आखिर सामने आ गई मायावती के राज्यसभा से इस्तीफा देने की वजह!

एक बार फिर से दलित वोट बैंक को एकजुट करने के लिए जमीनी लड़ाई लड़ेंगी मायावती, हर महीने की 18 तारीख को करेंगी रैली

लखनऊ। बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस तरह से हाल ही में दलितों के मुद्दे पर बोलने की इजाजत नहीं दिए जाने को मुद्दा बनाते हुए राज्यसभा से इस्तीफा दिया उसके बाद से ही यह सवाल उठने लगा था कि इसके पीछे की असल वजह क्या है। तमाम राजनीति के जानकारों का मानना था कि मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देकर खुद को दलितों के हितों के लिए लड़ने वाली नेता के तौर पर एक बार फिर से स्थापित करना चाहती हैं।

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फिर से जमीनी लड़ाई लड़ेंगी मायावती

फिर से जमीनी लड़ाई लड़ेंगी मायावती

दरअसल जिस तरह से एक के बाद एक लगातार चुनाव हारने के बाद मायावती का राजनीतिक अस्तित्व खतरे में आ गया है, उसे देखते हुए मायावती को एक अदद ऐसे बड़े फैसले और जमीनी स्तर पर लड़ाई की जरूरत थी, जिसे आखिरकार मायावती ने लेने का फैसला लिया। जमीनी स्तर पर अपनी लड़ाई को मजबूत करने के लिए मायावती ने हर महीने की 18 तारीख को जनसभा करने का फैसला लिया है।

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    लोगों के जेहन में ताजा रखना चाहती हैं 18 जुलाई

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    मायावती ने राज्यसभा से 18 जुलाई को इस्तीफा दिया है और वह इस तारीख को लोगों के जेहन में ताजा रखना चाहती है, लिहाजा उन्होंने हर महीने की 18 तारीख को जनसभा को संबोधित करने का फैसला लिया है। राज्यसभा में उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें दलितों के मुद्दे पर बोलने नहीं दिया जा रहा है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब मायावती किसी एक विशेष तारीख को भुनाने की कोशिश में लगी हैं।

     इससे पहले भी 2 जून को बनाया था मुद्दा

    इससे पहले भी 2 जून को बनाया था मुद्दा

    इससे पहले भी मायावती ने हर महीने की 2 तारीख को रैली करने का फैसला लिया था। मायावती ने 2 जून 1995 को उनपर हुए हमले के बाद हर महीने की 2 तारीख को रैली करने का ऐलान किया था। 2 जून 1995 को मायावती पर समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने हमला कर दिया था, उनपर यह हमला गेस्ट हाउस पर हुआ था। इसके बाद तकरीबन 22 साल तक मायावती ने 2 जून की इस घटना पर समाजवादी पार्टी पर हमला बोला।

    2019 अस्तित्व की लड़ाई

    2019 अस्तित्व की लड़ाई

    मायावती का पिछले तीन चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन जारी रहा। पहले उन्हें 2012 के विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा, इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ 18 सीटें ही हासिल कर सकी। ऐसे में एक बार फिर से मायावती अपने दलितों वोटबैंक को एकजुट करने की कवायद में जुट गई हैं। ऐसे में राज्यसभा से मायावती के इस्तीफे को 2019 की तैयारी के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसके लिए मायावती कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं।

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