इस प्रचंड जीत के बाद भी अखिलेश बढ़ा सकते हैं भाजपा की मुश्किल, आसान नहीं है आगे की राह
लखनऊ, 11 मार्च। उत्तर प्रदेश के चुनाव में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने जबरदस्त जीत दर्ज की और लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की है उससे एक बात साफ है कि योगी आदित्यनाथ की प्रदेश में लोगों के बीच लोकप्रियता कम नहीं हुई है। योगी आदित्यनाथ के साथ ही लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर विश्वास किया और एक बार फिर से भाजपा को प्रदेश में पूर्ण बहुमत दिया है। वहीं सपा की बात करें तो निसंदेह सपा सत्ता में वापसी करने में विफल रही है लेकिन पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है।

सपा और अखिलेश नए कलेवर में
उत्तर प्रदेश में जिस तरह से अखिलेश यादव ने अकेले दम पर सपा का चुनावी अभियान चलाया, उसके बाद निसंदेह वह सपा के नए चेहरे को लेकर सामने आए हैं। इस चुनाव में अखिलेश यादव के अभ्युदय के साथ सपा का नया कलेवर भी लोगों को देखने को मिला। 2017 में भाजपा की वापसी की बात करें तो जिस तरह से नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला 2016 में लिया गया उसका असर यूपी के चुनाव में देखने को मिला और लोगों ने पीएम मोदी को गरीबों के मसीहा के तौर पर देखा है। हालांकि ये अलग बात है कि नोटबंदी इस सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक चोट पहुंचाने वाला फैसला साबित हुआ। लेकिन इस चुनाव में जिस तरह से भाजपा ने 300 का आंकड़ा पार किया उसके बाद मजबूरन सपा और बसपा को साथ आना पड़ा।

वोटों का समीकरण
2019 की बात करें तो अखिलेश यादव ने मायावती और जयंत चौधरी के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा। लेकिन बावजूद इसके यह गठबंधन भाजपा को चुनौती नहीं दे पाया। दोनों के साथ आने से ओबीसी और दलित जातियों के छोट समुदाय थे वो भाजपा के साथ आ गए। उस वक्त तक सपा को मुख्य रूप से यादवों की पार्टी, बसपा को दलितों खासतौर पर जाटवों की पार्टी माना जाता था। ओबीसी में यादव वोट बैंक की बात करें तो यह तकरीबन 10-12 फीसदी है। जबकि जाटव वोटर सबसे बड़ी सख्या में हैं और इनकी कुल संख्या 11 फीसदी के लगभग है। ऐसे में ये दोनों जातियां उच्च जातियों की तुलना में कम हैं लेकिन ओबीसी और दलित समुदाय की तुलना में यह अहम हैं।

गैर यादव-जाटव वोटर का डर
यादव और जाटव जातियों के साथ आने के बाद अन्य ओबीसी जातियों को इस बात का डर था कि ये सत्ता में आने के बाद संसाधनों को अपने हिसाब से अपनी जातियों के लिए इस्तेमाल करेंगी और यही वजह थी कि अन्य ओबीसी जातियों ने भाजपा को चुना। इसके साथ ही पीएम मोदी की हिंदुत्व की अपील ने लोगों को भाजपा की ओर लाने में अहम भूमिका निभाई। साथ ही केंद्र की तमाम योजनाएं जो गरीबों को समर्पित थीं उन्होंने इन वोट बैंक को भाजपा की ओर लाने में अहम योगदान दिया।

इतनी भी आसान नहीं है भाजपा की आगे की राह
हालांकि भाजपा ने यूपी में फिर से जीत दर्ज की है लेकिन फिर भी भाजपा के लिए यह नतीजे चिंता बढ़ाने वाले हैं। इसकी बड़ी वजह है कि भाजपा के साथियों का वोट फीसदी 6 प्रतिशत गिरा है। जोकि लोकसभा चुनाव के दौरान भी संभावित है भाजपा के खिलाफ जाए। इसको इस तरह से समझते हैं इस चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस और मायावती के वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की है।

पीएम मोदी ने बदला प्रदेश का सियासी समीकरण
2002 से 2014 के बीच यूपी में सिर्फ तीन बड़े दल थे सपा, बसपा और भाजपा। लेकिन 2014 के बाद राजनीतिक हालात बदले और पीएम मोदी के आगमन के साथ ही 2017 में भाजपा ने पूरे समीकरण को बदल दिया। सपा और बसपा मिलकर आधे से ज्यादा वोट हासिल करते थे जोकि 2017 में गिरकर पहले 40 फीसदी हुआ और फिर 2019 में सपा-बसपा मिलकर मुश्किल से 40 फीसदी वोट हासिल कर सकी। लेकिन इस बार के चुनाव में अखिलेश यादव ने अपना वोट फीसद बढ़ाया है। उन्होंने सपा के पक्ष में मुस्लिम वोटों को खींचा, गैर यादव ओबीसी वोट को अपनी ओर लाने में सफल हुए। साथ ही सरकार को लेकर जिन वोटर्स में नाराजगी थी वो भी सपा के खाते में आई।

वोटर्स का दिलचस्प आंकड़ा
वर्ष 2017 की बात करें तो भाजपा को सपा से 18 फीसदी अधिक वोट मिले थे, जोकि 2019 में बढ़कर 32 फीसदी तक पहुंच गया। लेकिन अब अखिलेश ने इस नुकसान को 10 फीसदी कम किया है। भाजपा और उसके सहयोगियों और सपा व उसके सहयोगियों के बीच वोट फीसदी का अंतर सिर्फ 8 प्रतिशत है। इस बार सपा को जहां 32.1 फीसदी वोट मिला है तो भाजपा को 41.3 फीसदी वोट मिला है। ऐसे में 2019 के वोट फीसदी को देखें को सपा गठबंधन को भाजपा को हराने के लिए 16 फीसदी वोट की सेंधमारी की जरूरत थी। लेकिन अगली बार सपा को 4 फीसदी वोटों में सेंधमारी करने की जरूरत है जोकि असंभव नहीं है।

मुस्लिम-यादव गठजोड़
ऐसे में निसंदेह भारतीय जनता पार्टी आने वाले चुनाव में इन आंकड़ों पर नजर रखेगी। चार राज्यों में भाजपा की जीत ने साफ कर दिया है कि ध्रुवीकरण और लोक-लुभावन नीतिया अभी भी भाजपा के लिए जीत का मंत्र है। ऐसे में भाजपा की कोशिश होगी कि इन फायदों को गैर यादव ओबीसी जातियों तक पहुंचाया जाए। आने वाले समय में यादव-मुस्लिम गठजोड़ को तोड़ने के लिए भाजपा निसंदेह तोड़ने की कोशिश करेगी। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव का केंद्र निसंदेह उत्तर प्रदेश बनेगा।












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