वाराणसी: जब ASI ज्ञानव्यापी मस्जिद में खुदाई करेगा,नमाज के लिए कहां दी जाएगी जगह ? जानिए
वाराणसी: वाराणसी कोर्ट के एक फैसले से काशी की ज्ञानव्यापी मस्जिद और बाबा विश्वनाथ मंदिर का मामला एकबार फिर सुर्खियों में आ गया है। अदालत ने हिंदुओं की मांग को मानते हुए ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को यह पता लगाने के लिए कहा है कि क्या यह मस्जिद 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर तोड़कर बनाई गई थी। अदालत ने माना है कि इस तरह के विवाद में सच का पता लगाने के लिए यह संस्था सबसे उपयुक्त है। अदालत ने एएसआई के डायरेक्टर जनरल को जो पांच सदस्यीय एक्सपर्ट कमिटी बनाने को कहा है, उसमें यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि उसमें कम से कम दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से जरूर होने चाहिए। इसके अलावा एक ऑब्जर्वर की भी नियुक्ति होगी और वो भी आर्कियोलॉजिकल एक्सपर्ट होंगे, जिन्हें ऐसे विषयों की गहन परख होगी और कमिटी उन्हें ही अपने सर्वे कार्यों से जुड़ी जानकारी देगी। इसके साथ ही अदालत ने सर्वे के दौरान ज्ञानव्यापी मस्जिद परिसर की सामान्य गतिविधियों के लिए भी आदेश दे दिए हैं, ताकि एएसआई को अपने कामों में कोई कठिनाई पेश ना आए।

विवादित स्थल पर मौजूद ढांचे से पहले क्या था ?
वाराणसी की अदालत ने गुरुवार के अपने आदेश में कहा है, 'आर्कियोलॉजिकल सर्वे का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाने का होगा कि विवादित स्थल पर अभी जो धार्मिक ढांचा मौजूद है, क्या उसे वहां पर किसी और ढांचे के ऊपर खड़ा किया गया है, उसमें कोई बदलाव किया गया या जोड़ा गया है, या फिर किसी दूसरी धार्मिक संरचना पर किसी तरह की कोई स्ट्रक्चरल ओवरलैपिंग की गई है..... ' अदालत ने कहा है कि 'यदि ऐसा है, तो वास्तव में वह कितनी पुरानी है, उसका आकार क्या है, स्थायी महत्त्व की और स्थापत्य संबंधी डिजाइन है या क्या विवादित स्थल पर अभी मौजूद धार्मिक ढांचे की स्टाइल और उस इमारत में इस्तेमाल किए गए मटेरियल एक ही तरह के हैं। '
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क्या विवादित स्थल पर पहले कोई मंदिर था ?
यही नहीं अदालत ने एएसआई को यह भी पता लगाने को कहा है कि 'कमिटी यह भी पता लगाएगी कि क्या जिस मस्जिद को लेकर सवाल उठाया जा रहा है उससे पहले कभी वहां पर हिंदू समुदाय का कोई मंदिर मौजूद था या उसपर से इसे खड़ा किया गया या फिर विवादित स्थल पर इसे बाद में बनाया गया। अगर ऐसा है तो वह कितना पुराना है, स्थायी महत्त्व की और स्थापत्य संबंधी डिजाइन है या उसी तरह की स्टाइल की है और वह किस हिंदू देवता या देवी-देवताओं को समर्पित था।'

सर्वे की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी
अदालत ने एएसआई से ऐसी कमिटी बनाने को कहा हो, जो इस मामले की संवेदनशीलता से वाकिफ हो, ताकि इससे केस से जुड़े दोनों ही समुदाय के लोगों को लगे कि उन्हें बराबर का सम्मान मिला है और कोई भी पक्ष पक्षतापूर्ण और तरजीही बर्ताव महसूस ना करे। इसके साथ ही अदालत ने इस सर्वे को पूरी तरह से गोपनीय रखने को कहा है और साफ कर दिया है कि कमिटी की ओर से सर्वे की प्रगति की कोई भी जानकारी आम लोगों या फिर मीडिया के सामने जाहिर नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने जिला प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि कमिटी को पुख्ता सिक्योरिटी दी जाए, ताकि कोई भी पक्ष उसकी ओर से किए गए कार्यों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ ना कर सकें। जबतक यह काम चलेगा इलाके में शांति बहाली सुनिश्चित करना भी जिला प्रशासन के जिम्मे रहेगा।

ज्ञानव्यापी मस्जिद में नमाज को लेकर भी दिया आदेश
अदालत ने अपने आदेश में एएसआई के सर्वे के दौरान ज्ञानव्यापी मस्जिद में पढ़ी जाने वाली नमाज के लिए भी सारी स्थिति अभी से स्पष्ट कर दी है। अदालत ने कहा है कि सर्वे के दौरान विवादित स्थल पर जो मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए आएंगे उन्हें ऐसा करने से नहीं रोका जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कह दिया है कि यदि इसके चलते एएसआई की सर्वे कमिटी को अपना काम करने में किसी तरह की दिक्कत आएगी तो वह ज्ञानव्यापी मस्जिद परिसर के भीतर ही मुसलमानों को नमाज पढ़ने के लिए वैकल्पिक जगह उपलब्ध करा देंगे।

औरंगजेब के आदेश पर मंदिर गिराने का दावा
वाराणसी कोर्ट में यह याचिका एक स्थानीय वकील विजय शंकर रस्तोगी ने 2019 में दायर की थी। उनका दावा था कि विवादित स्थान पर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक स्वंयभू भगवान विश्ववेश्वर का मंदिर अति-प्राचीन काल से मौजूद था, जिसका 2,050 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य ने पुनर्निमाण करवाया था, जिसे 1669 में औरंगजेब के आदेश पर गिरा दिया गया था। इस दावे के मुताबिक शिवलिंग मस्जिद के अंदर ही मौजूद है और श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करके पूजा करते हैं, लेकिन वह उसका जलाभिषेक नहीं कर पाते। अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इस याचिका का विरोध किया था।












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