मुस्लिम महिला के सपने में आए शिव, हुई एक अनहोनी, फिर शिवालय बनने की पूरी कहानी
सड़क किनारे बना ये शिव मंदिर दो संप्रदायों के सौहार्द का वो मिलन है, जो वाराणसी में पिछले 13 सालों से मिसाल बना हुआ है। वैसे तो बनारस की गली-गली में शिव मंदिर है लेकिन ये शिव मंदिर बेहद खास है।
वाराणसी। सूबे के चुनावी महासमर मे जहां एक ओर श्मशान और कब्रिस्तान बनवाने को लेकर राजनीति की जा रही है और अमिताभ बच्चन के गुजरात पर्यटन के एक विज्ञापन जिसमें एक सेंचुरी के गधे के विज्ञापन को अखिलेश यादव ने गुजरात के गधों को प्रचार बता कर प्रत्यारोप किया गया। ऐसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को अप्रांसगिक साबित करने वाली जमीनी हकीकत सामने आई है जिससे राजनितिक नेता बेहद दूर है और लेकिन इस बात को समझने के लिये वाराणसी के इस शिव मंदिर के इतिहास के बारे मे जानना चाहिए कि हिन्दुस्तान का सामाजिक तानाबाना किसी श्मशान-कब्रिस्तान या गधे के इर्द गिर्द नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और आपसी सहयोग से चलता है। चलिए आपको इस खबर के माध्यम से बताते हैं एक चौकाने वाले सच की कहानी। ये भी पढे़ं: इस शिव मंदिर पर हुई थी वो घटना जिसके बाद हुआ 1857 का संग्राम

शिव मंदिर दो संप्रदायों के सौहार्द का मिलन है
सड़क किनारे बना ये शिव मंदिर दो संप्रदायों के सौहार्द का वो मिलन है जो वाराणसी में पिछले 12 सालों से मिसाल बना हुआ है। वैसे तो बनारस की गली-गली में शिव मंदिर हैं लेकिन ये शिव मंदिर इसलिए ख़ास है कि इसे बनाने वाले कोई हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम है। 2004 में बना शिव मंदिर वाराणसी की रहने वाली नूर फातिमा ने अपने घर के पास खाली जमीन पर बनवा कर इसे सार्वजनिक किया ताकि लोग यहां आकर दर्शन कर सके।

कौन हैं नूर फातिमा ?
नूर फातिमा पेशे से एक वकील हैं। जो वाराणसी के ही न्यायालय फौजदारी मामलों की वकालत करती हैं। नूर फातिमा पिछले 20 सालों से वाराणसी में वकालत कर रही हैं। मिली जानकारी के अनुसार महिलाओं का केस नूर फातिमा बिना फीस के लड़ती हैं।

ये है इस मंदिर को बनाने की चौकाने वाली वजह
बता दें कि 2004 में नूर फातिमा को उनके सपने में मंदिर दिखाई देता था। कई दिनों तक महादेव के मंदिर और उसमें सफ़ेद माले को चढ़ाकर अराधना करने का दृश्य सपने में नूर फातिमा ने देखा फिर कुछ दिनों बाद पति की दुर्घटना में मौत हो गयी, तब उन्हें लगा महादेव पहले से बता रहे थे कोई अनहोनी होगी नवंबर 2004 को मंदिर के लिये पहली ईट नूर फातिमा ने अपने हाथों से रखी जिसके पांच महीने बाद 8 मार्च 2005 को भगवान शिव का मंदिर बनकर तैयार हो गया।

क्या कहती हैं नूर फातिमा
वहीं, खुद के साथ हुए इस हादसे के बाद नूर फातिमा ने कहा इंसान परेशान होता है तो अल्लाह और भगवान के पास ही जाता है। लेकिन अनहोनी को रोकने के लिए उन्होंने ये मंदिर बनवाया है। आज भी वे अपनी नमाज के साथ यहां आकर शिवलिंग को जल चढ़ाती हैं। धर्म में भेदभाव कैसा। भगवान और खुदा एक हैं।

हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है नूर-फातिमा
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