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इस शिव मंदिर पर हुई थी वो घटना जिसके बाद हुआ 1857 का संग्राम

इस मंदिर को वैसे तो सभी लोग जानते हैं लेकिन इस बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है कि इसी मंदिर से 1857 की क्रांति का बिगुल फूंका गया था। एक समय में माराठा योद्धाओं के लिए भी ये मंदिर बेहद खास था।

मेरठ। वैसे तो हमारे देश के बड़े-बड़े मंदिर किसी ना किसी ऐतिहासिक घटना से जरूर जुड़े हुए हैं लेकिन आज हम जिस शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं वो देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से सीधा जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों की मानें तो इसी मंदिर में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बीज पड़े थे। ये मंदिर कोई और नहीं उत्तर भारत के सबसे पुराने शहर मेरठ में है। जिसका नाम औघड़नाथ मंदिर है। जानकारों की मानें तो यहां की काफी मान्यता है। ये देश के सबसे पुराने शिव मंदिरों में शुमार होता है।

1857 की क्रांति का बिगुल यहां से फूंका गया था

1857 की क्रांति का बिगुल यहां से फूंका गया था

औघड़नाथ शिव मंदिर को वैसे तो सभी लोग जानते हैं लेकिन इस बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है कि इसी मंदिर से 1857 की क्रांति का बिगुल फूंका गया था। जानकारों की मानें तो बंदूक की कारतूस में गाय की चर्बी का इस्तेमाल होने के बाद सिपाही उसे मुंह से खोलकर इस्तेमाल करने लगे थे। तब मंदिर के पुजारी ने उन जवानों को मंदिर में पानी पिलाने से मना कर दिया। ऐसे में पुजारी की बात सेना के जवानों को दिल पर लग गई। उन्होंने उत्तेजित होकर 10 मई 1857 को यहां क्रांति का बिगुल बजा दिया। जानकारों के मुताबिक औघड़नाथ शिव मंदिर में कुएं पर सेना के जवान आकर पानी पीते थे। इस ऐतिहासिक कुएं पर आज भी बांग्लादेश के विजेता तत्कालीन मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा द्वारा स्थापित शहीद स्मारक क्रांति के गौरवमय अतीत का प्रतीक उल्लेखित है। इस मंदिर के आसपास के शांत वातावरण और गोपनीयता को देखकर अंग्रेजों ने यहां अपना आर्मी ट्रेनिंग सेंटर बनाया था। भारतीय पल्टनों के पास होने की वजह से अनेक स्वतंत्रता सेनानी यहां आकर ठहरते थे। यहीं पर भारतीय पल्टनों के अधिकारियों से उनकी गुप्त बैठक हुआ करती थी। इनमें हाथी वाले बाबा अपना विशिष्ट स्थान रखते थे।

मराठा किया करते थे यहां पूजा-पाठ

मराठा किया करते थे यहां पूजा-पाठ

ये मंदिर वीर मराठाओं का पूजा स्थल भी रहा है। कई प्रमुख पेशवा अपनी विजय यात्रा से पहले इस मंदिर में जाकर भगवान शिव की उपासना करते थे। यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती थी। यही वजह है कि आज भी इस औघड़नाथ शिव मंदिर में दूर-दूर से लोग पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

फाल्गुन में शिवभक्त चढ़ाते हैं कांवड़

फाल्गुन में शिवभक्त चढ़ाते हैं कांवड़

मान्यता है कि औघड़नाथ शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना का कार्य प्राचीन काल से होता आ रहा है। श्रावण और फाल्गुन महीने में शिवरात्रि के दिन यहां बड़ी संख्या में शिवभक्त पहुंचकर कांवड़ चढ़ाते हैं। भगवान शिव का औघड़नाथ शिव मंदिर मेरठ के कैंटोन्मेंट क्षेत्र में स्थित है। औघड़नाथ शिव मंदिर एक प्राचीन सिद्ध पीठ है। अनंतकाल से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं। इसी कारण इसका नाम औघड़नाथ शिव मंदिर पड़ गया।

काली पल्टन के नाम से भी जाना जाता है मंदिर

काली पल्टन के नाम से भी जाना जाता है मंदिर

औघड़नाथ मंदिर को काली पल्टन के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में भारतीय सेना को काली पल्टन कहा जाता था। ये मंदिर काली पल्टन क्षेत्र में होने के कारण इस नाम से भी विख्यात है। मंदिर की स्थापना का कोई निश्चित समय उपलब्ध नहीं है लेकिन माना जाता है कि ये मंदिर सन् 1857 से पहले ख्याति प्राप्त वंदनीय स्थल के रूप में विद्यमान था। आज इस मंदिर में साल भर में लाखों लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। सबसे अधिक भीड़ फाल्गुन और श्रावण माह में शिवरात्रि के दौरान यहां दिखाई देती है। सोमवार के दिन ही नहीं रोजाना यहां सुबह-शाम श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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