Opposition unity: क्या टूटेगी बीएसपी? पहली बार इस वजह से मायावती के खिलाफ उठे सुर
विपक्षी एकता के साथ बसपा के जुड़ने की मांग को लेकर पार्टी सांसदों ने बगावती तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। अमरोहा के सांसद दानिश अली ने मायावती को खुलेआम चुनौती देना शुरू कर दिया है।

बहुजन समाज पार्टी की एक परंपरा रही है। यहां पार्टी सुप्रीमो मायावती की अनुमति के बिना किसी को कुछ भी बोलने की इजाजत नहीं है। चाहे प्रदेश अध्यक्ष ही क्यों ने हों, पार्टी में यह व्यवस्था एम्बार्गो की तरह लागू रही है। 'बहनजी' को भरोसे में लिए बिना पार्टी में पत्ते को भी हिलने की इजाजत नहीं मिलती।
बसपा सांसद ने मायावती से अलग किए सुर
लेकिन, उत्तर प्रदेश में अमरोहा से बसपा सांसद कुंवर दानिश अली ने जो लाइन ली है, वह बीएसपी सुप्रीमो की आधिकारिक लाइन से ठीक उलट है। मायावती साफ कर चुकी हैं कि वह यूपी में आगे विधानसभा और लोकसभा चुनाव अपने दम पर ही लड़ेंगी। लेकिन, पार्टी के कुछ सांसदों की मंशा है कि बसपा 2024 के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विपक्षी एकता की मुहिम से जुड़ जाए।
2018 की तस्वीर से मायावती को समझाने की कोशिश
अमरोहा से बसपा के लोकसभा सांसद दानिश अली ने अपनी दिली ख्वाहिश को सार्वजनिक मंच पर जाहिर कर दिया है। उन्होंने एक ट्वीट किया है, जो मायावती की लाइन से ठीक उलट है। इस ट्वीट में उन्होंने पांच साल पहले की बेंगलुरु की उस विपक्षी एकता वाली तस्वीर शेयर की है, जिसमें कांग्रेस-जेडीएस सरकार के शपथग्रहण समारोह में मायावती, सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के साथ कई दूसरे विपक्षी नेताओं के साथ खड़ी हैं।
विपक्षी एकता की जरूरत आज ज्यादा- दानिश अली
उस फोटो शूट के बाद विपक्षी एकता का क्या हुआ, अभी हमारे लिए उसमें विस्तार से जाने का मतलब नहीं है। लेकिन, अली ने अपने ट्वीट में उसी का हवाला देकर लिखा है, '2018 में इसी दिन बेंगलुरु में कर्नाटक के विधान सौधा में जेडीएस-कांग्रेस सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के मौके पर विपक्षी दलों के दिग्गजों की मेजबानी करना मेरे लिए एक यादगार पल था।...... '

उन्होंने आगे लिखा है, 'विपक्षी एकता की जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है। आओ हम सब एकजुट हो जाएं।' बसपा में पार्टी सुप्रीमो से खुलेआम अलग लाइन लेने की अनुमति किसी को नहीं मिलती। ऊपर से दानिश अली ने अपने ट्विटर बायो में न तो यह बताया है कि वह किस लोकसभा सीट से सांसद हैं और न ही बीएसपी का नाम ही लिखा है।
बसपा के बिना विपक्षी एकता की बात बेमानी?
दानिश अली ने भले ही खुलकर अपनी बात रखने की हिम्मत दिखाई हो, लेकिन बसपा के कई सांसद हैं, जो विपक्षी एकता के साथ जाने की बात दबी-जुबान कर रहे हैं। क्योंकि, उन्हें यह भी लगता है कि पार्टी की हालत भले ही पतली हो, लेकिन विधानसभा चुनाव में 12.88% वोट शेयर पाने वाले दल के बिना विपक्षी एकता की बात बेमानी है।
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2019 में गठबंधन से बसपा को हुआ ज्यादा फायदा
2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा-सपा और राएलडी ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। सबसे फायदे में बीएसपी रही थी और वह 80 में से 10 सीटें जीत गई थी। पार्टी सिर्फ 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। वहीं 37 सीटों पर लड़कर समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें जीती थी। कांग्रेस इस गठबंधन में तो शामिल नहीं थी, लेकिन हमेशा की तरह सपा-बसपा ने अमेठी और रायबरेली में गांधी परिवार के लिए सीटें फिर से खाली छोड़ दी थी।
इससे पहले 2014 के चुनाव में बीएसपी का सपा के साथ कोई गठबंधन नहीं था और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। जबकि, सपा ने तब मोदी लहर में भी मुलायम परिवार की 5 सीटें जीत ली थी। वैसे बसपा के लिए एक आंकड़ा दिलचस्प है कि दोनों ही लोकसभा चुनावों में उसका वोट शेयर 19% से थोड़ा ऊपर रहा था।












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