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उत्तराखंड में प्रीतम, हरक और काऊ की प्रेशर पॉलिटिक्स, ये है वजह

उत्तराखंड में प्रीतम, हरक और काऊ की प्रेशर पॉलिटिक्स के कारण

देहरादून, 20 अक्टूबर। उत्तराखंड में चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस में आए दिन समीकरण बदलते हुए नजर आ रहे हैं। चुनाव से पहले दलबदल और नेताओं का अपने दल में वर्चस्व को लेकर भी सियासी दांव पेंच चल रहे हैं। इसमें हर कोई अपना भविष्य सुरक्षित करने में लगे हैं। जिसके लिए नेता हर तरह के प्रपंच कर रहे हैं। अब उत्तराखंड में प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए भी नेता अपने दलों में अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। मंगलवार को जिस तरह प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और उमेश शर्मा काऊ एक ही जगह मुलाकात करते दिखे। इस तस्वीर के कई सियासी मायने निकाले गए हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि तीनों अपने अपने दलों में प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए खुद का दबदबा पार्टी में बनाने में कामयाब हो रहे हैं।

कांग्रेस में प्रीतम को अपना कद बढ़ाने की चुनौती

कांग्रेस में प्रीतम को अपना कद बढ़ाने की चुनौती

कांग्रेस में प्रीतम को अपना कद बढ़ाने की चुनौती
सबसे पहले बात प्रीतम सिंह की। कांग्रेस के अंदर पूर्व सीएम हरीश रावत और प्रीतम सिंह ही फिलहाल हाईकमान से सीधे अपना पक्ष और बात रख रहे हैं। कांग्रेसी भी इन्ही दो बड़े नेताओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चुनाव में जाने की तैयारी में है। ये बात अलग है कि कुछ खुलकर हरीश रावत के साथ हैं तो कुछ प्रीतम सिंह के साथ। पूर्व सीएम हरीश रावत का कद प्रीतम सिंह से हाईकमान के सामने बड़ा है। जिससे उत्तराखंड के फैसले हरीश रावत की सहमति से लिए जा रहे हैं। प्रीतम सिंह पुराने कांग्रेसियों को पार्टी ज्वाइन कराकर अपना कद पार्टी में बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं। इसके लिए वे बागियों का भी साथ लेने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। जबकि हरीश रावत बागियों को न लेने की बात कर रहे हैं। ऐसे में प्रीतम सिंह लगातार प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए हाईकमान तक अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे हैं। प्रीतम सिंह को कांग्रेस के अंदर अपने वर्चस्व के लिए पुराने कांग्रेसियों का समर्थन चाहिए। जिससे वे सरकार आने की स्थिति में हरीश रावत का सामना कर सके। ऐसे में हरक सिंह और काऊ ही एक मात्र जरिया बने हुए हैं।

हरक की राजनीतिक इच्छा पूरी होनी बाकि

हरक की राजनीतिक इच्छा पूरी होनी बाकि

अब बात हरक सिंह और काऊ की। 2016 में कांग्रेस के अंदर हुई बगावत का पूरा प्रकरण हरक सिंह के नेतृत्व में ही हुआ था। हरक सिंह हर बार एक ही बात दोहरा रहे हैं कि वे 6 बार विधायक रह चुके हैं और नेता प्रतिपक्ष से लेकर कैबिनेट की अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। हरक सिंह रावत को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री न बनने का मलाल भी है। इसको वे कई बार इशारों में कह भी चुके हैं। अब हरक सिंह भाजपा में आकर अपनी इच्छाओ के पूरे न होने पर हाईकमान से बड़ी जिम्मेदारी और अपनी विरासत अपनी बहू के लिए मांगने लगे हैं। ऐसे में हरक के सामने पार्टी पर दबाव बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। इस तरह हरक सिंह हमेशा हाईकमान के सामने इस तरह का कन्फ्यूजन रखना चाहते हैं जिससे पार्टी हाईकमान दबाव महसूस करे। ऐसे में हरक लगातार कांग्रेस जाने की संभावनाओं को भी दिखाने में लगे हैं। इसी तरह उमेश शर्मा काऊ को भी भाजपा के अंदर पिछले साढ़े 4 सालों में न तो कार्यकर्ता अपना सके और नहीं उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिलने का ईनाम मिला। इस तरह काऊ चुनावी साल में पार्टी से ईनाम और बोनस दोनों मांग रहे हैं। काऊ हरक सिंह के साथ रहकर भाजपा हाईकमान के सामने विकल्प पेश करने में लगे हैं।

तीनों को मिलेगा लाभ

तीनों को मिलेगा लाभ

प्रीतम सिंह, हरक सिंह और काऊ तीनों एक दूसरे के लिए चुनावी साल में मददगार साबित हो रहे हैं। साथ तीनों को इस समय अपने अपने दलों में समीकरणों को साधने के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स की जरुरत है। ऐसे में तीनों के अंदरखाने बातचीत और एक साथ कई जगह नजर आना सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। आने वाले दिनों में पार्टी के अंदर तीनों के कद भी बढ़ने तय है। जिसके लिए तीनों नेता ऐड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। हरक और प्रीतम के लिए तो अपने अपने दलों में दूसरे दलों में वर्चस्व की लड़ाई के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स का फायदा भी सामने नजर आ रहा है। ऐसे में समय रहते दोनों को सियासी पारा बढ़ाने का राजनीतिक लाभ मिलने की भी संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं।

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