यूपी में ओवैसी ने राजभर को क्यों चुना? जानिए राज-नीति की बात

Asaduddin owaisi and Om Prakash Rajbhar: उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर की मुलाकात और साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा ने राजनीतिक गलियारे में हलचल तेज कर दी है. सबके मन में एक ही सवाल है कि असदुद्दीन ओवैसी ने आखिर ओम प्रकाश राजभर के साथ चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया? इस सवाल का सीधा जवाब तो खैर किसी के पास नहीं है. बस आंकलन ही आंकलन लग रहे हैं. पर, आज यूपी के चुनावी तालाब में जो कंकड़ ओवैसी ने फेंका है, उसका मतलब दूर तक निकाला जा रहा है. सपा, बसपा, कांग्रेस की प्रतिक्रिया आनी बाकी है. स्वाभाविक है कि सार्वजानिक तौर पर कोई भी इस ताजे गठजोड़ को हलके में ही लेगा लेकिन जातियों के आधार पर खंड-खंड बंटे मतदाताओं को अपना मानने वाले दलों की बेचैनी तो बढ़नी ही है. मंत्रिमंडल से निकाले जाने के बाद सुभासपा सुप्रीमो राजभर को भाजपा ने कोई भाव नहीं दिया. हाँ, राजभर समाज के एक नौजवान अनिल राजभर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर समाज को सन्देश देने की कोशिश की. आज़मगढ़ निवासी छह बार के विधायक रहे फागू चौहान को इसी के बाद बिहार का राज्यपाल बनाया. वे भी पिछड़ी बिरादरी से आते हैं. सभी को मालूम है कि ओम प्रकाश राजभर की राजनीतिक जमीन मऊ, आज़मगढ़, वाराणसी, गाजीपुर तक ही सीमित है.

ओम प्रकाश राजभर की मुश्किल
पिछड़ी जाति के नेताओं को लगातार बढ़ावा देने में भाजपा पीछे नहीं है. बीच में ओम प्रकाश राजभर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मिले थे| उस समय आंकलन लगाया जा रहा था कि वे सपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं, पर, बात नहीं बनी. असल में राजभर की मुश्किल यह है कि वे 1981 से राजनीति में हैं. कांशीराम के साथ उन्होंने शुरुआत की और घाट-घाट का पानी पीते हुए वर्ष 2017 में पहली दफा विधायक और मंत्री बने. यह सब भाजपा के एक शीर्ष नेता के कारण संभव हुआ. फिर राजभर को लगा कि उनका कद काफी बड़ा है. इसके बाद उनके बिगड़े बोल आने लगे. कई बार भाजपा सरकार असहज भी हुई लेकिन राजभर नहीं रुके. सरकार से विवाद बढ़ने पर उन्हें अमित शाह ने भी बुलाकर दिल्ली में समझाया-बुझाया. कुछ दिन ठीक रहा फिर ये सरकार पर हमलावर होने लगे. मजबूर होकर भाजपा ने इन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया. अब उनका मन बेचैन है. किसी भी सूरत में सत्ता तक पहुँचना उनका लक्ष्य है. इसके लिए ओमप्रकाश राजभर खूब मेहनत भी करते हैं. उनकी रैलियों में भीड़ आती है पर, अब देखना रोचक होगा कि 2022 विधान सभा चुनाव में वे और उनका गठबंधन क्या गुल खिला पाता है. ओवैसी की इसमें क्या भूमिका होती है? वे कितना परफार्म कर पाते हैं. हालँकि, बिहार में मिली सफलता के बाद उनके हौंसले बुलंद हैं. वे यूपी के साथ ही पश्चिम बंगाल में भी दो-दो हाथ करने जा रहे हैं.

ओवैसी और बहुजन समाज पार्टी
कुछ दिन पहले खबर आ रही थी कि ओवैसी बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो के संपर्क में हैं और दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं. इस चर्चा पर लोग भरोसा भी करने लगे थे, क्योंकि दोनों की बातचीत, विचार धारा और वोट बैंक मिलाकर कुछ ठोस हासिल करने की स्थिति में थे. पर, बुधवार को ओवैसी और राजभर की मुलाकात ने उनके बसपा के साथ जाने की खबर को फ़िलहाल न केवल अफवाह साबित किया है बल्कि उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा से पुरानी चर्चाओं पर फौरी विराम लग गया है. अब सबके मन में सवाल यह है कि आखिर ओवैसी ने ओमप्रकाश राजभर के साथ विधान सभा चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया? इसका जवाब देते हुए सुभासपा सुप्रीमो कहते हैं-यूपी में किसी भी दल की हैसियत नहीं है कि वह अकेले भाजपा के रथ को रोक दे. वह चाहे समाजवादी पार्टी हो, बसपा हो या कांग्रेस. सब मिलकर ही इस रथ को रोक सकते हैं और यूपी में मेल-मिलाप की शुरुआत पहले ही हो चुकी है. आज जनाब ओवैसी के इस नए मोर्चे में शामिल होने के बाद हम और मजबूत हुए हैं. हमने भागीदारी संकल्प मोर्चा का गठन किया है, जिसमें भाजपा से वैचारिक दूरी रखने वाले कम से कम आठ छोटे क्षेत्रीय दल शामिल हैं. हम अन्य दलों से भी बातचीत कर रहे हैं लेकिन ओवैसी का इस मोर्चे में शामिल होना निश्चित ही इसे और ताकतवर बनाता है.

नए गठजोड़ से बहुत खुश
एआईएमआईएम के यूपी चीफ शौकत अली इस नए गठजोड़ से बहुत खुश हैं. उन्होंने ‘वन इंडिया' से बातचीत में कहा कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष बैरिस्टर ओवैसी ने राजभर जी की अगुवाई में बने मोर्चे में शामिल होने और साथ में चुनाव लड़ने की सहमति दी है. अभी यह कारवाँ और आगे बढ़ेगा. क्योंकि हमारा ध्यान छोटे-छोटे दल सबसे पहले हैं. शौकत कहते हैं कि वे इसी सिलसिले में पिछले दिनों शिवपाल यादव जी से भी मिले थे. उनके मुताबिक शिवपाल जी भी भाजपा को रोकने वाले किसी भी गठबंधन में शामिल होने के पक्ष में हैं. इस पर वे समय आने पर निर्णय लेंगे. उत्साहित शौकत अली कहते हैं कि जिस तरह से हम सबके मिलने और आम आदमी पार्टी के यूपी चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा मात्र से राज्य की भाजपा सरकार तिलमिलाई हुई है, उससे लगता है कि हम सही राह पर हैं.

छोटे दलों का गठबंधन
पीटीआई के पूर्व स्टेट ब्यूरो हेड प्रमोद गोस्वामी ने ‘वन इंडिया' से कहा-छोटे दलों का यह गठबंधन भारतीय जनता पार्टी की मदद करेंगे, क्योंकि राजभर की पार्टी या उनके साथ जुड़ने वालों की अभी ऐसी हैसियत नहीं है कि यूपी में दो-चार सीटें भी अकेले अपने बूते हासिल कर लें. राजभर भी तभी विधायक और मंत्री तभी बन पाए जब भाजपा का साथ मिला अन्यथा राजनीति में तो वे बीते 30 वर्षों से हैं. श्री गोस्वामी यह जरुर कहते हैं कि राजभर की रैलियों में भीड़ देखी जा सकती है. राजभर की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार असद लारी कहते हैं कि राजभर जुझारू हैं, यही उनकी पहचान है. वे अपने समाज के लिए लड़ते हुए देखे जा सकते हैं. कितनी सीटों पर उनका प्रभाव है? लारी कहते हैं-इस पर एकदम सटीक कुछ कहना जल्दबाजी होगी. क्योंकि वर्ष 2017 के पहले राजभर केवल धरना-प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे. विधान सभा उन्होंने बाहर से ही देखी थी. लेकिन भाजपा की मदद से विधायक, मंत्री बने राजभर अब बहुत महत्वाकांक्षी हो चुके हैं. ऐसे में वे राजनीति में किसी भी हद तक जा सकते हैं. चाहे उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े.
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