केदारनाथ यात्रा में घोड़ा-खच्चरों के संचालन पर रोक को लेकर बड़ा अपडेट, जांच रिपोर्ट का क्यों है इंतजार
केदारनाथ यात्रा में घोड़ा-खच्चरों के संचालन पर फिलहाल रोक लगी हुई है। घोड़ा-खच्चरों में इक्वाइन इंफ्लुएंजा संक्रमण से संक्रमित होने के चलते राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान हिसार से तीन सदस्यीय विशेषज्ञ चिकित्सकों का दल रुद्रप्रयाग पहुंचकर जांच कर रहा है।
इसके अलावा पंतनगर से भी विशेषज्ञ दल जिले में पहुंचेगा, जो घोड़ा-खच्चरों की सैंपलिंग कर उनके स्वास्थ्य की जांच करेगा। गौरीकुंड और आसपास के क्षेत्रों में जैसे ही लक्षण सामने आए, संबंधित गांवों को प्रभावित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। जिले में बाहर से आने वाले प्रत्येक घोड़े और खच्चर की गहन स्क्रीनिंग की जा रही है।

पशुपालन विभाग ने गौरीकुंड और सोनप्रयाग में श्वसन रोग (इक्वाइन इन्फ्लूएंजा) से संक्रमित 1600 से अधिक घोड़ा-खच्चरों को क्वारंटीन कर दिया है। साथ ही 100 से अधिक पशुपालक अपने जानवरों को लेकर घरों को लौट चुके हैं। दो मई से शुरू हुई केदारनाथ यात्रा में सोनप्रयाग से केदारनाथ तक दर्जन भर से ज्यादा घोड़ा-खच्चरों की मौत की मीडिया रिपोर्ट सामने आ चुकी है।
जिसके बाद से शासन, प्रशासन और विभाग में हड़कंप मचा है। चिकित्सकीय दल ने सोनप्रयाग और गौरीकुंड में पशु प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया। इस दौरान अधिकांश घोड़ा-खच्चर श्वसन रोग से पीड़ित मिले। इन जानवरों को बुखार, खांसी, नाक से पानी बहना और शरीर में दाने हो रहे हैं। कई जानवर, इतने बीमार हैं कि पानी तक नहीं पी पा रहे हैं।
केदारनाथ यात्रा के लिए 22 मार्च से घोड़ा-खच्चरों की स्वास्थ्य जांच और बीमा के लिए पंजीकरण शिविर शुरू हो गया थे। 22 से 24 मार्च के बीच पशुपालन विभाग ने 751 घोड़ा-खच्चरों का पंजीकरण किया था। इसी दौरान बसुकेदार और ऊखीमठ तहसील के कुछ गांवों में भी घोड़ा-खच्चरों में हॉर्स फ्लू की शिकायत मिली थी।
पशुपालन विभाग ने तत्काल प्रभाव से अतिरिक्त पशु चिकित्सकों की तैनाती की है। गौरीकुंड समेत अन्य संवेदनशील स्थलों पर सरकारी दवाएं और उपचार सुविधाएं अत्यंत रियायती दरों पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। वर्तमान में कुछ पशुओं में पेचिश जैसे तीव्र लक्षण भी देखे जा रहे हैं। इस गंभीर परिस्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र, हिसार से विशेषज्ञों की टीम बुलाकर जांच प्रारंभ की गई है।
केदारनाथ यात्रा में वर्ष 2009 और 2012 में भी इक्वाइन इन्फ्लूएंजा के संक्रमण से 300 से अधिक घोड़ा-खच्चरों की मौत हो गई थी। उस वक्त भी संक्रमित क्षेत्र का दायरा गौरीकुंड से जंगलचट्टी के बीच सबसे ज्यादा था। वर्ष 2023 में यात्राकाल में 351 घोड़ा-खच्चरों की मौत हुई थी। हालांकि मौत का कारण पेट दर्द और गैस होना पाया गया था।












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