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केदारनाथ त्रासदी में 12 साल पहले मर गया था शख्स, अब परिवार वालों को मिला जिंदा, ये चमत्कार है या फिर कुछ और

kedarnath Missing Man survivor Story: 'जाको राखे साइयां, मार सके न कोय'- यह कहावत हम सभी ने कई बार सुनी है, लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए यह सिर्फ शब्द भर लगती है। पर शिवम और उनके परिवार के साथ जो बीता, उसने इस कहावत को एक सच्चा अनुभव बना दिया। जिस बेटे को परिवार ने सालों पहले केदारनाथ त्रासदी में हमेशा के लिए खोया मान लिया था, वही एक दिन अचानक जिंदा सामने आ गया। यह कहानी जितनी भावुक है, उतनी ही अविश्वसनीय भी।

केदारनाथ की 2013 की विनाशकारी बाढ़ आज भी लोगों की रूह दहला देती है। हजारों लोग लापता हुए, कई परिवार हमेशा के लिए बिछड़ गए। लेकिन अब एक ऐसी कहानी सामने आई है जिस पर यकीन करना मुश्किल है। एक शख्स शिवम-जिसे परिवार ने 12 साल पहले मृत मानकर उसका अंतिम संस्कार तक कर दिया था, अब जिंदा मिला है। सवाल उठ रहा है कि यह किसी चमत्कार से कम है या फिर एक दर्दनाक भटकाव की सच्चाई?

kedarnath Missing Man Story

केदारनाथ में बह गया, पर मरकर भी नहीं मरा था 'शिवम'

2013 की बाढ़ के दौरान शिवम (बदला हुआ नाम) लापता हो गए थे। शव नहीं मिला, लेकिन हालात ऐसे थे कि परिवार ने उन्हें मृत मानकर प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर दिया। कोई उम्मीद नहीं बची थी कि वो कभी लौटेंगे। लेकिन किस्मत ने एक अलग कहानी लिखी थी।

शिवम केदारनाथ से गायब होकर कैसे महाराष्ट्र पहुंच गए, यह किसी को नहीं पता। बाढ़ के सदमे और भूख-प्यास की मार ने उनकी मानसिक स्थिति कमजोर कर दी थी। वह अपना नाम, घर, पहचान सब भूल चुके थे। साल 2015 में वे वैजापुर (छत्रपति संभाजीनगर) के एक मंदिर में रहने लगे। वही खाते, वही सोते और साफ-सफाई करके अपना गुजारा करते रहे।

चोरी के झूठे आरोप में जेल और फिर शुरू हुआ असली मोड़

2021 में मंदिर में चोरी की घटना हुई और कुछ चोरों ने अपना बचाव करने के लिए शिवम का नाम उछाल दिया। गांव वालों ने उन्हें पकड़वा दिया। अदालत में पता चला कि वे मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, पोलियो के शिकार हैं और ठीक से चल भी नहीं सकते। जज ने उन्हें जेल की बजाय पुणे के येरवडा मानसिक चिकित्सालय भेजने का आदेश दिया, यहीं से असली कहानी शुरू हुई।

'ॐ नमः शिवाय' के अलावा कोई जवाब नहीं...अस्पताल ने नाम दिया 'शिवम'

हॉस्पिटल में जब भी कोई कुछ पूछता, शिवम सिर्फ एक ही वाक्य बोलते-'ॐ नमः शिवाय'। कर्मचारियों ने उन्हें यही मानकर 'शिवम' कहना शुरू कर दिया। चार साल तक वे चुपचाप वहीं रहते रहे। आदेश मानते रहे। किसी से ज्यादा बात नहीं करते।

2023 में रोहिणी भोसले नाम की समाजसेवी महिला उस वार्ड की अधीक्षक बनीं। उन्होंने शिवम की फाइल देखी और उनसे बातचीत का प्रयास शुरू किया। शिवम न मराठी जानते थे, न अंग्रेजी। लेकिन कुछ शब्द हिंदी में बोले-और यही सुराग बन गया।

धीरे-धीरे रोहिणी को महसूस हुआ कि शिवम पहाड़ी हिंदी बोल रहे हैं। जब उन्होंने स्कूल के बारे में पूछा तो शिवम ने रुड़की के एक स्कूल का नाम बताया। रोहिणी ने गूगल पर उस स्कूल की जानकारी निकाली और फोटो दिखाई। शिवम की आंखें चमक उठीं उन्होंने स्कूल पहचान लिया।

ऐसे खुला 12 साल पुराना राज

हरिद्वार और रुड़की पुलिस से संपर्क किया गया। रिकॉर्ड में मिला कि ठीक वही विवरण वाला एक शख्स 2013 की केदारनाथ बाढ़ में बह गया था और मर चुका माना गया था। परिवार से संपर्क किया गया। फोटो भेजी गई। भाई ने तुरंत पहचान लिया "ये हमारे शिवम हैं।"

अस्पताल ने शिवम को परिवार से वीडियो कॉल पर मिलाया। 12 साल बाद भाई को देखते ही शिवम ने एक पल में पहचान लिया। अस्पताल के कर्मचारी बताते हैं "उनकी आंखों में वो चमक हम कभी नहीं भूल सकते।"

कानूनी प्रक्रिया में वक्त लगा। केस चल नहीं रहा था, चार्जशीट भी नहीं थी। रोहिणी भोसले ने मामला आगे बढ़वाया। 2025 में शिवम को चोरी के आरोप से बरी किया गया। इसके बाद अस्पताल ने उन्हें परिवार के हवाले कर दिया।

डॉक्टर कोलोड और नर्सिंग स्टाफ का कहना है कि "शिवम हमारे लिए मरीज नहीं, परिवार जैसे बन गए थे। उन्हें विदा करते समय हम सब भावुक हो गए।"

चमत्कार या इंसानी संवेदनाओं की जीत?

12 साल तक भटकता रहा एक आदमी। परिवार ने अंतिम संस्कार कर दिया। मर चुके बेटे की यादें मिट चुकी थीं। फिर भी एक दिन वीडियो कॉल पर सामने आ गया जिंदा। यह कहानी जितनी भावुक है, उतनी ही रहस्यमय भी। लेकिन एक बात साफ है उम्मीद कभी खत्म नहीं होती।

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