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हिमाचल में सियासी उठापटक के बीच उत्तराखंड में 2016 में हुई बगावत की घटना की याद ताजा, जानिए क्या है कनेक्शन

हिमाचल प्रदेश में बजट सत्र के दौरान हुए उठापटक सियासी घटनाक्रम ने एक बार फिर उत्तराखंड में वर्ष 2016 में तत्कालीन कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के समय हुए बगावत की घटना की याद को ताजा कर दिया है।

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हिमाचल में कांग्रेस की सुक्खू सरकार है। राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस में चल रही अंधरूनी लड़ाई खुलकर सामने आई। राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के 6 विधायक बागी हो गए। इसके बाद पूरे हिमाचल का सियासी घटनाक्रम बदल गया।

इस बीच विधानसभा में बजट पास करने से पहले सरकार के अल्पमत में आने की बात सामने आई। सरकार में कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने इस्तीफा देकर सियासत गरमा दी। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने भाजपा के नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर समेत 15 विधायकों को निष्कासित, छह कांग्रेस विधायकों की सदस्‍यता भी रद्द कर दी गई। ऐसे में फिलहाल सुक्खू सरकार सत्ता में है। लेकिन यह सियासी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है।

छोटे और पहाडी राज्यों में इस तरह के सियासी संकट कई बार देखने को मिल जाते हैं। इसी तरह का घटनाक्रम उत्तराखंड में भी कांग्रेस सरकार में देखने को मिला था। जब वर्ष 2016 में एक साथ कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत की। इस बीच हरीश रावत के खिलाफ बागी विधायकों ने विधायकों की खरीद-फरोख्त से संबंधित एक स्टिंग जारी किया। जिसके बाद केंद्र ने कैबिनेट की आपात मीटिंग बुलाकर यहां राष्ट्रापति शासन लगा दिया।

बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुए फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस विजयी हुई। 11 मई को केद्र ने राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा लिया। वर्ष 2016 के फरवरी में हरीश रावत ने बतौर मुख्यमंत्री दो साल पूरे किए और 18 मार्च को विधानसभा के बजट सत्र के दौरान नौ पार्टी विधायकों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी।

इन नौ विधायकों के दलबदल कानून की जद में आने के कारण स्पीकर ने इनकी सदस्यता समाप्त कर दी, लेकिन केंद्र सरकार ने 27 मार्च को राजनैतिक अस्थिरता के मद्देनजर उत्तराखंड के इतिहास में पहली दफा राष्ट्रपति शासन लगा दिया। हाईकोर्ट से होता हुआ मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और फिर कोर्ट के निर्देश के बाद 10 मई को हुए फ्लोर टेस्ट में हरीश रावत गैर कांग्रेसी विधायकों के गुट प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट की मदद से अपना बहुमत साबित कर सरकार बचाने में कामयाब हो गए।

हालांकि इस दौरान कांग्रेस को अपना एक और विधायक गंवाना पड़ा। उधर,भाजपा के एक विधायक ने कांग्रेस का दामन थामा तो दोनों की सदस्यता भी समाप्त कर दी गई। कुछ अरसा बाद भाजपा के एक अन्य विधायक ने पार्टी और विधायकी से इस्तीफा तो 70 सदस्यों वाली निर्वाचित विधानसभा में महज 58 ही विधायक रह गए। इस पूरे घटनाक्रम में भी विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका काफी अहम रही। जिस वजह से सरकार बच पाई।

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