जब मायावती को मारने के इरादे से दरोगा ने निकाल ली थी पिस्तौल !

लखनऊ, 11 जनवरी। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन उनकी राजनीति में एक वक्त वह भी आया जब एक दारोगा ने उन्हें मारने के लिए पिस्तौल निकाल ली थी। उतार-चढ़ाव उनकी नियति रही। वे करीब तीन दशक तक उत्तर प्रदेश राजनीति की केन्द्र बिन्दु रहीं। जीत हो, हार हो, बसपा एक राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित रही। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले स्थिति बिल्कुल बदली हुई है। न कोई जोश-खरोश दिख रहा, न कोई चुनावी सरगर्मी।

When the policeman want to encounter of Mayawati in uttar pradesh

नवम्बर, दिसम्बर के दौरान जब भाजपा, कांग्रेस और सपा धुआंधार रैलियां करती रहीं, मायावती खामोश बैठी थीं। अब तो चुनावी सभाओं पर 15 जनवरी तक रोक लग गयी है। कोरोना संकट के बीच हो सकता है कि ये रोक आगे भी बढ़ जाये। ऐसे में मायावती को वर्चुअल प्रचार पर ही निर्भर रहना होगा। बसपा कमजोर (सिर्फ 3 विधायक) हो चुकी है और उसका डिजिटल जुड़ाव अन्य पार्टियों से कम है। इसलिए उसके सामने सबसे कठिन चुनौतियां खड़ी हो गयीं हैं।

मायावती ने विश्वस्त सहयोगियों को महत्व नहीं दिया ?

मायावती ने विश्वस्त सहयोगियों को महत्व नहीं दिया ?

बसपा के कई पुराने नेताओं का कहना है कि मायावती, कांशीराम की परम्परा को आगे नहीं बढ़ा सकीं। उन्होंने जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं दिया। कई नेताओं का यह भी आरोप है कि उन्होंने मायावती के डिक्टेटरशिप के कारण पार्टी छोड़ दी। संघर्ष के दिनों के साथी और प्रभावशाली नेता एक एककर बसपा छोड़ते रहे। आज मायावकी अकेली खड़ी हैं। एक्का-दुक्का ही बड़े चेहरे अब बसपा में रह गये हैं। 2017 में 19 विधायक जीते थे। अब सिर्फ 3 बचे हैं। मायावती पर आरोप है कि उन्होंने अपने विश्वस्त सहयोगियों को भी महत्व नहीं दिया। जिन लोगों ने उनके संघर्ष के दिनों में मदद की, मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने उन्हें भुला दिया। कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की थी। वे ही मायावती को बसपा में लाये थे। कांशीराम के बामसेफ संगठन के सदस्य तब बसपा में प्रभावकारी थे। मायावती की उम्र उस समय 28 साल थी। वे 1984 में कैराना लोकसभा सीट पर चुनाव हार गयीं थीं। 1985 में बिजनौर लोकसभा उपचुनाव और 1987 में हरिद्वार लोकसभा उपचुनाव हार चुकीं थीं। मायावती राजनीति में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहीं थीं।

मायावती के भरोसेमंद सहयोगी सरवर हुसैन

मायावती के भरोसेमंद सहयोगी सरवर हुसैन

इलाबाबाद के नैनी इलाके में बीड़ीवाला गली के रहने वाले सरवर हुसैन कांशीराम के बामसेफ संगठन से जुड़े थे। वे 1985 से ही मायावती को जानते थे। कांशीराम ने ही मायावती को उनसे मिलवाया था। कांशीराम जब भी इलाबाबाद आते तो सरवर हुसैन से खूब मिलना जुलना होता। 1988 में जब कांशीराम, वीपी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने इलाहाबाद आये तब वे सरवर हुसैन के घर का बना खाना खाते थे। इस दौरान सरवर हुसैन की मायावती से अच्छी जान-पहचान हो गयी। मायावती ने 1989 में पहली बार बिजनौर से लोकसभा का चुनाव जीता था। लेकिन वे 1991 का लोकसभा चुनाव हार गयीं थीं। बिजनौर सीट पर भाजपा के मंगत राम प्रेमी ने उन्हें हराया था। मायावती एक बार फिर संघर्ष के दौर में पहुंच गयीं। सरवर हुसैन जब जिंदा थे (2017 में मौत) तब उन्होंने मायावती से जुड़ा एक वाकया सार्वजनिक किया था। सरवर हुसैन के मुताबिक 1991 के चुनाव के समय ये आरोप लगा था कि मतपत्र देखने के विवाद में मायावती की बुलंदशहर के जिलाधिकारी के साथ छीनाझपटी हुई थी। हाथापाई का भी आरोप लगा था।

दारोगा ने मायावती को मारने के लिए निकाल ली थी पिस्तौल ?

दारोगा ने मायावती को मारने के लिए निकाल ली थी पिस्तौल ?

सरवर हुसैन ने जो बयां किया था उसके मुताबिक, "दिसम्बर 1991 में मायावती को बुलंदशाहर केस के सिलसिले में नैनी सेंट्रल जेल लाया गया था। जेल जाने के बाद मायावती को लखनऊ हाईकोर्ट में पेशी के लिए लाया गया था। मैं भी उनके साथ था। लखनऊ से लौटने के दौरान हम पैसेंजर ट्रेन से इलाहाबाद आ रहे थे। रास्ते में ट्रेन प्रयाग स्टेशन से थोड़ा पहले खड़ी हो गयी। सुबह के साढ़े चार बज रहे थे। साथ में दारोगा और पुलिसवाले भी थे। पुलिस की सुरक्षा में मायावती को लखनऊ लाया गया था। जब ट्रेन प्रयाग स्टेशन से कुछ पहले रुक गयी तो दारोगा ने मुझे और मायावती को नीचे उतरने को कहा। हम तीनों रेलवे लाइन पार कर आगे बढ़े थे। तभी दारोगा ने मायावती की हत्या के इरादे से पिस्तौल निकाल ली। यह देख कर मायावती डर गयीं। उन्होंने मुझसे कहा, सामने मस्जिद है, वहां लोग जमा हो रहे हैं, उन्हें आने के लिए आवाज दो नहीं तो ये (दारोगा) मुझे मार डालेगा। जिस डिब्बे में हमलोग बैठे थे उसमें सेना के कुछ जवान भी थे। हमलोगों के जोर जोर से बोलने की वजह से सैनिकों का ध्यान इस तरफ चला गया। उन्होंने वहीं से दारोगा को चेतावनी दी। यह सब देख कर दारोगा डर गया। इसके बाद मायावती को रिक्शा पर बैठा कर पुलिस लाइन लाया गया।" पुलिस लाइन पहुंचने पर मायावती ने दारोगा के खिलाफ शिकायत की। फिर उन्हें नैनी जेल लाया गया। मायावती ने जेल अधीक्षक को इस दारोगा के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करायी थी।

जान बचाने वाले को भी भुला दिया !

जान बचाने वाले को भी भुला दिया !

सरवर हुसैन ने बताया था कि कुछ दिन के बाद जब मायावती नैनी जेल से छूट गयीं तो वे बसपा के सांसद रहे हरभजन सिंह लाखा के साथ उनके घर पर रुकी थीं। घर लौटने के बाद मायावती ने सरवर हुसैन को 28 जनवरी 1992 को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें सहयोग के लिए आभार जताया था। सरवर हुसैन के पुत्र अहमद हुसैन को भी ये वाकया याद है। उन्होंने बताया था, 1995 में जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तो हमें लगा कि वे बुलाएंगी। किसी की जान बचाना बहुत बड़ी बात होती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने हमें भूला दिया। तब हम भी लखनऊ गये। सीएम ऑफिस में जा कर मुलाकात करने की कोशिश की। लेकिन मिलने का समय नहीं दिया गया। बहुत दौड़ने के बाद एक-दो बार मुलाकात भी हुई तो मुख्यमंत्री मायावती जी ने कुछ नहीं कहा। मेरे पिता ने बसपा के लिए बहुत कुछ किया था। जब मायावती जी नैनी जेल में बंद थीं तब मैं भी कई बार उनके लिए घर का बना खाना लेकर गया था। लेकिन मायावती जी ने मेरे परिवार की कभी खैरियत नहीं ली। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की यह अनदेखी बहुत तकलीफदेह है। सरवर हुसैन और अहमद हुसैन के आरोप कितने सही हैं, ये जांच का विषय है। लेकिन बसपा में समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का सवाल, अक्सर उठते रहा है।

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