केंद्र और राज्य सरकार के मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ावा देने के बाद भी किसान क्यों नहीं दिखा रहे रुचि, जानिए
देहरादून में 3578 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित होने के बावजूद इस बार क्रय केंद्रों पर मंडुवा की खरीद शून्य रही। सरकार ने मंडुआ की खरीद के लिए जौनसार बावर में जिला सहकारी संघ के माध्यम से चार क्रय केंद्र खोले थे।

एक तरफ केंद्र और राज्य सरकार मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ावा दे रहे हैं, दूसरी तरफ किसानों में मोटे अनाज से ज्यादा नकदी फसलों में रुचि दिखा रहे हैं। किसान और विशेषज्ञ इसके पीछे अभी तक मोटे अनाज को ज्यादा तरजीह न मिलना मान रहे हैं। देहरादून में 3578 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित होने के बावजूद इस बार क्रय केंद्रों पर मंडुवा की खरीद शून्य रही।
अच्छा दाम भी नहीं मिलता
सरकार ने मंडुआ की खरीद के लिए जौनसार बावर में जिला सहकारी संघ के माध्यम से चार क्रय केंद्र खोले थे। 31 जनवरी तक मंडुआ की खरीद होनी थी। लेकिन इन केंद्रों में एक भी किसान नहीं पहुंचा। किसानों का कहना है कि मंडुआ की खेती में मेहनत अधिक लगती है। साथ ही अच्छा दाम भी नहीं मिलता है। उत्तरकाशी के प्रगतिशील किसान नरेश नौटियाल का कहना है कि अभी तक किसानों में मंडुआ को लेकर जागरुकता नहीं थी। लेकिन अब धीरे-धीरे किसानेां को मंडुए के उत्पादन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौरी ब्लॉक में मंडुवे का उत्पादन अच्छा हो रहा है।
Recommended Video

लोगों को प्रेरित और प्रयास किए जा रहे हैं
कृषि विशेषज्ञ डॉ पंकज नौटियाल ने बताया कि अभी तक डिमांड नहीं थी, जिस वजह से उपलब्धता नहीं मिलती थी। लेकिन अब इसे विश्व स्तर पर पहचान मिल चुकी है। इसके लिए लोगों को प्रेरित किया जा रहा है। इसके प्रयास किए जा रहे हैं। इससे पहले विपणन की व्यवस्था नहीं थी, लेकिन अब किसानों को आसानी होगी। मोटे अनाज को पैदा करने के लिए किसानों को ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है और ये अधिक पौष्टिक है। जिसके लिए सरकार की और से विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। जिसका असर आने वाले कुछ समय में साफ नजर आ जाएगा।
पहाड़ की परम्परागत मिश्रित खेती में मडुआ की महत्वपूर्ण भूमिका
उत्तराखण्ड में वर्ष 2004-2005 के दौरान 131003 हेक्टेयर में मडुआ की खेती होती थी जो 2016-2017 में आते-आते 107175 हेक्टेयर में सिमट गयी। इस अन्तराल में इसके उत्पादन में भी तकरीबन 6.0 प्रतिशत की कमी देखने को मिली। एक समय ऐसा भी था जब पहाड़ की परम्परागत मिश्रित खेती में मडुआ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी।
राशन की दुकान, मिड डे मिल और अन्य जगहों पर भी मोटे अनाज को शामिल किया जा रहा
अब केन्द्र और राज्य सरकार मोटे अनाज को बढ़ावा दे रहे हैं। राशन की दुकान, मिड डे मिल से लेकर पर्यटन और अन्य जगहों पर भी मोटे अनाज को शामिल किया जा रहा है। जिससे इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके। मंडुवे की बुआई मई में होती है जबकि सितंबर में फसल तैयार होती है। वैज्ञानिक विश्लेषणों से सिद्ध हुआ है कि मडुआ में कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, विटामिन ए, कैरोटिन की मात्रा प्रचुरता से रहती है। इसमें दूसरे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी पाये जाते हैं। मडुआ को रोजगार से जोड़ने की दिशा में उत्तराखण्ड में मंडुवा से कई चीजें तैयार हो रही है। महिला समूह, संस्थाओं व युवकों द्वारा मडुआ की चाय, बरफी, सोनपापड़ी, मोमो, स्प्रिंगरोल, केक, ब्रेड, बिस्किट्स, नमकीन तथा अन्य उत्पादों को बनाने के अभिनव प्रयोग भी किये जा रहे हैं। जो कि काफी लोकप्रिय होते जा रहे हैं।












Click it and Unblock the Notifications