क्यों बसपा रिजर्व सीटों पर सिर्फ दलितों के बल पर नहीं कर पाती अच्छा प्रदर्शन ?
लखनऊ, 24 नवंबर: बहुजन समाज पार्टी का आधार वोट बैंक दलितों को माना जाता है। दलितों की राजनीति करके मायावती चार-चार बार (1995, 1997, 2002 और 2007) उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और सांसद रह चुकी हैं। लेकिन, अगर उत्तर प्रदेश में पिछले दो दशकों से भी ज्यादा विधानसभा और लोकसभा चुनावों के परिणामों का विश्लेषण करें तो सिर्फ 2007 के विधानसभा चुनाव को छोड़कर प्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर बसपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जा सकता। मायावती को पता है कि जबतक राज्य की करीब एक-चौथाई सीटों पर उनके दल का प्रदर्शन अच्छा नहीं होगा तो लखनऊ की नवाबी करने की सोचना दूर की कौड़ी है। इसलिए, 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार की है।

यूपी की 86 आरक्षित विधानसभा सीटों पर बीएसपी का फोकस
बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश की 86 आरक्षित विधानसभा सीटों (अनुसूचित जाति-84, अनुसूचित जनजाति-2) के अध्यक्षों के साथ मीटिंग करके साफ कर दिया है कि इस बार पार्टी का इनपर खास फोकस रहेगा। मायावती ने साफ कहा है कि उन्हें इन सीटों पर 2007 वाला ही प्रदर्शन दोहराना है, जिसके दम पर वह 206 सीटें जीतकर बहुमत की सरकार बना पाई थीं। बीएसपी चीफ ने यह भी कहा है कि ऊंची जाति के वोटरों खासकर ब्राह्मणों के लिए पार्टी खास रणनीति तैयार करेगी, जिसकी जिम्मेदारी पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को दी गई है। दरअसल, खुद को दलितों का मसीहा बताकर राजनीति करने वाली मायावती इस बात से परेशान हैं कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर ही उनकी पार्टी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती। 2007 के चुनाव को अपवाद कह सकते हैं, जब मायावती की सोशल इंजीनियरिंग का नया प्रयोग काम कर गया था।

आरक्षित सीटों पर कैसा रहा है बसपा का प्रदर्शन ?
अब जरा पिछले तीन विधानसभा चुनावों में आरक्षित सीटों पर बीएसपी के प्रदर्शन पर चर्चा कर लेते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन 86 सीटों में से बीएसपी को सिर्फ सीतापुर की सिधौली और आजमगढ़ की लालगंज सीट पर ही जीत मिली थी। इनमें से 70 सीटें अकेले बीजेपी जीत गई थी। 2012 के चुनाव में सिर्फ 85 सीटें ही आरक्षित थीं (सिर्फ अनुसूचित जाति के लिए) और तब सत्ता में रहते हुए भी बीएसपी महज 15 सीटें ही जीत सकी थी। ये सीटें हैं रामपुर मनिहारन, पुरकाजी, नहटौर, हाथरस, आगरा कैंट, आगरा ग्रामीण, टुंडला, हरगांव, मोहान, महरौनी, नरैनी, मंझनपुर, कोरांव, बांसगांव और अजगरा। मायावती यहां 2007 का प्रदर्शन इसलिए दोहराना चाहती हैं कि तब गैर-दलितों के समर्थन से बीएसपी इनमें से 62 सीटें जीत गई थी।

लोकसभा चुनावों में आरक्षित सीटों पर बीएसपी का प्रदर्शन ?
उत्तर प्रदेश की आरक्षित सीटें बहुजन समाज पार्टी के लिए सिर्फ विधानसभा चुनाव में ही चुनौती नहीं बनतीं, लोकसभा चुनाव में भी यह पार्टी दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में एकजुट नहीं रख पाती। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यूपी की 80 सीटों में से 71 सीटें जीत गई थी और बीएसपी 17 आरक्षित सीटों में से एक पर भी हाथी की सवारी नहीं कर पाई थी। मायावती की पार्टी ने पिछले दो दशकों से भी ज्यादा वक्त में लोकसभा चुनावों में जब आरक्षित सीटों पर सबसे बेहतर प्रदर्शन करके दिखाया है, तो भी उसे पार्टी के आधार वोट बैंक के हिसाब से संतोषजनक नतीजे नहीं मिले थे। 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 17 में से सिर्फ 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी; और ये उसका बेहतरीन प्रदर्शन था। 2019 में वह सपा के साथ गठबंधन करके 10 सीटें जरूर जीती, लेकिन इसमें वह सिर्फ नगीना और लालगंज में ही आरक्षित सीटों पर विजयी हो सकी।

रिजर्व सीटों पर अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाती बीएसपी ?
दरअसल, यूपी की रिजर्व विधानसभा सीटों पर बसपा के लिए मुश्किल ये हो जाती है कि यहां दलितों का वोट विभिन्न उम्मीदवारों के बीच बंट जाता है; इसलिए ऊंची जातियों का वोट निर्णायक साबित होता है। यही वजह है कि इस चुनाव में भी मायावती गैर-दलितों और ऊंची जातियों के वोटों पर खास फोकस कर रही हैं और उनके निशाने पर खासकर ब्राह्मण वोट हैं, जिसकी वजह से उन्हें 2007 के विधानसभा चुनावों में जीत का स्वाद मिल चुका है।
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