क्या 2024 से पहले "युनाइटेड विपक्ष" के विकल्प को जिंदा रखना चाहती हैं मायावती ?

लखनऊ, 21 सितंबर: उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती अचानक अखिलेश का समर्थन क्यों कर रही हैं ? क्या विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी से नजदीकीयों के जो आरोप लगे थे उस नैरेटिव को तोड़ने का प्रयास कर रहीं हैं या "यूनाइटेड विपक्ष" के उस संभावित विकल्प की तरफ बढ़ रही हैं जो देश में आकार ले रहा है। यूपी चुनाव के दौरान सपा ने मायावती पर आरोप लगाए थे कि वो बीजेपी की बी टीम के तौर पर काम कर रही हैं। यही बात सपा के पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव ने आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद दोहराई थी और कहा था कि अब साबित हो गया है कि बसपा बीजेपी की बी टीम के तौर पर काम कर रही है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मायावती को ऐसा करने के पीछे की एक मात्र वजह ये है कि उन्होंने देश में बन रहे 'यूनाइटेड विपक्ष" के विकल्प को पूरी तरह से नाकरा नहीं है।

यूनाइटेड विपक्ष के विकल्प की तरफ भी देख रहीं मायावती

यूनाइटेड विपक्ष के विकल्प की तरफ भी देख रहीं मायावती

बसपा की चीफ मायावती के पिछले कुछ ट्वीट देखें तो वह अखिलेश पर हमला करने से बचती रही हैं। राजनीतिक पंडितों की मानें तो मायावती के सामने असली चुनौती 2024 में होने वाला लोकसभा चुनाव है। देश में एक यूनाइटेड विपक्ष की बात जोर पकड़ रही है। इसका खाका इसलिए खींचा जा रहा है कि पीएम मोदी को तीसरी बार पीएम बनने से रोका जा सके। मायावती को पता है कि अगर वो 2024 में बीजेपी का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं होंगी तो उनके लिए एक दूसरा ऑप्शन भी बचा रहे। इसलिए वो बीजेपी पर तो अटैक कर रही हैं लेकिन अखिलेश पर वार करने से बचती हुई दिखाई दे रही हैं।

युनाइटेड विपक्ष के ऑप्शन को लेकर गंभीर ?

युनाइटेड विपक्ष के ऑप्शन को लेकर गंभीर ?

मायावती के इस रुख को लेकर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि, ''ट्वीट के आधर पर यदि मायावती के रुख का विश्लेषण करें तो यही समझ में आता है कि एक संयुक्त विपक्ष के खड़ा करने की जो बात चल रही है उसको लेकर वो गंभीर हैं। उन्होंने उस आप्शन को नकारा नहीं है। इसीलिए वो एक तरफ भाजपा को अटेक कर रही हैं लेकिन जब अखिलेश से बचती हुई दिख रही हैं। इसको इस रूप में भी देखा जा सकता है कि यदि 2024 के आते आते ऐसी संभावनाएं बनती हैं कि वो बीजेपी को चुनौती देने में सक्षम नहीं रहती हैं तो वह यूनाइटेड विपक्ष का समर्थन कर सकती हैं।

पहले भी अखिलेश यादव के साथ कर चुकी हैं गठबंधन

पहले भी अखिलेश यादव के साथ कर चुकी हैं गठबंधन

दरअसल मायावती इससे पहले भी अखिलेश के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी हैं। हालांकि इसमें भी उनको कोई खास सफलता नहीं मिली थी लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसलिए वह अपने तरकश में हर तीर को रखना चाहती हैं जिससे मौका मिलने पर उसे इस्तेमाल कर सकें। हालांकि अखिलेश के साथ गठबंधन का अनुभव मायावती के लिए फायदे का ही सौदा साबित हुआ है। 2014 में मायावती को लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन 2019 के चुनाव में गठबंधन के बाद लोकसभा में दस सीटों पर मायावती को जीत मिल गई जबकि सपा केवल पांच सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी। मायावती फिर उसी समीकरण की ओर बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।

SBSP के चीफ राजभर ने की थी साथ मिलकर लड़ने की वकालत

SBSP के चीफ राजभर ने की थी साथ मिलकर लड़ने की वकालत

कुछ दिनों पहले ही अखिलेश से अलग होने के बाद सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने भी कहा था कि अगर अखिलेश और मायावती दलितों और पिछडों का हित चाहते हैं, तो दोनों को मिलकर अगला लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए। नहीं तो भाजपा 80 की 80 सीट भी जीत जाएगी। दरअसल बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती मंगलवार को समाजवादी पार्टी के समर्थन में आईं और योगी आदित्यनाथ सरकार पर सरकार द्वारा "अन्यायपूर्ण" कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन और विरोध प्रदर्शन करने के लिए विपक्षी दलों के लोकतांत्रिक अधिकार को छीनने की कोशिश पर हमला किया। बसपा सुप्रीमो ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फीस वृद्धि को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा था।

मानसून सत्र के पहले दिन अखिलेश के मार्च को लेकर किया था ट्विट

मानसून सत्र के पहले दिन अखिलेश के मार्च को लेकर किया था ट्विट

समाजवादी पार्टी द्वारा मानसून सत्र के पहले दिन सरकार के खिलाफ विरोध मार्च को रोकने और सदन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा की गई पुलिस कार्रवाई की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मायावती ने ट्वीट किया, "विपक्षी दलों को विरोध करने की अनुमति नहीं दे रहा है। सरकार की जनविरोधी नीतियां और उसकी निरंकुशता और अत्याचार आदि भाजपा सरकार की नई तानाशाही प्रवृत्ति बन गई है। साथ ही, मुकदमेबाजी और लोगों की गिरफ्तारी और विरोध को दबाने की सरकार की धारणा खतरनाक है।"

मायावती चाहे जहां जाएं बीजेपी का गठबंधन जनता के साथ

मायावती चाहे जहां जाएं बीजेपी का गठबंधन जनता के साथ

मायावती समाजवादी पार्टी का नाम लिए बिना समर्थन में लिखा, भाजपा पर महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, सड़कों की खराब स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था आदि के प्रति यूपी सरकार के विरोध और उदासीनता की अनुमति नहीं देने का आरोप लगाया। इससे पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फीस वृद्धि को लेकर मायावती ने ट्वीट किया कि एयू जिस तरह से छात्रों के आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रहा है वह अनुचित और निंदनीय है। हालांकि मायावती के इस रुख को लेकर बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी कहते हैं कि मायावती का रुख चाहे जो हो उससे बीजेपी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि बीजेपी का गठबंधन जनता के साथ है और रहेगा। कौन कहां जा रहा है क्या कर रहा है इससे बीजेपी का कोई लेना देना नहीं है।

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