अखिलेश - शिवपाल की जंग से किसका होगा फायदा, क्या पारिवारिक घमासान का अखिलेश को उठाना पड़ेगा नुकसान
लखनऊ, 12 अक्टूबर 2021 : उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले अब एक बार फिर सपा-प्रसपा के बीच सियासी द्वंद देखने को मिलेगा। मंगलवार को एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी (SP) के मुखिया अखिलेश यादव ने कानपुर से अपनी समाजवादी विजय यात्रा की शुरुआत की वहीं प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (PSP)ने भी समाजिक परिवर्तन यात्रा के नाम से अपनी रथयात्रा का आगाज कर चुनावी बिगुल फूंक दिया। चाचा-भतीजे की लड़ाई से पिछले दो चुनावों से अखिलेश को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसी उम्मीद जताई जा रही थी कि सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव की नसीहत के बाद स्थितियां बदलेंगी और दोनों में सुलह हो जाएगी लेकिन दोनों ने शुक्रवार को अलग-अलग यात्रा निकालकर अपने अपने मंसूबों को जाहिर कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल है कि अखिलेश- शिवपाल की लड़ाई से क्या बीजेपी को फायदा होगा या फिर मुसलमानों के वोट बैंक में एक बार फिर पहले की तरह बिखराव नजर आएगा। इन सवालों का जवाब तो आने वाले समय में मिलेगा लेकिन चाचा-भतीजे की रथयात्राओं ने यूपी की सियासत में नए समीकरण को जन्म जरूर दे दिया है।

मुस्लिम वोटबैंक में सेंधमारी का प्रयास में बसपा और छोटे दल
फ़िलहाल सपा के पारम्परिक कहे जाने वाले इस वोट बैंक में फैली सियासी अनिश्चितता ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सहित अन्य दलों की बांछें खिला दी हैं। ये राजनीतिक दल सपा के पारम्परिक वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत में लग गए हैं। सपा कुनबे में मचे घमासान के चलते मुस्लिम समाज में फ़ैली अनिश्चितता का लाभ उठाने के लिए बसपा नेताओं ने बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने की तैयारी की है। ओवैसी भी सपा से खफा मुस्लिम नेताओं को अपने साथ जोड़ने की जुगत में लग गए हैं।

शिवपाल से घमासान का अखिलेश को ही होगा नुकसान
समाजवादी पार्टी की राजनीति पर नजर रखने वाले राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि अखिलेश और शिवपाल के बीच घमासान का नुकसान फिर अखिलेश को उठाना पड़ सकता है। इसलिए अखिलेश यादव को अपने चाचा से संघर्ष करने के बजाए उनके साथ चुनावी गठबंधन करना चाहिए। अखिलेश जब ओम प्रकाश राजभर से चुनावी गठबंधन के लिए वार्ता कर रहे हैं तो फिर उन्हें शिवपाल से परहेज क्यों हैं? ये सवाल करने वाले राजनीतिक समीक्षक कहते हैं कि यादव और मुस्लिम समाज चाहता है कि अखिलेश यादव अपने चाचा के साथ अपने रिश्ते ठीक करें वरना मुस्लिम समाज सपा से दूरी बना लेगा।

147 सीटों पर मुस्लिम मतदाता हार जीत का फैसला करता है
उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता हार जीत का फैसला करने की सियासी कुव्वत रखता है। इस वोटबैंक के भरोसे ही सपा राज्य बड़ी राजनीतिक ताकत बनी है। सूबे के जातीय आंकड़ों के अनुसार, रामपुर में सबसे अधिक मस्लिम मतदाता हैं। रामपुर में जहां मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 42 है। मुरादाबाद में 40, बिजनौर में 38, अमरोहा में 37, सहारनपुर में 38, मेरठ में 30, कैराना में 29, बलरामपुर और बरेली में 28, संभल, पडरौना और मुजफ्फरनगर में 27, डुमरियागंज में 26 और लखनऊ, बहराइच व कैराना में मुसलमान मतदाता 23 प्रतिशत हैं। इनके अलावा शाहजहांपुर, खुर्जा, बुलन्दशहर, खलीलाबाद, सीतापुर, अलीगढ़, आंवला, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुस्लिम मतदाता कम से कम 17 प्रतिशत है। इन जिलों में निर्णायक भूमिका में होने के बाद भी बीते विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव से हुए संघर्ष के चलते सपा 47 सीटों पर ही सिमट गई थी।

शिवपाल ने की गठबंधन की कोशिश लेकिन अखिलेश ने नहीं बढ़ाया हाथ
सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कोई सबक नहीं सीखा और शिवपाल सिंह यादव के साथ गठबंधन नहीं किया। जबकि शिवपाल सिंह ने हर मंच से यह कहा कि वह सपा से गठबंधन चाहते हैं लेकिन अखिलेश यादव ने उनकी तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया। यह जानते हुए कि इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, एटा, बदायूं, कन्नौज, फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, आजमगढ़, गाजीपुर जौनपुर, बलिया आदि जिलों में शिवपाल सिंह यादव का प्रभाव है, उक्त जिलों के यादव और मुस्लिम समाज के लोग शिवपाल सिंह यादव को मानते हैं फिर भी अखिलेश यादव ने शिवपाल से दूरी बनाए रखी तो अब शिवपाल सिंह यादव ने भी अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए रथयात्रा शुरू कर दी।

अखिलेश को भांपना होगा मुस्लिम समाज का मिजाज
समाजवादी पार्टी में मचे आपसी घमासान को लेकर वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र नाथ भट का कहना है कि, ''सपा से जुड़े मुस्लिम मतदाता अब अखिलेश और शिवपाल के बीच बट रहे हैं। जिस मुस्लिम मतदाताओं ने बीते विधानसभा चुनावों में अखिलेश का साथ दिया था वह भी अब उनसे नाता तोड़ रहे हैं। इसकी वजह अखिलेश यादव के कार्य करने का तरीका है। पार्टी के प्रति लोगों से बदल रहे माहौल को अखिलेश यादव ने नहीं भापा तो यह तय है कि सूबे का मुस्लिम समाज अखिलेश यादव के साथ देने को लेकर सोचेगा। क्योंकि अब मुस्लिम समाज किसी के साथ आँख बंद करके समर्थन देने के मूड में नहीं है, वह उसी के साथ खड़ा होगा जो उसके पक्ष में बोलेगा, उसका साथ देगा।"












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