Ramcharitmanas Controversy को लेकर दो धड़ों में बंटी सामाजवादी पार्टी, जानिए इसकी वजहें

Ramcharitmanas Controversy: 2014, 2019 के पिछले दो लोकसभा चुनावों और 2017 और 2022 के दो विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के हाथों लगातार करारी हार झेलने वाली सपा अब अपनी जमीन को फिर से हासिल करने के लिए बेताब है।

अखिलेश

Ramcharitmans Controversy in UP : उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (MLC) स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा रामचरितमानस के श्लोकों पर विवादास्पद टिप्पणी के बारे में पार्टी के अध्यक्ष की अस्पष्टता ने पार्टी को दो धड़ों में विभाजित कर दिया है। रामचरितमानस के मुद्दे को लेकर सपा नेताओं में ब्राह्मण और ठाकुर नेता जहां सपा की लाइन को लेकर नाखुशी जाहिर की है। हालांकि सपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी के भीतर जानबूझकर दो खेमा बनाया जा रहा है कि एक तरफ ओबीसी नेता इस मुद्दे को तूल दें तो दूसरी ओर सवर्ण जातियों के नेता इसपर नाखुशी जताएं जिससे सवर्णों के बीच गलत संदेश न जाए।

दो धड़ों में क्यों दिखना चाहती है सपा

दो धड़ों में क्यों दिखना चाहती है सपा

अभी तक सपा के किसी वरिष्ठ नेता ने स्वामी प्रसाद मौर्य की विवादित टिप्पणी का समर्थन नहीं किया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'पार्टी अपने विकल्पों पर विचार कर रही है और स्पष्ट तस्वीर यूपी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान ही सामने आएगी, अगर विपक्ष के नेता अखिलेश यादव इस मुद्दे को सदन में उठाने का फैसला करते हैं।' हालांकि सपा के कुछ नेताओं जिसमें पवन पांडेय और ओम प्रकाश सिंह जैसे नेता शामिल हैं, इसको लेकर अपनी नाखुशी जाहिर कर चुके हैं। पार्टी के रणनीतिकारों की माने तो इससे सपा सवर्ण जातियों के बीच भी अपनी उपस्थिति बनाए रखना चाहती है ताकि उनके अंदर सपा को लेकर नाराजगी न पैदा हो।

गैर यादव ओबीसी वोट खिसकने से ही कई चुनाव हार चुकी है सपा

गैर यादव ओबीसी वोट खिसकने से ही कई चुनाव हार चुकी है सपा

दरअसल 2014, 2019 के पिछले दो लोकसभा चुनावों और 2017 और 2022 के दो विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के हाथों लगातार करारी हार झेलने वाली सपा उस जमीन को फिर से हासिल करने के लिए बेताब है, जिसे वह बीजेपी से हार चुकी है। हालांकि सपा ने 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में 111 सीटों पर अपनी सीटों में काफी सुधार किया, लेकिन भाजपा एक दुर्जेय दुश्मन और गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक की प्रमुख दावेदार बनी हुई है।

बीजेपी को उसी के हथियार से काउंटर करेगी सपा

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हालांकि, नेताओं का एक वर्ग सपा की जातीय पहचान को फिर से स्थापित करने के उद्देश्य से पार्टी द्वारा आक्रामक रुख का समर्थन करता है। उनका तर्क है कि ओबीसी और एससी के बीच पार्टी द्वारा तेजी से की जा रही घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए जातिवादी राजनीति ही एकमात्र तरीका है। सपा नेताओं के इस वर्ग का कहना है कि उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस को लेकर विवाद दिलचस्प तरीके से चल रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सपा इस मामले को अगले लोकसभा चुनाव तक जिंदा रख पाएगी।

मौर्य का कद बढ़ाकर कई निशाने साध रहे अखिलेश

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एक सपा नेता ने कहा कि जातियों पर तुलसीदास की रचना के कुछ हिस्सों पर सवाल उठाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की टिप्पणियों पर रक्षात्मक होने के बजाय, इसने हमें एकमात्र पार्टी के रूप में पेश करने का अवसर प्रदान किया है जो सबसे पिछड़े वर्गों (एमबीसी) के कारणों का समर्थन कर सकती है। स्वामी प्रसाद मौर्य एमबीसी से हैं। इस नेता ने तर्क दिया कि मौर्य के पीछे अपना वजन डालकर एक तरह से सपा पूर्वांचल में ओम प्रकाश राजभर की काट खड़ा कर रही है।

क्या ज्यादा दिन तक इस विवाद को खींच पाएगी सपा

क्या ज्यादा दिन तक इस विवाद को खींच पाएगी सपा

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो सपा रामचरितमानस विवाद को लेकर जल्दबाजी में है। ऐसा लग रहा है कि सपा से इस मामले में चूक हो गई है क्योंकि सपा ने जो राग छेड़ा है उससे बीजेपी तो परेशान है लेकिन क्या सपा इस मुद्दे को ज्यादा दिन तक जिंदा रख पाएगी। दरअसल शायद इस रणनीतिक चूक को भांपते हुए ही अखिलेश ने शायद इस मुद्दे को जातिगत जनगणना से जोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास किया है। अब देखना है कि सपा इसको कितना आगे ले जा पाती है।

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