गंगा, यमुना और बाबा केदार के दर्शन अब होंगे शीतकालीन गद्दीस्थल, जानिए कहां है चारों धामों के शीतकालीन प्रवास
6 माह शीतकालीन प्रवास में होंगे चारधाम दर्शन
उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर है। गंगोत्री के कपाट अन्नकूट पर्व पर 26 अक्टूबर को शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए। भैया दूज पर केदारनाथ और यमुनोत्री धाम के कपाट बंद हो गए। जिन मंदिरों के कपाट बंद हो गए उनके दर्शन अब शीतकालीन गद्दी स्थल पर किए जाएंगे। अब 19 नवंबर को बद्रीनाथ के कपाट बंद कर दिए जाएंगे।

जहां 6 माह शीतकाल में पूजा अर्चना होती है
शीतकाल में चारोंधाम के कपाट बंद हो जाते हैं। इस दौरान मां गंगा उत्तरकाशी जिले के मुखवा गांव और यमुना मां खरसाली में विराजमान होती हैं। बाबा केदार रूद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ और भगवान बदरी विशाल पांडुकेश्वर जोशीमठ चमोली में आ जाते हैं। जहां 6 माह शीतकाल में पूजा अर्चना होती है। यहां पर भी श्रद्धालु शीतकाल में भी इन स्थानों पर होने वाली पूजा-अर्चना में शामिल हो सकते हैं। धामी सरकार लगातार शीतकालीन यात्रा को बढ़ावा देने में जुटी है। इसके लिए खास पॉलिसी पर काम भी हो रहा है।
गंगा उत्तरकाशी के मुखवा, यमुना खरसाली, केदार रूद्रप्रयाग के ऊखीमठ, बदरी पांडुकेश्वर चमोली में शीतकाल प्रवास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चारोंधामों में शीतकाल में देवतागण पूजा करने आते हैं। ऐसे में चारों धामों से चल विग्रह स्वरुप को शीतकाल प्रवास मां गंगा उत्तरकाशी जिले के मुखवा गांव और यमुना मां खरसाली, बाबा केदार रूद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ और भगवान बदरी विशाल पांडुकेश्वर जोशीमठ चमोली में लाया जाता है। जहां पुरोहित पूरे रीति रिवाज और धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा अर्चना करते हैं। इस दौरान भी भगवान के दर्शन किए जाते हैं। भगवान केदारनाथ की पूजा ग्रीष्मकाल में केदारनाथ में होती है जबकि शीतकाल में केदारनाथ उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में विराजते हैं। इसी मंदिर में केदारनाथ की शीतकालीन पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि शीत काल में जब मंदिर का कपाट बंद हो जाता है तब नारद जी देवतागण भगवान केदारनाथ और बदरीनाथ की पूजा करते हैं।शीतकाल प्रवास के दौरान तीर्थ पुरोहित शीतकाल गद्दी की पूजा अर्चना करते हैं। शीतकाल प्रवास के लिए जो डोली ले जाई जाती है। उसमें चल विग्रह स्वरूप होता है। जिसका अर्थ है कि भगवान की मुख्य मूर्ति मंदिर परिसर में ही होती हे। कपाट बंद होने के साथ ही भगवान की मूर्ति चल विग्रह स्वरूप में शीतकाल के लिए ले जाई जाती है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दौरान धामों में नारद जी खुद पूजा अर्चना करते हैं।












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