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Ramlila 120 सालों की परंपरा, यहां भगवान राम का नहीं ईष्ट वासुकी नाग का होता है राजतिलक​, ये है वजह

Ramlila उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा खास है, जिस वजह से इसे देवभूमि कहा जाता है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में इन दिनों जहां बर्फीली सर्दियां पड़ रही हैं, वहीं उत्तरकाशी मुख्यालय से 40 किमी दूर गोरशाली गांव में रामलीला का मंचन हो रहा है। यहां आज भी करीब 120 सालों से ग्रामीण पूरे उत्साह और परंपरा के साथ रामलीला का मंचन करते आ रहे हैं।

 Ramlila tradition 120 years, here coronation is not done Lord Ram but by Vasuki Naag reason.

इसके साथ ही खास बात यह है कि राजशाही प्रतिबंध की वजह से परंपरा का निर्वाहन करते हुए राजतिलक भगवान राम के पात्र का नहीं, बल्कि गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का किया जाता है। हालांकि 73 साल पहले राजशाही हटने के बाद ईष्ट वासुकी नाग की डोली के सामने ​ही राम का राजतिलक करते हैं।

गोरशाली गांव के पंडित प्रकाश चंद्र नौटियाल शास्त्री ने बताया कि उत्तरकाशी के भटवाड़ी के गोरशाली गांव में रामलीला की शुरूआत 1904 में हुई थी। तत्कालीन टिहरी रियासत के गुप्तचरों ने राजा तक इसकी सूचना दी। राजा होने की वजह से भगवान राम के पात्र के राजतिलक पर आपत्ति जताई गई।

इसके बाद राजा ने रामलीला का मंचन करने के लिए एक शर्त सामने रखी। राजा ने ताम्र पत्र देकर रामलीला को मान्यता दी और ग्रामीणों को राजतिलक गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का करने की बात कही। तब से यह परंपरा चली आ रही है। हालांकि अब राजतिलक के समय ईष्ट वासुकी नाग की डोली के सामने मुकुट भगवान श्री राम को ही मंत्रोच्चार के साथ पहनाया जाता है।

लेकिन 73 साल पहले तक राजशाही की वजह से राजतिलक का मुकुट ईष्ट वासुकी नाग देवता का होता आया। गांव के बुर्जुग तो ये भी बताते हैं कि राजशाही होने की वजह से रावण का वध भी मंच से नहीं किया जाता था। हालांकि अब राजशाही हटने की वजह से सभी तरह का मंचन होने लगा है।

गांव के प्रधान नवीन राणा ने बताया कि रामलीला में मंचन के साथ-साथ 21 दिनों तक राम कथा, हनुमान चालीसा, कर्मकांड, अनुष्ठान पूरी परंपरा और वैदिक अनुसार होता आ रहा है। जिसमें गांव के करीब 300 परिवार पूरे तन मन धन से इस परपंरा को निभाते आ रहे हैं।

युवा और राम का पात्र निभा चुके भगवान सिंह राणा ने बताया कि 100 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा को सभी लोग आज भी निभाते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि पूरे इलाके में इस तरह की भव्य और परंपरा के साथ रामलीला का मंचन नहीं होता है। जिस वजह से आज भी रामलीला आयोजित होती आ रही है।

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