देश में दलित PM होने का मुद्दा उठाकर अपनी संभावनाएं टटोल रहीं Mayawati ?
Bahujan Samaj Party की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती समय समय पर पीएम बनने की अपनी महत्वाकांक्षाओं के संकेत देती रहती है। देश में अब तक दलित पीएम क्यों नहीं बनाया गया, ये बयान देकर मायावती ने एक बार फिर अपनी भावनाओं का इजहार किया है। हालांकि मायावती की महात्वाकांक्षा पूरी होगी या नहीं ये तो समय बताएगा लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि मायावती को पीएम बनना है तो अपनी ताकत बढ़ानी होगी और सभी दलों के अंदर अपनी स्वीकार्यकता को बढ़ाना होगा। गैर भाजपाइ पीएम भी तभी बन पाएगा जब कांग्रेस उनका साथ देगी ऐसे में उनको राहुल गांधी के साथ अपने संबंधों को लेकर भी पुनर्विचार करना होगा।

ऋषि सुनक के बहाने मायावती ने साधा पीएम पद पर निशाना
मायावती भारत मूल के ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऋषि सुनक को बधाई देते हुए सवाल किया है कि आज तक किसी भी दलित को भारत का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया गया है। मायवती का यह बयान पीएम के प्रतिष्ठित पद को लेकर उनकी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। मायावती ने एक ट्वीट में कहा कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस एक अल्पसंख्यक सदस्य की इंग्लैंड के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्ति को लेकर ट्विटर युद्ध छेड़ रही है, लेकिन दोनों एक सवाल पर चुप हैं कि अब तक किसी भी दलित को प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया गया।

मायावती का आरोप- कांग्रेस-बीजेपी में छिड़ा है ट्विटर वार
"भारतीय मूल के ऋषि सनक के ब्रिटिश प्रधान मंत्री बनने के बाद आखिरकार कांग्रेस और भाजपा के बीच भारत में ट्विटर युद्ध चल रहा है। हर तरफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, लेकिन राजनीतिक अधिकारों और न्याय की बात नहीं हो रही है। जिसके कारण देश में अब तक कोई भी दलित प्रधानमंत्री नहीं बन पाया है। बसपा प्रमुख ने कहा कि ऐसे समय में जब अमेरिका और यूरोप के अमीर और विकसित देश जूझ रहे हैं और स्थिति को संभालने के लिए लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं, भारतीय शासकों को भी देश के हित और यहां के लोगों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।

पीएम बनने के लिए मायावती को तय करना होगा लंबा रास्ता
राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने पहले भी कई मौकों पर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद की दावेदार हैं। लेकिन मायावती को इस बार अपनी महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यूपी में उनकी क्या स्थिति रहती है। राष्ट्रीय स्तर पर उनके दावे को गंभीरता से लेने के लिए सपा-बसपा को सही मायने में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पछाड़ना होगा और इसे 20 या उससे भी कम सीटों तक सीमित रखना होगा।

ताकत बढ़ाने के साथ ही क्षेत्रियों दलों का जीतना होगा भरोसा
रंजन के मुताबिक, उन्हें अन्य क्षेत्रीय ताकतों का समर्थन हासिल करना होगा। ममता बनर्जी से लेकर के चंद्रशेखर राव तक, नवीन पटनायक से लेकर शरद पवार तक, तेजस्वी यादव से लेकर वाईएस जगन मोहन रेड्डी तक। भले ही उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया हो, उन्हें राहुल गांधी के साथ अपने संबंधों को फिर से दुरुस्त करने की आवश्यकता होगी क्योंकि कांग्रेस किसी भी गैर-भाजपा गठन में एक निर्णायक खिलाड़ी होगी। हालांकि यह आसान नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस उन्हें यूपी के साथ-साथ देश के बाकी हिस्सों में दलित वोटों के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती है।

राजनीतिक क्षमता को बढ़ाने की जरूरत
अगर सुश्री मायावती अपने दावे के बारे में वास्तव में गंभीर हैं, तो उनके लिए यह भी समय है कि वे अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को साझा करना शुरू करें और नीतियों के एक सेट की रूपरेखा तैयार करें जिसे वह प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ाएगी। जब उसके पास संख्या और विश्वसनीयता दोनों हों तभी वह इस मुकाम को हासिल कर सकती हैं। इसके लिए मायावती को यूपी में अपनी राजनीतिक क्षमता को काफी बढ़ाना होगा तभी उनकी महत्वाकांक्षाएं पूरी हो सकती हैं।












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