सलमान खुर्शीद ने छेड़ा नया राग- योगी से बेहतर CM साबित होंगी प्रियंका: जानिए कौन किस पर है भारी
लखनऊ, 04 अक्टूबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले तमाम राजनीतिक दल सीएम फेस को लेकर उलझे हुए हैं। सबके अपने अपने दावे हैं। कुछ दिन पहले ही भारतीय जनता पार्टी के यूपी के मुख्य चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान लखनऊ के दौरे पर आए थे। प्रेस कांफ्रेंस में जब उनसे यह सवाल किया गया कि यूपी में चुनाव के दौरान "सीएम का चेहरा" कौन होगा। इस सवाल का जवाब धर्मेंद्र प्रधान ने बड़े सधे हुए तरीके से दिया था। उन्होंने कहा था कि यूपी का चुनाव 'मोदी व योगी' के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। उन्होंने साफतौर से यह नहीं बताया कि सीएम योगी ही चेहरा होंगे या अगली सरकार बनी तो सीएम भी योगी ही होंगे। हालांकि कांग्रेस की कहानी इससे थोड़ी अलग है। सलमान खुर्शीद ने कहा है कि प्रियंका गांधी योगी से बेहतर सीएम साबित होंगी। आइए जानते हैं कि किसके दावे में कितना दम है।

सलमान खुर्शीद ने प्रियंका को बताया योगी से बेहतर सीएम
दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने रविवार को कहा कि उत्तर प्रदेश में अगली सरकार कौन बनाएगा, इसका फैसला आने वाले चुनावों में ही होगा। प्रियंका गांधी वाड्रा योगी आदित्यनाथ से बेहतर चेहरा हैं। खुर्शीद ने लखनऊ में चुनावी घोषणा पत्र पर पार्टी की संभाग स्तरीय बैठक का समापन करते हुए कहा कि, ''प्रियंका गांधी पहले से ही लोगों से मिल रही हैं और आश्वासन दे रही हैं कि उत्तर प्रदेश में पारदर्शिता के साथ काम करने वाली एक बेहतर सरकार बनने जा रही है।'' यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें लगता है कि प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टक्कर दे सकती हैं, खुर्शीद ने जवाब दिया, "जबकि भविष्य तय करेगा कि कौन (चुनाव) जीतने वाला है), प्रियंका गांधी का चेहरा उनके (आदित्यनाथ) से बेहतर है और यही सच्चाई है।"

गारेखपुर सांसद से सीएम तक का योगी का सफर
वर्ष 1994 में गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख महंत अवैद्यनाथ के शिष्य के रूप में दीक्षा प्राप्त की, जिन्होंने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 22 साल की उम्र में, अजय सिंह बिष्ट को 1994 में 'दीक्षा' प्राप्त करने के बाद योगी आदित्यनाथ के रूप में जाना जाने लगा। इसके बाद 1998 में महज 26 साल की उम्र में पहली बार गोरखपुर लोकसभा सीट जीती थी। लगातार 5 बार वहीं जीत चुके हैं। 1999 में समाजवादी पार्टी के सदस्य तलत अजीज सपा के 'जेल भरो आंदोलन' के एक हिस्से के रूप में भाषण दे रहे थे, जब कुछ बदमाशों ने उन पर गोलियां चला दीं। आरोप लगा था कि आदित्यनाथ के कहने पर ही तलत अजीज पर गोलियां चलाईं गईं थीं। इसके बाद 2002 में रामनवमी के अवसर पर हिंदू युवा वाहिनी की स्थापना की जिसे एक सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह कहा जाता है।

विधानसभा सीटों को लेकर बीजेपी से भिड़ गए थे योगी
2002 और 2007 यूपी चुनाव में सीटों को लेकर पेंच फंसा था। उस समय योगी और भाजपा के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए थे। 2002 और 2007 के यूपी चुनावों में, भाजपा और आदित्यनाथ गोरखपुर में उम्मीदवारों को दी जाने वाली सीटों की संख्या को लेकर संघर्ष कर रहे थे। हालांकि आरएसएस के हस्तक्षेप से यह मामला शांत हुआ था। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की अभूतपूर्व जीत के बाद, उन्हें विधानसभा उपचुनावों के लिए स्टार प्रचारक बनाया गया। उन्होंने लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दे उठाए लेकिन बीजेपी ज्यादातर सीटों पर हार गई। तब से, उन्होंने राजनीतिक रूप से एक लो प्रोफाइल रखा है। सितंबर में अपने आध्यात्मिक "पिता", महंत अवैद्यनाथ की मृत्यु के बाद, वह गोरखपुर में एक हिंदू मंदिर, गोरखनाथ मठ के महंत (प्रमुख पुजारी) बन गए।

पिछले चुनाव में 150 से ज्यादा रैलियां की थीं
2017 में यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के लिए, आदित्यनाथ को फिर से एक स्टार प्रचारक नामित किया गया और उन्होंने राज्य भर में 150 से अधिक रैलियां कीं। उन्होंने कानून और व्यवस्था की स्थिति पर व्यापक रूप से चर्चा की और 'लव जिहाद' को एक प्रमुख मुद्दा बनाया था। चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और बीजेपी और संघ ने उन्हें यूपी का सीएम बनाने का फैसला किया था। इसके बाद वह पिछले साढ़े चार साल से यूपी की सरकार चला रहे हैं जो कई उतार चढ़ाव देख चुकी है।

राजनीति में आने से पहले भी अपनी भूमिका निभाती रही हैं प्रियंका
कांग्रेस की वर्तमान राष्ट्रीय महासचिव एवं यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा करीब दो दशकों से वह किसी न किसी रूप में राजनीति में अपनी भूमिका निभाती रही हैं, ज्यादातर परोक्ष रूप से और कभी-कभी सार्वजनिक रूप से। कथित तौर पर, उन्होंने टिकटों के वितरण को प्रभावित करने से लेकर गठबंधन सहयोगियों के साथ बातचीत करने तक, कांग्रेस पार्टी की राजनीति को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करने का काम किया। बताने वाले बताते हैं कि 1989 के चुनाव में उन्होंने अमेठी निर्वाचन क्षेत्र में लोकसभा चुनाव में अपने पिता राजीव गांधी के लिए पहली बार प्रचार किया था।

1999 लोकसभा चुनाव में अरूण नेहरू के खिलाफ किया प्रचार
उन्होंने यूपी में लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार किया। जब भाजपा ने अरुण नेहरू - राजीव गांधी के चचेरे भाई और कभी करीबी विश्वासपात्र - को कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा के खिलाफ रायबरेली से अपने उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा था। प्रियंका ने नेहरू के खिलाफ प्रचार किया था। एक भाषण में उन पर हमला करते हुए कहा था कि, "क्या आप उस व्यक्ति के लिए वोट करेंगे, जिस मेरे पिता की पीठ में चुरी भोंका था।

2004 और 2009 में राहुल व सोनिया के लिए खुलकर किया प्रचार
वह अपने भाई राहुल गांधी के खुले समर्थन में सामने आईं, जब उन्होंने पहली बार अमेठी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, जो उनकी मां सोनिया गांधी द्वारा उनके लिए खाली की गई थी। सोनिया ने अपने आपको रायबरेली में स्थानांतरित कर लिया था। शुरुआत में ऐसा कहा गया था कि वह केवल अमेठी और रायबरेली में प्रचार करेंगी और राजनीति में शामिल नहीं होंगी और राहुल गांधी परिवार के राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे।

स्मृति ईरानी के खिलाफ अमेठी में संभाला मोर्चा
अमेठी में 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति ईरानी और आप ने अपने लोकप्रिय नेता कुमार विश्वास को मैदान में उतारा था। दोनों ने मिलकर राहुल को कड़ी चुनौती दी। राहुल की जीत के पीछे प्रियंका की रणनीति और उनके प्रचार को एक महत्वपूर्ण कारक माना गया। उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला किया, जो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। हालांकि उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने फिर स्मृति इरानी को टिकट दिया और इस बार वह राहुल गांधी को हराने में कामयाब रहीं। हालांकि प्रियंका इस समय कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव हैं और यूपी की प्रभारी भी हैं। उनके उपर 2022 में कांग्रेस को जिताने का बड़ा दारोमदार है।












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