कानपुर की एक और छापेमारी जो इंदिरा और जगजीवन राम की अदावत की वजह से हुई
लखनऊ, 03 जनवरी। उत्तर प्रदेश का इत्रनामा हातिमताई की तिलस्मी कहानियों की तरह रहस्यमय होता जा रहा है। किसी को मालूम न था कि इत्र कारोबार का एक पोशीदा रास्ता कुबेर के खजाने तक भी पहुंचता है। पीयूष जैन के यहां 197 करोड़ नकद बरामद हुए।

अब सपा एमएलसी पम्पी जैन भी कार्रवाई की जद में आ गये। उनके यहां पचास घंटे बाद तक रेड चलती रही। कितनी सम्पत्ति मिली इसका खुलास अभी नहीं हुआ है। कर चोरी के मामले में दूसरे इत्र कारोबारियों भी निशाने पर हैं। क्या चुनाव के पहले ये छापेमारी राजनीतिक कारणों से हो रही है ?

क्या राजनीतिक कारणों से आयकर के छापे पड़ते हैं ?
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग से अनुरोध किया है कि ये छापेमारी विधानसभा चुनाव के बाद करायी जाए। इस मामले में सपा और भाजपा ने एक दूसरे के खिलाफ तलवार खींच रखी है। क्या राजनीतिक कारणों से आयकर या ईडी की छापेमारी होती है ? इसके जवाब में एक पुरानी घटना का जिक्र काबिलेगौर होगा। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी और जगजीवन राम की अदावत ने भारत के सबसे बड़े आयकर छापा की पृष्ठभूमि तैयार की थी। कांग्रेस के एक पूर्व सांसद के घर तीन दिन, तीन रात तक छापेमारी चलती रही थी। सम्पत्ति के आंकलन और कागजी कार्रवाई की प्रक्रिया करीब एक महीने तक चली थी। इसलिए इसे भारत की सबसे लंबी इनकम टैक्स रेड माना जाता है। पूर्व सांसद का कसूर ये था कि वे जगजीवन राम के दूर के रिश्तेदार निकल आये थे। ये छापेमारी आज से 40 साल पहले कांग्रेस के पूर्व सांसद और प्रमुख उद्योगपति सरदार इंदर सिंह के ठिकानों पर हुई थी। उसी कानपुर शहर में जहां चार दिन पीयूष जैन के घर से करोड़ों के नोट बरामद हुए थे।

पूर्व सांसद सरदार इंदर सिंह
सरदार इंदर सिंह आजादी से पहले के राजनीतिज्ञ थे। वे संयुक्त भारत में पंजाब प्रांत से 1946 में कांग्रेस के विधायक चुने गये थे। उनके परिवार का कानपुर में व्यवसाय भी था। इंदर सिंह ने कानपुर में पहली स्टील रि-रोलिंग मिल की स्थापना की थी जिसका नाम था सिंह इंजीनियरिंग वर्क्स। उनका यह उद्योग इतना फला फूला कि इंदर सिंह भारत के बड़े व्यवसायी गिने जाने लगे। उन्होंने रेल डब्बे का कारखाना भी लगाया। उनकी आमदनी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। कांग्रेस के पुराने नेता थे। बड़े उद्योगपति बने तो उनका राजनीतिक महत्व बी बढ़ गया। 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इंदर सिंह को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का सांसद बना दिया। वे देश के ऐसे बड़े उद्योगपित थे जो विधायक भी रहे और सांसद भी।

जगजीवन राम के पुत्र सुरेश की शादी
1958 में जगजीवन राम परिवहन और रेल मंत्री थे। जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। इस साल जगजीवन राम के एकमात्र पुत्र सुरेश कुमार (सुरेश राम) ने एक पंजाबी महिला कमलजीत कौर (कमल कुमारी) से शादी कर ली। (इस शादी के बारे में पत्रकार मनमोहन शर्मा ने अपने संस्मरण में लिखा है।) जगजीवन राम इस शादी से नाराज हो गये। उन्होंने बेटे और बहू को घर से निकाल दिया। तब सुरेश कुमार और उनकी नवविवाहिता पत्नी जगजीवन राम से सरकारी बंगले के बाहर धरने पर बैठ गये थे। बाद में जगजीवन राम ने प्रतिष्ठा बचाने के लिए बेटे और बहू को डिफेंस कालोनी में एक घर खरीद दिया। सुरेश कुमार और कमल कुमारी वहीं रहने लगे। सुरेश कुमार और कमल कुमारी (कमलजीत कौर) को एक बेटी हुई जिसका नाम मेधावी कीर्ति है। कुछ साल बाद सुरेश कुमार और कमलजीत कौर का तलाक हो गया। फिर सम्पत्ति को लेकर दोनों परिवारों में विवाद भी हुआ। मेधावी कीर्ति ने बाद में मीरा कुमार के खिलाफ सासाराम से चुनाव भी लड़ा था।

आयकर छापा और राजनीतिक खुन्नस !
इंदर सिंह की पत्नी का नाम महेन्द्र कौर था। कहा जाता है कि महेन्द्र कौर सुरेश राम की पत्नी कमलजीत कौर की बहन थी। जब तक जगजीवन राम, इंदिरा गांधी के भरोसेमंद नेता बने रहे तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन 1977 में चुनाव से पहले जब जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी नयी पार्टी (कांग्रेस फॉर डेमेक्रेसी) बना ली तो इंदिरा गांधी ने उनसे खुन्नस पाल ली। संसद में आपातकाल का प्रस्ताव जगजीवन राम ने ही रखा था। चुनावी हार के बाद इंदिरा गांधी की जगजीवन राम से खुन्नस और बढ़ गयी। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी के इशारे पर ही 1978 में सुरेश राम की अश्लील तस्वीरें प्रकाशित की गयीं थीं तकि जगजीवन राम का राजनीतिक जीवन खत्म हो जाए। ऐसा हुआ भी। 1979 में जब मोरार जी देसाई ने इस्तीफा दिया था तब इसी घटना की वजह से जगजीवन राम प्रधानमंत्री नहीं बन पाये थे। ये अदावत साल दर साल और गहरी होती गयी। 1980 में इंदिरा गांधी की जब वापसी हुई तो जगजीवन राम एक बार फिर उनके निशाने पर आ गये। आरोप है कि इसी अदावत में इंदर सिंह के घर आयकर का छापा पड़ा था।

तो ऐसे छापा पड़ा पूर्व सांसद के घर
कहा जात है कि आयकर विभाग बहुत दिनों से सरदार इंदर सिंह की आर्थिक कुंडली खंगाल रहा था। लेकिन पूर्व सांसद होने के कारण अफसर उन पर हाथ डालने में हिचक रहे थे। कांग्रेस की सरकार थी और कांग्रेस के एक पूर्व सांसद के घर छापा मारना आसान नहीं था। इंदर सिंह के पूरे परिवार की आर्थिक गतिविधियों की निगरानी हो रही थी। आयकर विभाग को बड़ी कर चोरी का अंदेशा था। उनके चार बेटे, दो दामाद और पत्नी के बैंक खातों और लेनदेन की गहन जांच की गयी थी। इसी जांच में पता चला कि इंदर सिंह की पत्नी महेन्द्र कौर, सुरेश राम की पत्नी की बहन हैं। कहा जाता है कि वित्त मंत्रलाय के जरिये ये खबर इंदिरा गांधी तक पहुंची थी और उन्होंने कार्रवाई के लिए मौन सहमित प्रदान की थी। अब आयकर विभाग इस तनाव से मुक्त हो गया कि उसे एक पूर्व सांसद के घर छापा मारना है। हालंकि आयकर विभाग ने कभी ये नहीं माना कि इंदर सिंह का कोई कनेक्शन जगजीवन राम से है। फिर 16 जुलाई 1981 की सुबह आयकर विभाग के 90 अधिकारियों की टीम कानपुर पहुंची। कानपुर में इंदर सिंह के चार घरों पर एक साथ छापेमारी शुरू हुई। कहा जाता है कि इंदर सिंह ने छापा रोकने के लिए इंदिरा गांधी तक बात पहुंचाने की कोशिश की थी लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने उनकी मदद नहीं की।
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