कहीं इन 5 डर की वजह से तो यशपाल आर्य ने नहीं छोड़ी BJP? समझिए पर्दे के पीछे की कहानी
भाजपा में पूरा सम्मान मिलने के बाद भी पार्टी छोडने पर उठे सवाल
देहरादून, 12 अक्टूबर। 2017 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का हाथ छोड़कर यशपाल आर्य ने भाजपा का दामन थामा था। तब यशपाल आर्य का कांग्रेस छोड़कर जाने का कारण हरीश रावत से नाराजगी और अपने बेटे संजीव आर्य का राजनीतिक करियर शुरू करवाना माना जा रहा था। यशपाल आर्य ने भाजपा को ज्वाइन करने के बाद अपने बेटे संजीव आर्य को नैनीताल का टिकट दिलवाया। जिसके बाद संजीव आर्य पहली बार विधायक चुनकर आए। अब जब यशपाल आर्य भाजपा की साढ़े चार साल सरकार में विधायक और कई हेवीवेट विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। तो फिर चुनाव से पहले भाजपा छोड़ने को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। आखिरकार यशपाल आर्य को भाजपा के अंदर ऐसा क्या डर लगा जिस कारण उन्हें कांग्रेस में वापसी करनी पड़ी।

किसान आंदोलन का असर
यशपाल आर्य बाजपुर और संजीव आर्य नैनीताल यानि दोनों तराई सीट से प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा के खिलाफ तराई सीटों पर किसान आंदोलन का फैक्टर हावी है। जबकि किसानों का वोट भी कांग्रेस की तरफ झुकता हुआ दिख रहा है। जिससे यशपाल आर्य को अपने परिवार का भविष्य खतरे में नजर आने लगा था। यशपाल आर्य को इस बात का डर था कि वे तराई सीटों पर किसान आंदोलन के गुस्से का शिकार न हों जाएं।

सिख वोटरों की नाराजगी
यशपाल आर्य बाजपुर से विधायक चुनकर आए थे, बाजपुर सीट पर सिख वोटर ज्यादा हैं। सिख वोटर भी भाजपा से नाराज बताए जा रहे हैं। तराई का सिख वोटर इस बार कांग्रेस को सपोर्ट कर सकता है। जिसका कारण भी किसान आंदोलन ही है। इस तरह से सिख वोट का गणित गड़बडाता देख यशपाल आर्य को पाला बदलना पड़ा।

पिता और पुत्र का भाजपा में भविष्य खतरे में
यशपाल आर्य राजनीति के माहिर और शांत खिलाड़ी माने जाते हैं। लेकिन जब भी पार्टी या संगठन स्तर पर उनकी अनदेखी होती है। तो वे चुपचाप तरीके से विरोध करते हैं। जिसकी भनक किसी को नहीं लगती। कांग्रेस से भाजपा में जाते समय भी ऐसा हुआ और अब घर वापसी में भी ऐसा हुआ। इस बार यशपाल आर्य को इस बात का एहसास हो चुका था, कि उनका और उनके बेटे का भविष्य भाजपा में सुरक्षित नहीं है। यशपाल को इस बात का एहसास हो गया था कि उनको नुकसान चुनाव में होना तय है।

दलित वोटरों का दूसरे दलों की तरफ खिसकना
यशपाल आर्य दलित चेहरा हैं। जिनका उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा कद है। यशपाल आर्य उत्तराखंड में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं। जो कि 19 परसेंट के आसपास है। जिस तरह से पिछले समय से भाजपा के खिलाफ माहौल बना है। और हरीश रावत ने भी दलित कार्ड खेला है। उससे दलित वर्ग का भी कांग्रेस और दूसरे दलों की तरफ झुकना तय माना जा रहा है। ऐसे में यशपाल आर्य को खुद की राजनैतिक जमीन खिसकती हुई नजर आने लगी थी।

सरकार रिपीट न होने का मिथक
उत्तराखंड में 21 सालों में किसी भी दल की सरकारें रिपीट नहीं हुई। वर्तमान में भाजपा की सरकार है। ऐसे में इतिहास बदलना आसान नहीं होगा। ये मिथक भी आर्य के डर का प्रमुख कारण रहा। यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति के कद्दावर नेता हैं। जो कि पहली निर्वाचित सरकार के समय स्पीकर और कांग्रेस के दो बार प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इसके बाद भाजपा में भारीभरकम विभागों के मंत्री रहे। यशपाल के तजुर्बे ने ये संकेत माना कि अब कांग्रेस को ही सत्ता में आने का रास्ता नजर आ रहा है। इसलिए पाला बदल डाला।












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