पूर्वांचल में तय होगा छोटी पार्टियों का भविष्य, जानिए क्यों है ओपी राजभर-अखिलेश गठबंधन की परीक्षा
लखनऊ, 7 मार्च: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के सातवें चरण का मतदान 7 मार्च को समाप्त हो जाएगा। कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। इसी तरह यूपी विधानसभा का रास्ता पूर्वांचल से होकर गुजरता है। पूर्वांचल के लोग ही यह तय करते हैं कि किसकी सरकार बनेगी। राज्य का इतिहास भी इस बात की ओर इशारा करता है कि अब तक ज्यादातर मुख्यमंत्री पूर्वांचल से ही बने हैं। सातवें चरण में कई बड़े नेताओं की के साथ ही राज्य में छोटी पार्टियों का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लगा है। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव में बड़ी पार्टियों से गठबंधन कर छोटी पार्टियों ने अपनी ताकत दिखाई है। तब बीजेपी ने छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था और इस बार सपा इस मामले में बीजेपी से आगे है।

छोटे दलों ने चुनाव में किए बड़े दावे
फिलहाल छोटे दलों ने चुनाव में बड़े-बड़े दावे किए हैं और सातवें चरण में उनका कद भी तय होगा। क्योंकि इस चुनाव के बाद तय होगा कि आने वाले चुनाव में छोटे दलों की क्या भूमिका होगी। राज्य में छोटी पार्टियों में अपना दल (एस), सुभासपा और निषाद पार्टी को मजबूत माना जाता है। चुनाव के इस चरण में अपना दल (एस) प्रमुख अनुप्रिया पटेल और सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का राजनीतिक कद भी तय होगा। सातवें चरण में राज्य के नौ जिलों की 54 सीटों पर 7 मार्च को अंतिम चरण का मतदान होना है और सभी राजनीतिक दलों के अपने-अपने दावे हैं। वहीं दूसरी ओर छोटे दलों ने बड़ी पार्टियों से गठबंधन कर लिया है।

2017 के चुनाव में छोटे दलों ने दिखाया असर
2017 के विधानसभा चुनाव में छोटे ने पूर्वांचल में अच्छा प्रदर्शन किया था। पिछले चुनाव में बीजेपी ने 29 सीटें जीती थीं, जबकि सपा ने 11 और बसपा ने छह सीटें जीती थीं। जबकि अपना दल ने चार और सुभाषपा ने तीन और एक सीट निषाद पार्टी ने जीती थी। इसके साथ ही सुभासपा तीन सीटों पर दूसरे और निषाद पार्टी एक सीट पर दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार भी छोटे दलों का जोर ज्यादातर छठवें और सातवें चरण में ही रहा है। इसकी वजह यह है कि गोरखपुर और बस्ती मंडल के अलावा आजमगढ और बनारस मंडल में छोटी छोटी पार्टियों की भूमिका काफी अहम है। यहां जाति के हिसाब से पार्टियों का गठन किया गया है।

इस चुनाव में होगा छोटे दलों की किस्मत का फैसला
इस चुनाव में छोटे दलों की भूमिका काफी अहम है। पिछली बार के चुनाव में अपना दल ने 11 उम्मीदवार उतारे थे और 9 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही थी। वहीं, कांग्रेस 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करने के बाद भी सिर्फ सात सीटें ही जीत सकी। दरअसल छोटी पार्टियों ने बड़ी पार्टियों से गठबंधन कर लिया था और इस वजह से बड़ी पार्टियों के वोटर इन छोटी पार्टियों की तरफ गए। जिससे इन दलों ने राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं, अब सुभास्पा सपा के साथ चुनाव लड़ रही हैं। अनुप्रिया पटेल की पार्टी ने इस बार भी बीजेपी के साथ समझौता किया है। यूं कहें की संजय निषाद, ओम प्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल का राजनीतिक कद क्या होगा यह इस चुनाव में पता चल जाएगा।

पश्चिम में जयंत की चौधराहट दांव पर
पश्चिम में जयंत चौधरी और अखिलेश के गठबंधन ने बीजेपी को परेशान किया। आरएल चीफ जयंत ने इस बार अखिलेश के साथ मिलकर चुनाव लड़ा है। खासतौर से पश्चिम में किसान आंदोलन का काफी असर देखा गया और इसको लेकर जाटों में बीजेपी के प्रति नाराजगी का माहौल दिखायी दिया था। एक तरफ से इस बार जयंत के राजनीतिक किस्मत का भी फैसला होगा क्योंकि इस बार अखिलेश के साथ मिलकर उन्होंने पश्चिम में बीजेपी को झटका नहीं दिया और आरएलडी को सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं तो इसकी गूंज आने वाले कई चुनावों तक सुनायी देगी। हालांकि इस बार बसपा ने पश्चिम में सपा के खिलाफ मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारकर मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है लेकिन यह कितना कारगर हुआ है यह तो मतगणना के बाद ही सामने आएगा।












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