की वजह

उत्तराखंड को देवभूमि यूं ही न​हीं कहा जाता है। चार धाम के साथ ही यहां की देवडोलियों का अपना ही अलग पौराणिक मान्यताएं हैं। साथ ही यहां की संस्कृति और पौराणिक विरासत को ग्रामीण आज भी बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं।

इसकी झलक नजर आती है अद्भुत सेल्कू मेले में। सेल्कू मेला उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र में धूमधाम से मनाते हैं। गोरशाली गांव में दो दिन तक चले सेल्कू मेले का समापन हो गया।

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सेल्कू ग्रामीणों की आस्था से जुड़ा पर्व है। जिसका शाब्दिक अर्थ है सोएगा कौन?। यानि रात भर देवडोलियों का नृत्य, स्थानीय वाद्य यंत्रों जैसे ढोल,रणसिंगा के साथ रासो,तांदी नृत्य। हर तरफ हर वर्ग के लोग खुशी से झूमते हुए नजर आ जाते हैं।

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    देव डोलियों का संगम,अद्भुत सेल्कू मेले में नजर आई संस्कृति और पौराणिक विरासत

    क्या हैं सेल्कू मनाने के कारण
    उत्तरकाशी जिले के उपला टकनौर क्षेत्र में सेल्कू पर्व मनाने के दो कारण प्रमुख है। पहला है भारत तिब्बत व्यापार का प्रतीक और स्थानीय लोगों का दीपावली का पर्व भी सेल्कू के रूप में मनाया जाता है। सेल्कू के बाद स्थानीय लोग ग्रामीण इलाकों को छोड़कर अपने दूसरे ठिकानों की तरफ चले जाते हैं। क्योंकि शीतकाल में ये पूरा इलाका बर्फ से ढक जाते हैं। इसलिए स्थानीय लोग सेल्कू को धूमधाम से मनाते हैं।

    मुखबा में भैलो नृत्य
    सीमांत गांव मुखबा में सोमेश्वर देवता की पूजा होती है। हिंदू पंचाग के अनुसार भाद्रपद के समाप्त और आश्विन के शुरूआत शेक और संक्रांति को मनाया जाता है। इस दौरान उच्च हिमालयी क्षेत्र से पूजा के लिए ब्रह्मकमल समेत कई तरह के फूल लाते हैं और चीड़ व देवदार की लकड़ियों के छिल्लों से भैलो तैयार करते हैं। त्योहार में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें मक्की के आटे से द्यूड़ा, स्वाले, पकौड़े आदि पकवान बनाते हैं। और रात भर चीड़ व देवदार की लकड़ियों के छिल्लों से बना भैलो खेला जाता है।

    सोमेश्वर देवता के पशुवा देते हैं आशीर्वाद
    इस दौरान सोमेश्वर देवता की डोली का नृत्य और ग्रामीणों का रासो व तांदी नृत्य भी आकर्षक का केन्द्र होता है। मेले का समापन होता है सोमेश्वर देवता के पशुवा (एक व्यक्ति जिस पर देवता अवतरित होते हैं) के धारदार डांगरा (एक तरह की तलवार)पर नंगे पांव चलते हुए नृत्य के साथ। इस दौरान देवता ग्रामीणों की समस्याओं को सुनते हैं और उनके समाधान भी बताते हैं।

    गोरशाली समेत इन गांवों में सेल्कू मनाने की वजह
    ग्रामीण और पंडित महेश उनियाल बताते हैं कि उपला टकनौर के गांवों जैसे अष्टमंडली गोरशाली, रैथल, स्याबा, सारी, सौरा आदि गांवों में सेलकू के बाद धान की कटाई शुरू हो जाती है। पूरे टकनौक क्षेत्र में सेल्कू पर्व का समापन गोरशाली में पूर्णिमा के दिन से होता है।

    पूर्वजों की परंपरा और उत्साह
    इस क्षेत्र में सेल्कू पर्व मनाने के पीछे पूर्वजों की परंपरा और किसानों का उत्साह है। सेल्कू पर्व पर ग्रामीण अपने देवी देवताओं से अपने खेती और किसानी बेहतर होने की भी मन्नतें मांगते हैं। सेल्कू में गांव की बेटियां,बहुयें सभी ग्रामीण, मेहमान रासो नृत्य करते हुए उल्लास के साथ रासो नृत्य लगाती हैं। बाद में सभी सोमेश्वर देवता का आशीर्वाद लेकर अगले वर्ष की खुशहाली के साथ मिलने का वादा करते हुए विदा लेते हैं।

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