सुलह से पहले आजम ने अखिलेश के सामने रखीं ये दो बड़ी शर्तें, जानिए मुलायम के रुख पर क्यों टिकी निगाहें
लखनऊ, 9 मई: उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) के चीफ अखिलेश यादव इस समय चौतरफा मुश्किलों से घिरे हुए हैं। एक तरफ उनके चाचा शिवपाल उनको आंखे दिखा रहे हैं तो दूसरी ओर उनके वरिष्ठ नेता आजम खां भी इस समय नाराज चल रहे हैं। आजम की नाराजगी दूर करने के लिए हालांकि अखिलेश पूरे जतन कर रहे हैं। शुक्रवार को अखिलेश के पिता मुलायम सिंह पार्टी कार्यालय पहुंचे थे और उन्होंने कार्यकर्ताओं को नसीहत दी थी। सपा के सूत्रों के अनुसार आजम खान द्वारा ने पार्टी के सामने दो शर्तें रखी हैं। जिसके लिए या तो उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए या उनके परिवार के किसी सदस्य को रामपुर सीट पर होने वाले लोकसभा उपचुनाव में टिकट दिया जाए। हालांकि मुलायम चाहते हैं कि किसी तरह आजम से बातचीत करके या मिलकर उनकी नाराजगी दूर की जाए।

आजम की दो में से एक शर्त पूरी हो सकती है
समाजवादी पार्टी के सूत्रों की माने तो आजम खां द्वारा अघोषित रूप से पार्टी के सामने दो शर्तें रखी गई हैं। जिसके लिए या तो उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए और या उनके परिवार के किसी सदस्य को रामपुर सीट पर होने वाले उपचुनाव में टिकट दिया जाए। ऐसे में उनके लिए विपक्ष के नेता पर नियुक्त होना मुश्किल है क्योंकि विधानसभा में अखिलेश यादव इस समय प्रतिपक्ष के नेता हैं और वह आजमगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफा भी दे चुके हैं। ऐसे में अखिलेश नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छोड़ेंगे इसकी गुंजाइश कम ही है। वहीं दूसरी ओर आजम के परिवार के किसी सदस्य को रामपुर से लोकसभा उपचुनाव में टिकट जरूर मिल सकता है। इस बात को लेकर सपा में मंथन चल रहा है और सपा आजम खान के मुद्दे पर बीच का रास्ता निकाल सकती है।

अपने बेटों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं शिवपाल- आजम
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव अपने ही लोगों के निशाने पर हैं। जब पीएसपी अध्यक्ष और चाचा शिवपाल सिंह यादव लगातार उन पर हमला बोल रहे हैं तो पार्टी नेता और रामपुर विधायक आजम खान जो सीतापुर जेल में हैं। दरअसल दोनों नेता अपना राजनीतिक भविष्य और किला बचाने के लिए बेचैन नजर आ रहे हैं। शिवपाल जहां अपने और अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित हैं वहीं आजम खां रामपुर के किले को बचाने के लिए खामोश हैं। कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में आजम खान और अखिलेश यादव में समझौता हो सकता है और इसके लिए मुलायम सिंह यादव भी पहल कर सकते हैं।

राजनीतिक जमीन बचाने में जुटे हैं आजम-शिवपाल
जानकारों का कहना है कि दोनों नेता अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं। क्योंकि सपा में दोनों नेताओं का भविष्य उज्जवल नहीं हो पा रहा है. जहां तक शिवपाल सिंह यादव की बात है। वह सपा से बाहर हो चुके हैं और अब अपनी पार्टी को फिर से स्थापित करने के दावे कर रहे हैं। लेकिन आजम खान सपा के विधायक हैं और पार्टी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. उन्हें पार्टी में मुस्लिम चेहरा माना जाता है। लेकिन समय बीतने के साथ उन्हें पार्टी में वह तवज्जो नहीं मिल रही है, जो उन्हें मुलायम सिंह यादव के दौर में मिलती थी। इस समय आजम खान इस दुविधा में हैं कि उनके परिवार के किसी सदस्य को लोकसभा का टिकट मिलेगा या नहीं।

अखिलेश ने शिवपाल के बेटे को नहीं दिया टिकट
शिवपाल सिंह यादव विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव के साथ पुराने झगड़े को भूल चुके थे और उन्होंने सपा के साथ अपनी पार्टी का गठबंधन भी किया था। लेकिन सपा ने उन्हें केवल एक सीट दी, जबकि शिवपाल अपने बेटे आदित्य यादव के साथ अपने पसंदीदा के लिए टिकट मांग रहे थे। जिसके बाद अब शिवपाल सिंह यादव भी अपने बेटे आदित्य के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जबकि उनके साथ कई नेताओं के बेटे-बेटियों ने राजनीति में पैर जमाए हैं। सपा नेता बलराम सिंह यादव की बात करें तो उनके पुत्र संग्राम सिंह आजमगढ़ से विधायक हैं तो रेवती रमन सिंह के पुत्र उज्जवल रमन सिंह विधायक रह चुके हैं जबकि आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खुद विधायक हैं।

रामपुर में अपनी पकड़ कमजोर नहीं करना चाहते आजम
जानकारों का कहना है कि फिलहाल आजम खान के सामने सबसे बड़ी चिंता रामपुर सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर है। यहां लोकसभा उपचुनाव होने हैं। लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि पार्टी किसे टिकट देगी। बताया जा रहा है कि पार्टी आजम खान के परिवार के किसी सदस्य को रामपुर से टिकट देती है तो आजम खान की नाराजगी कम हो सकती है। इसलिए आजम खान ने अब तक अखिलेश यादव और मुलायम सिंह के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला है। सिर्फ उनके मीडिया सलाहकार और दूसरे नेता ही पार्टी अध्यक्ष पर हमला कर रहे हैं। आजम खान इससे पहले भी अखिलेश यादव और पार्टी से नाराज रहे हैं और वह अखिलेश यादव सरकार में कैबिनेट बैठक में नहीं गए थे। जिसके बाद अखिलेश को उन्हें मनाने के लिए जाना पड़ा।
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